Guillain-Barré Syndrome: क्या है गुइयां-बेरे सिंड्रोम, और पेरू में क्यों बन रहे है कोरोना जैसे हालात?
Guillain-Barré Syndrome: दक्षिण अमेरिकी देश पेरू में गुइयां-बेरे सिंड्रोम (जीबीएस) रोग तेजी से फैल रहा है। इसकी वजह से 9 जुलाई 2023 से पूरे देश में 90 दिनों के लिए हेल्थ इमरजेंसी लागू कर दी गयी है। साल 2019 में भी ऐसी ही इमरजेंसी लगायी गयी थी। इस बीमारी की वजह से वहां चार लोगों की मौत हो गयी है। जबकि समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रपति दीना बूलुआर्ट ने रोगियों की देखभाल के लिए $3.27 मिलियन की राशि आवंटित कर दी है।
एक साल में 191 मामले
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों पर काम करने वाली संगठन 'ओसीएचए सर्विस' की रिलीफवेब वेबसाइट के मुताबिक पेरू में 8 जुलाई 2023 तक पूरे देश में जीबीएस के 191 मामले दर्ज किये गये थे। इनमें से 77 मामलों की पुष्टि की गयी है, जिनमें चार लोगों की मौत भी शामिल हैं। सरकार और संगठन के आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक साल 2023 में पेरू के 24 विभागों (जिलों या क्षेत्रों) और एक संवैधानिक प्रांत (राजधानी) में से कम-से-कम 18 विभागों ने गुइयां-बेरे सिंड्रोम के न्यूनतम एक मामले की सूचना जरूर दी है। मौजूदा साल में अभीतक लीमा में 50 मामले, ला लिबर्टाड में 32 मामले, लांबायेक में 20 मामले, कजामार्का में मामले 18, पिउरा में 16 मामले, जूनिन में 10 मामले, कैलाओ में 9 मामले और कुस्को में 7 मामले दर्ज किये गये हैं।

पेरू में 2023 में रिपोर्ट किये गये 58.6% मामले 2 से 86 वर्ष की आयु के पुरुषों (112 मामले) से संबंधित हैं, जिनकी औसत आयु 41 वर्ष है। जबकि 40.3% मामले 30 से 59 वर्ष के बीच के वयस्क (77 मामले) हैं। इसके बाद 26.7% मामले (51 मामले) के साथ वृद्ध वयस्कों (जो 60 वर्ष से ऊपर) का समूह है। जबकि 17 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 38 मामले दर्ज किये गये हैं।
गुइयां-बेरे सिंड्रोम क्या है?
अमेरिका की प्राथमिक स्वास्थ्य एजेंसी 'एनआईएच' के मुताबिक गुइयां-बेरे सिंड्रोम (जीबीएस) एक दुर्लभ ऑटोइम्यून विकार है। जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nerves) के हिस्सों पर हमला करने लगती है। इस हमले से मांसपेशियों में कमजोरी, सुन्नता और झुनझुनी जैसे लक्षण होने लगते हैं, जो आमतौर पर पैरों से शुरू होकर ऊपर की ओर फैलते है।
धीरे-धीरे इसके लक्षण पूरे शरीर में फैल सकते है और कभी-कभी गंभीर मामलों में रोगी को लकवा भी मार सकता है। जबकि इस मामले में अधिकांश लोगों को अस्पताल में इलाज कराना पड़ता है, कुछ मामलों में रिकवरी आमतौर पर हफ्तों से महीनों के बीच हो जाती है। जीबीएस अक्सर वायरस संक्रमण से पहले होता है।
नवंबर 2021 में न्यूरो इन्फ्लेमेशन जर्नल ने एक रिसर्च प्रकाशित की थी। जिसके मुताबिक पूरी दुनिया में 1990 से 2019 के बीच 204 देशों में गुइयां-बेरे सिंड्रोम के मरीज मिले थे। साल 2019 तक दुनियाभर में 150,095 मरीज मिले थे। गौरतलब है कि पेरू में जनवरी 2020 से जुलाई 2023 तक कोविड-19 के 4,512,091 मामले सामने आये थे। विशेष रूप से पोस्ट कोविड समस्याओं में से एक न्यूरोलॉजिकल या तंत्रिकाओं से संबंधित रही है।
गुइयां-बेरे सिंड्रोम के लक्षण
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर एंड स्ट्रोक के मुताबिक गुइयां-बेरे सिंड्रोम का सबसे आम लक्षण कमजोरी है। जो इंसानों को सीढ़ियां चढ़ते समय या चलते समय कमजोरी सबसे पहले देखी जा सकती है। वहीं श्वसन (सांस) को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियां इस हद तक कमजोर हो सकती हैं कि आपको सांस लेने में मदद के लिए मशीन की आवश्यकता पड़ सकती है।
इस बीमारी से जूझ रहे अधिकांश लोग लक्षण सामने आने बाद पहले एक-दो सप्ताह सबसे ज्यादा कमजोरी का अनुभव करते है। चूंकि 'जीबीएस' में नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, इसलिए मस्तिष्क को शरीर के बाकी हिस्सों से असामान्य संवेदी संकेत प्राप्त हो सकते हैं। इस स्थिति को पेरेस्टेसिया कहा जाता है। आपको झुनझुनी, त्वचा के नीचे कीड़े रेंगने का अहसास (जिसे फॉर्मिकेशन कहा जाता है), और दर्द महसूस हो सकता है।
इसके अलावा अन्य लक्षण
● आंख की मांसपेशियों और दृष्टि में कठिनाई
● निगलने, बोलने या चबाने में कठिनाई
● हाथों और पैरों में चुभन या पिन और सुई चुभने जैसी अनुभूति होना
● दर्द जो गंभीर हो सकता है, खासकर रात में
● समन्वय की समस्याएं और अस्थिरता
● असामान्य दिल की धड़कन या रक्तचाप
● पाचन और मूत्राशय नियंत्रण में समस्याएं
क्या भारत में भी है इससे खतरा?
अभी तक किसी भी रिपोर्ट में यह बात नहीं कही गयी है कि भारत में सीधे तौर पर इसका कोई बड़ा असर देखने को मिलेगा। हालांकि, कोरोना काल के दौरान जब पूरी दुनिया इससे परेशान थी, तब देश और दुनिया में वैक्सीनेशन जारी थे। इसी बीच साल 2021 में अमेरिकन न्यूरोलॉजी एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक रिसर्च रिपोर्ट 'Guillain-Barré Syndrome Variant Occurring after SARS-CoV-2 Vaccination' में कहा गया था कि भारत में वैक्सीन (Covishield Vaccine) लगवाने वालों में सीरियस सिंड्रोम देखा गया है। इसे वैज्ञानिकों ने गुइयां-बेरे सिंड्रोम' का नाम दिया था। कोविड वैक्सीन को गुइयां-बेरे सिंड्रोम नामक न्यूरोलॉजिकल विकार से भी जोड़ा गया है, जिसे दुर्लभ माना जाता है और केवल कुछ मामलों में ही रिपोर्ट किया जाता है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 1976 में संयुक्त राज्य अमेरिका में स्वाइन फ्लू के प्रकोप जब बहुत ज्यादा बढ़ गया था, तब दशकों बाद 2009 H1N1 फ्लू महामारी के टीकाकरण अभियानों में सिंड्रोम को देखा गया था। वहीं जीका वायरस से संक्रमण के बीच भी ऐसे मामले सामने आये थे। इसका मतलब है कि जब-जब कोई बीमारी का टीकाकरण होता है तो उस स्थिति लोगों में सिंड्रोम की स्थिति बढ़ सकती है। गुइयां-बेरे सिंड्रोम के सबसे आम रूपों में से एक है एक्यूट इंफ्लेमेटरी डिमाइलेटिंग पोलीन्यूरोपैथी (एआईडीपी), जिसमें इम्यून सिस्टम अपने ही माइलिन कोटिंग को नुकसान पहुंचाता है।
इसका इलाज क्या है?
अमेरिका की प्राथमिक स्वास्थ्य एजेंसी 'एनआईएच' के मुताबिक यह बेहद दुर्लभ प्रकार की बीमारी है। अमेरिका में 1 लाख लोगों में से किसी एक व्यक्ति में इसके होने का खतरा रहता है। गुइयां-बेरे सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं है। हालांकि, इसको ठीक करने के लिए प्लास्मफेरेसिस या इम्युनोग्लोबुलिन थेरेपी को प्रयोग में लाया जा सकता है। प्लास्मफेरेसिस के दौरान रोगी के रक्त से उन एंटीबॉडी को निकाला जाता है जो नसों पर हमला कर सकती हैं। इम्युनोग्लोबुलिन थेरेपी में रोगी को इम्युनोग्लोबुलिन की हाई डोज देकर गुइयां-बेरे सिंड्रोम का कारण बनने वाली एंटीबॉडी को अवरुद्ध किया जाता है।
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