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De-Dollarisation: क्या अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व गिरने लगा है? जानें पूरी कहानी

एक जमाना था जब अमेरिकी डॉलर का एकतरफा प्रभुत्व था लेकिन अब इस कथित वैश्विक मुद्रा के विकल्प खोजे जाने लगे हैं। इस परिवर्तन को डी-डॉलराइजेशन का नाम दिया गया है।

De-Dollarisation

डी-डॉलराइजेशन शब्द एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल, 26 अप्रैल को अर्जेंटीना ने घोषणा कर कहा कि वह चीन से आयात के लिए अमेरिकी डॉलर की बजाय चीनी मुद्रा युआन में भुगतान करेगा। वहीं, दूसरी ओर व्हाइट हाउस के पूर्व अर्थशास्त्री जोसेफ सुलिवन ने चेतावनी दी है कि अगर ब्रिक्स देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अपनी मुद्रा का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे डॉलर का आधिपत्य खतरे में पड़ जाएगा। इसी वजह से डी-डॉलराइजेशन, यानी वैश्विक बाजारों में डॉलर के प्रभुत्व को कम करने की चर्चा फिर होने लगी है।

डॉलर अमेरिका की करेंसी है, लेकिन इसकी स्वीकार्यता वैश्विक करेंसी के रूप में है। दुनियाभर के देश अपना फॉरेक्स रिजर्व डॉलर में रखते हैं। इसी वजह से अधिकतर व्यापारिक लेनदेन भी डॉलर में ही होते हैं। हालांकि, हाल के दिनों में कुछ देशों ने अपनी-अपनी करेंसी में भी व्यापार करना शुरू किया है। पर ऐसा क्यों है? विश्व की अर्थव्यवस्था पर डॉलर का इतना दबदबा क्यों है?

क्यों डी-डॉलराइजेशन की बात होने लगी है?

डॉलर को लेकर ऐसे कई सवाल उठने लगे हैं। आइए आपको डॉलर के वर्चस्व की शुरुआत से लेकर अब डी-डॉलराइजेशन तक की बात को समझाते हैं।

अमेरिकी डॉलर का इतिहास

साल 1913 में अमेरिकी कांग्रेस ने फेडरल रिजर्व सिस्टम की स्थापना करते हुए अपने देश का फेडरल रिजर्व अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम ने फेडरल रिजर्व बैंक को फेडरल रिजर्व बैंक नोट्स जारी करने के लिए अधिकृत किया। इसके एक साल बाद 1914 में फेडरल रिजर्व बैंक ने फेडरल रिजर्व नोट जारी करना शुरू किया। ब्यूरो ऑफ इनग्रेविंग एंड प्रिंटिंग आज भी एकमात्र इसी करेंसी को बनाता है।

अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व की कहानी

वैसे तो प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ही डॉलर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आरक्षित मुद्रा बन गया था, लेकिन दुनिया की प्राथमिक आरक्षित मुद्रा के रूप में यह दूसरे विश्वयुद्ध के अंत में स्थापित हुआ। दरअसल, साल 1944 में ब्रेटन वुड्स, न्यू हैम्पशायर में 44 देशों की एक बैठक हुई। इसमें इन देशों ने अपनी मुद्राओं को अमेरिकी डॉलर से जोड़ने का फैसला लिया। इसकी वजह यह थी कि इन सभी मित्र राज्यों में अमेरिका सबसे मजबूत देश था। ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत ही वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ यानी इंटरनेशनल मोनेटेरी फंड भी अस्तित्व में आए।

खैर, इस समझौते ने एक नई वैश्विक मौद्रिक प्रणाली की स्थापना की। इसने वैश्विक मुद्रा के रूप में सोने के मानक को अमेरिकी डॉलर से बदल दिया। समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद अमेरिका ही एकमात्र ऐसा देश था, जो डॉलर छाप सकता था। बस इसी समझौते के बाद डॉलर के वर्चस्व की शुरुआत हुई। दरअसल, इससे पहले ज्यादातर देश केवल सोने को बेहतर मानक मानते थे। उन देशों की सरकारें वादा करती थीं कि वह उनकी मुद्रा को सोने की मांग के मूल्य के आधार पर तय करेंगी।

ब्रेटन वुड्स में दुनिया के विकसित देश मिले और उन्होंने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले सभी मुद्राओं की विनिमय दर को तय किया। उस समय अमेरिका के पास दुनिया का सबसे अधिक सोने का भंडार था। इस समझौते से दूसरे देश भी सोने की जगह डॉलर को अपनी मुद्रा का समर्थन करने की बात पर राजी हुए।

चूंकि, यह मुद्रा गोल्ड समर्थित थी, तो सोने की सप्लाई मेनटेन करने की बजाय अन्य देश अमेरिकी डॉलर जमा करने लगे। मगर, साल 1970 की शुरुआत में मुद्रा स्फीति से लड़ने के लिए कई देशों ने डॉलर के बदले सोने की मांग शुरू कर दी। सोने की मांग ऐसी थी कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को हस्तक्षेप करना पड़ा। आखिरकार, डॉलर को सोने से अलग कर दिया गया। हालांकि, तब तक डॉलर दुनिया की सबसे खास सुरक्षित मुद्रा बन चुका था और आज भी यह दुनिया की रिजर्व करेंसी बना हुआ है।

डॉलर का वर्चस्व क्यों?

अमेरिकी डॉलर ने 1970 के दशक की शुरुआत में सऊदी अरब से डॉलर में वैश्विक ऊर्जा व्यापार करने के लिए एक समझौते के साथ अपनी यह प्रभुत्वशाली स्थिति बना ली। ब्रेटन वुड्स प्रणाली के खत्म होने से डॉलर की स्थिति और मजबूत हुई, जहां इसने अन्य विकसित बाजार मुद्राओं की अमेरिकी डॉलर से मुकाबला कर पाने की क्षमता को खत्म कर दिया।

मौजूदा समय में वैश्विक केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 60 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का लगभग 70 प्रतिशत अमेरिकी डॉलर के उपयोग से पूरा होता है। विरोधी केंद्रीय बैंकों द्वारा डॉलर ऐसेट्स की अचानक डम्पिंग उनके लिए बैलेंस शीट जोखिम भी पैदा करेगी, क्योंकि इससे उनके पूरे डॉलर-डिनॉमिनेटेड होल्डिंग्स का मूल्य कम हो जाएगा। यूरो और सोने के अलावा अधिकांश दूसरी विदेशी मुद्राओं के साथ कुछ अंतर्निहित जोखिम भी लगते हैं।

डी-डॉलराइजेशन क्या है?

डी-डॉलराइजेशन का मतलब विनिमय या आरक्षित मुद्रा के माध्यम के रूप में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना है। यह शब्द नया हो सकता है, लेकिन कई देश दशकों से अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की मांग कर रहे हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा जैसे कई राष्ट्राध्यक्षों ने विश्व व्यापार में अमेरिकी आधिपत्य की आलोचना की है। अमेरिका के भू-राजनीतिक विरोधी माने जाने वाले चीन और रूस प्रमुख रूप से उन राष्ट्रों में शामिल हैं, जो डी-डॉलराइजेशन के लिए प्रयासरत हैं।

डी-डॉलराइजेशन की दिशा में उठे कदम

एक मीडिया रिपोर्ट में अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च के हवाले से कहा गया है कि ईरान और रूस ने अंतरराष्ट्रीय डॉलर ट्रेडिंग सिस्टम 'स्विफ्ट' से कटने के चलते आर्थिक रूप से काफी उथल-पुथल देखा। इससे अब ये देश दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। अमेरिकी 'स्विफ्ट' को बायपास करते हुए रूसी SPFS (सिस्टम फॉर ट्रांसफर ऑफ फाइनेंशियल मैसेजेस) और चीनी CIPS (क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम) को मिलाकर एक नयी रूस-चीन भुगतान प्रणाली की संभावित शुरुआत के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार है -

  • रूस ने साल 2021 में डॉलर-डिनॉमिनेटेड ऐसेट्स में अपनी हिस्सेदारी घटाकर करीब 16 प्रतिशत कर ली थी।
  • रूस ने द्विपक्षीय व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं को प्राथमिकता देकर अमेरिकी डॉलर में किए जाने वाले व्यापार में भी अपनी हिस्सेदारी कम की है।
  • ब्रिक्स (BRICS) को रूस के निर्यात में अमेरिकी डॉलर का उपयोग साल 2013 में लगभग 95 प्रतिशत से घटकर साल 2020 में 10 प्रतिशत से भी कम रह गया।
  • चीन भी डी-डॉलराइजेशन को बढ़ावा देने के लिए ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और अपनी डिजिटल मुद्रा का उपयोग करने का प्रयास कर रहा है। उसने हांगकांग, सिंगापुर और यूरोप में चीन की मुद्रा RMB के ट्रेडिंग सेंटर बनाए हैं।
  • साल 2021 में पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने अपनी डिजिटल मुद्रा ई-युआन (e-Yuan) के माध्यम से वैश्विक वित्तीय नियमों को प्रभावित करने के लिए बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स के सामने ग्लोबल सॉवरेन डिजिटल करेंसी गवर्नेंस का प्रस्ताव पेश किया।
  • अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पहले ही साल 2016 में युआन को अपने विशेष आहरण अधिकार (SDR) बास्केट में शामिल कर लिया है।
  • भारत भी उन देशों में शामिल है, जो अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को स्थानीय मुद्रा में करने की कोशिश कर रहे हैं। फॉर्च्यून इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 19 देश पहले से ही रुपया व्यापार समझौता उपयोग कर रहे हैं।
  • भारत और मलेशिया व्यापार के लिए रुपये में लेनदेन पर तैयार हुए हैं।
  • अर्जेंटीना ने घोषणा की कि वह चीन से आयात के लिए डॉलर की बजाय चीनी मुद्रा युआन में भुगतान करेगा।
  • सऊदी अरब के वित्त मंत्री भी कह चुके हैं कि अमेरिकी डॉलर के अलावा अन्य किसी मुद्रा में व्यापार के लिए तैयार हैं।
  • ब्रिक्स समूह (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) ने इस साल मार्च में आपसी व्यापार के लिए एक सामान्य मुद्रा सहित सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की।

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