No-Confidence Motion: क्या हुआ था जब लाया गया मोदी सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव

केंद्र में सत्तारुढ़ मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के आखिरी साल में मानसून सत्र के दौरान विपक्ष की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में मंगलवार को बहस शुरू हो चुकी है।

कांग्रेस सांसद तरुण गोगोई ने अविश्वास प्रस्ताव पर बहस की शुरुआत की और मणिपुर मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री पर सवाल खड़े किए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की ओर से सजा पर रोक के चलते बहाल हुई लोकसभा सदस्यता के बाद कांग्रेस सांसद राहुल गांधी बहस की शुरुआत करने वाले थे।

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भारतीय जनता पार्टी ओर से पांच दिग्गज केंद्रीय मंत्री अविश्वास प्रस्ताव पर बहस में सरकार का पक्ष रख रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 अगस्त ( गुरुवार) को सदन में अपना वक्तव्य दे सकते हैं। इसके साथ ही अविश्वास प्रस्ताव पर तीन दिनों की बहस खत्म होगी और फिर सदन में इसको लेकर वोटिंग की जाएगी।

जिस प्रकार अभी लोकसभा चुनाव 2024 से पहले अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है, वैसे ही मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भी लोकसभा चुनाव 2019 से पहले जुलाई 2018 में मानसून सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। तब सदन में प्रस्ताव पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को साल 2023 में भी अविश्वास प्रस्ताव लाने को लेकर न्योता देते हुए मजाक में ही सही अपनी सरकार की वापसी की भविष्यवाणी कर दी थी।

क्या है अविश्वास प्रस्ताव लाने की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया
आइए जानते हैं कि मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव के दौरान क्या हुआ था? उसके राजनीतिक समीकरण कैसे थे और उसकी प्रमुख बातें क्या थीं? हालांकि इसके पहले थोड़ी चर्चा कर लेते हैं कि संसदीय चुनावी लोकतंत्र में अविश्वास प्रस्ताव क्या है और क्यों और कैसे लाया जाता है? संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सदन में विपक्ष का जो दल सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहता है उसे पहले स्पीकर को इसकी लिखित नोटिस देनी होती है। इसके बाद स्पीकर उस दल के किसी सांसद से इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए कहते हैं।

अविश्वास प्रस्ताव तभी स्वीकार किया जाता है जब इस प्रस्ताव को कम से कम 50 सांसदों का समर्थन हासिल हो। इसके बाद ही सदन में इस प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है और इसके बाद वोटिंग कराई जा सकती है या समर्थन और विरोध करने वाले सांसदों को खड़ा कर उनकी गिनती की जा सकती है। वैसे तो अविश्वास प्रस्ताव लाने का मकसद तो सरकार को गिराना ही होता है। क्योंकि किसी सरकार के अल्पमत में आने पर ही इसकी चर्चा होती है। मगर कुछ वर्षों से विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव का इस्तेमाल सरकारों को घेरने और चेतावनी देने के तौर पर भी करने लगा है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक इस बार भी ऐसा ही किया है। साल 2018 में भी ऐसा ही किया गया था। तब भी मोदी सरकार अल्पमत में नहीं थी। उसके पास पर्याप्त सांसदों का समर्थन था और उसे कोई खतरा नहीं था।

मोदी सरकार के खिलाफ पहले अविश्वास प्रस्ताव में क्या था संसद का गणित
जुलाई, 2018 में सदन का मानसून सत्र चल रहा था। मोदी सरकार को अविश्वास प्रस्ताव से कोई खतरा नहीं था। बीजेपी अकेले ही बहुमत के आंकड़े (272) को पार करके सुरक्षित थी। एनडीए के सांसदों को जोड़ने पर तो यह जादुई आंकड़ा और बढ़ा हुआ था। कुछ वक्त पहले तक मोदी सरकार की सहयोगी रही तेलूगु देशम पार्टी के श्रीनिवास केसिनेनी ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। उनसे पहले सदन में वाईएसआर कांग्रेस की ओर से भी अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई लेकिन हंगामे की वजह से यह पेश नहीं हो सका था। लोकसभा में 16 सांसदों वाली तेलूगु देशम पार्टी की ओर से मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर 11 घंटे से अधिक बहस हुई थी।
लोकसभा में उस समय विभिन्न दलों के सदस्यों की संख्या इस प्रकार थी। सत्तारुढ़ बीजेपी के पास 274 सांसद थे।

इसके अलावा कांग्रेस के 48, एआईएडीएमके के 37, टीएमसी के 34, बीजेडी के 20, शिवसेना के 18, टीडीपी के 16, टीआरएस के 11, सीपीएम के 9, वाईएसआर कांग्रेस के 9, समाजवादी पार्टी के 7 और 25 अन्य पार्टियों के 56 सांसद थे। लोकसभा में 5 सीटें खाली थीं। इस समीकरण के हिसाब से टीडीपी के एनडीए से बाहर होने के बाद भी शिवसेना 18, एलजेपी 6, अपना दल 2, आरएलएसपी 3 , जेडीयू 2 और अकाली 4 जैसे एनडीए के साथी दलों का समर्थन सरकार को हासिल था। इन्ही सब वजहों से वोटिंग के बाद सदन में विपक्ष का लाया गया अविश्वास प्रस्ताव गिर गया था। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में कुल 126 वोट पड़े थे, जबकि उसके विपक्ष में 325 वोट पड़े थे।

विपक्ष के पास 'मोदी हटाओ' ही एकमात्र मुद्दा, अविश्वास प्रस्ताव पर दिया था जवाब
नियम के मुताबिक लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीडीपी और विपक्षी सांसदों की नारेबाजी और हंगामे के बीच अपना जवाब दिया था। उन्होंने दो टूक कहा था कि विपक्ष के पास 'मोदी हटाओ' ही एक मात्र मुद्दा है। पीएम मोदी ने चर्चा में भाग लेने वाले सभी सांसदों का धन्यवाद देने के साथ ही कहा था कि बदलते हुए वैश्विक परिवेश में हम सभी को साथ मिल कर चलने की आवश्यकता है। हम सभी देशवासियों के लिए जी जान से काम करने का उद्देश्य ले कर आए हैं। उन्होंने विपक्ष को निमंत्रण दिया था कि विपक्ष लोकसभा चुनाव 2024 से पहले एक बार फिर अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि सरकार ने नया क़ानून बनाया है जिसके बाद बैंक का लोन ना चुकाने वालों के लिए अब बचना मुश्किल होगा।

पीएम मोदी ने कांग्रेस पर किया था करारा वार, बैंक लोन लूट के लिए ठहराया जिम्मेदार
उन्होंने कहा था कि देश के लिए ये जानना जरूरी है कि जब हम 2014 में आए तो कई लोगों ने कहा कि इकोनॉमी पर श्वेतपत्र लाया जाए। कहानी 2008 में शुरू हुई थी जब एक साल बाद चुनाव होने वाले थे। कांग्रेस को लगा था कि जितना बैंक खाली किया जा सकता है, कर लेना है। कांग्रेस जब तक सत्ता में रही, बैंकों को लूटने का काम चलता रहा।

आजादी के 60 सालों में हमारे देशों की बैंकों ने 18 लाख करोड़ रूपये लोन में दिए, लेकिन 2008 से 2014 में ये रकम 18 लाख करोड़ से 52 लाख करोड़ हो गई। इस तरह देश एनपीए के जाल में फंसता गया। पीएम मोदी ने अपने भाषण में किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य डेढ़ गुना तक करने, वन रैंक वन पेंशन और जीएसटी का विषय लागू करने की चर्चा करते हुए आंध्र के लोगों को विश्वास दिलाया था कि केंद्र सरकार आंध्र की जनता के कल्याण में पीछे नहीं रहेगी। पीएम मोदी ने भारत विभाजन का जिक्र किया और कहा था कि आज भी हम मुसीबत झेल रहे हैं।

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