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Santhara Ritual: क्या है संथारा प्रथा, जहां मनाया जाता है मौत पर उत्सव

संथारा प्रथा को लेकर काफी विवाद भी हो चुका है। कुछ लोगों के अनुसार यह आत्महत्या है जबकि जैन परंपरा के अनुसार निर्वाण प्राप्त करने की यह एक विधि है।

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Santhara Ritual: आमतौर पर किसी की मृत्यु होने पर शोक मनाया जाता है, लेकिन संथारा एक ऐसी प्रथा है जिसमें देह त्यागने पर उत्सव मनाया जाता है। हाल ही में पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले के जसोल गांव में एक जैन दंपति के संथारा ग्रहण करने पर भी उत्सव का माहौल है। जैन परंपरा में इस प्रथा को बहुत पवित्र माना जाता है। इससे पहले भी कई लोगों एवम संतों ने निर्वाण प्राप्ति के लिए स्वेच्छा से अपने देह का त्याग किया है।

क्या होती है संथारा प्रथा?

जैन समुदाय के अनुसार, जब कोई व्यक्ति (श्रावक) या जैन मुनि अपनी मृत्यु को करीब पाते हैं, तो अपनी इच्छा से संथारा ग्रहण करते हैं। ऐसे व्यक्ति, जो वृद्ध होने पर अपने दैनिक कार्यों को पूरा करने में निशक्त होने, असाध्य रोग से पीड़ित होने या भयंकर अकाल जैसी स्थितियों में संथारा ग्रहण करते हैं। जब कोई व्यक्ति अन्न-जल त्याग कर शरीर को मृत्यु के लिए तैयार करता है, उसे संथारा कहा जाता है। संथारा प्रथा को संलेखना, संन्यासमरण, समाधिमरण के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रथा को मोक्ष पाने के लिए आत्मशुद्धि का एक धार्मिक कृत्य माना गया है। केवल धर्मगुरु ही संथारा ग्रहण करा सकते हैं।

मैसूर हाईकोर्ट के जज रहे टीके टुकोल ने जैन धर्म को लेकर कई किताबें लिखी हैं। जस्टिस टीके टुकोल ने संलेखना की प्रथा पर एक शोधपरक किताब भी लिखी, जिसका नाम है 'संलेखना आत्महत्या नहीं है'। अगस्त 1976 में प्रकाशित इस किताब में जस्टिस टुकोल बताते हैं कि सभी प्रकार की सांसारिक मोह-माया और विषाद को त्याग कर धीरे-धीरे अन्न-जल से परहेज करते हुए आत्मा के शरीर से अलग होने तक सारा ध्यान खुद पर केंद्रित करना संलेखना या संथारा है।

शताब्दियों पुराने जैन धर्मग्रंथों में मौजूद है संलेखना की जानकारी

जस्टिस टीके टुकोल की किताब में प्रमाण सहित बताया गया है कि दूसरी शताब्दी के आचार्य समंतभद्र ने अपने लिखे जैनग्रंथ 'रत्नकरंड श्रावकाचार' में इसका उल्लेख किया है। इस ग्रंथ में बताया गया है कि जब कोई उपाय न बचा हो, तब संथारा का संकल्प लिया जा सकता है। जो यह संकल्प लेता है, उसे अपने परिजनों, साथियों और नौकरों को क्षमा करने के साथ ही उनसे माफी मांगनी चाहिए। संथारा ग्रहण करने वाले को अपने सभी पापों के बारे में गुरू को बताना चाहिए।

दूसरी शताब्दी में लिखे गए जैन धर्मग्रंथ आचारांग सूत्र में संलेखना या मृत्यु के तीन प्रकारों के बारे में बताया गया है। जो भक्तप्रत्यख्यान मरण, इंगित मरण और पदापोपगमन मरण कहलाती हैं। आचारांग सूत्र में आखिरी दो प्रकारों को व्यक्ति के अंगों की गतिशीलता खत्म होने और व्यक्ति के चलने में दिक्कत होने पर ही मान्य होते हैं। सातवीं सदी में संस्कृत में लिखे गए जैन सिद्धांतों के पहले ग्रंथ तत्त्वार्थसूत्र में आचार्य उमास्वामी ने भी संलेखना या संथारा को खुशी और स्वेच्छा से अपनाना चाहिए।

वीरनंदी ने अपनी पुस्तक अकारसार में उल्लिखित किया है कि संलेखना का संकल्प तभी सफल होता है, जब संत एक ऐसे स्थान का चयन करें, जहां का राजा धार्मिक प्रवृत्ति का हो। जहां के लोगों में आचार्यों के लिए सच्ची श्रद्धा हो और जहां लोग गरीब या धनहीन न हों। संकल्प के पूरा होने में किसी तरह की रुकावट या गड़बड़ी उत्पन्न होने से बचने के लिए ये सावधानी अपनानी चाहिए।

महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने भी की थी संलेखना

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 290 ईसा पूर्व में जैन धर्म के पांचवें श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु ने 12 साल का अकाल पड़ने पर उज्जैन छोड़कर दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान किया था। उनके साथ 12 हजार संत और सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य भी दीक्षा लेकर दक्षिण भारत चले गये थे। मैसूर के आर्कियोलॉजिकल सर्वे विभाग ने श्रवणबेलगोल में चंद्रगिरि पर्वत पर आचार्य भद्रबाहु और चंद्रगुप्त मौर्य की समाधि के शिलालेख खोज निकाले हैं। चंद्रगिरि पर्वत के दक्षिण में मिले एक शिलालेख में आचार्य भद्रबाहु और चंद्रगुप्त मौर्य को मुनि युग्म को तौर पर उल्लिखित किया गया है। यह शिलालेख 650 ईसवी और 900 ईसवी के हैं।

इसी तरह हर शताब्दी में कई अलग-अलग आचार्यों, गुरुओं ने संलेखना का संकल्प लिया, जिसके प्रमाण शिलालेखों और चंद्रगिरि पर्वत पर मौजूद हैं। आचार्य शान्तिसागर ने 18 अगस्त 1955 को संलेखना ली थी और एक महीने बाद 18 सितम्बर 1955 को उन्होंने अपनी देह त्याग दी थी। आजाद भारत में भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे ने भी संथारा ग्रहण किया था। झारखंड में स्थित जैनों के सर्वोच्च तीर्थस्थल सम्मेद शिखरजी को पर्यटन केंद्र घोषित किए जाने के खिलाफ जैन मुनि समर्थ सागर और जैन मुनि सुज्ञेय सागर ने भी अनशन करते हुए प्राण त्यागे थे।

कौन नहीं कर सकते संलेखना का संकल्प?

जैन धर्मग्रंथों में संथारा के बारे में साफ और स्पष्ट रूप से कई निर्देश दिए गए हैं। एक बेहतरीन उदाहरण आचार्य समंतभद्र से ही जुड़ा हुआ है। भस्मरोग नाम के एक लाइलाज रोग से पीड़ित होने पर समंतभद्र धार्मिक मर्यादाओं के अनुसार जीवन व्यतीत नहीं कर पा रहे थे, तो उन्होंने संलेखना संकल्प लेने की इच्छा जाहिर की। अनुमति के लिए उन्होंने अपने गुरु से संपर्क किया। जिस पर उनके गुरु ने अपने ज्ञान से देखा कि आचार्य द्वारा अपने जीवन में जैन दार्शनिक साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण योगदान देने की संभावना है। जिसके बाद उन्होंने अनुमति देने से इनकार कर दिया।

आसान शब्दों में कहें, तो संलेखना का संकल्प लिए जाने से पहले बची हुई आयु के बारे में भी विचार किया जाता है। इसी वजह से जैन धर्म की पवित्र प्रथा होने के बावजूद बच्चों और युवाओं को संलेखना का संकल्प नहीं दिया जाता है। कोई भी जैन गुरू इसके पक्ष में नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था संथारा पर विवाद

साल 2006 में निखिल सोनी नाम के एक वकील ने राजस्थान हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इस जनहित याचिका में संथारा प्रथा को आत्महत्या बताते हुए कहा गया था कि मौत होने तक अन्न-जल का त्याग कर मृत्यु प्राप्त करना जीवन जीने के अधिकार की अवहेलना और उल्लंघन है। अगस्त 2015 में राजस्थान हाईकोर्ट ने संथारा प्रथा को आत्महत्या घोषित करते हुए इस पर रोक लगा दी थी। जैन धर्म के लोग इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए और 20 दिनों के अंदर ही रोक हटाते हुए हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया गया।

यह भी पढ़ें: Farmer Suicides: मराठवाड़ा में क्यों अधिक हैं किसानों की आत्महत्या के मामले

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