Uniform Civil Code: यूनिफॉर्म सिविल कोड पर क्या कहता है संविधान, जानें हर पहलू

Uniform Civil Code, 9 दिसंबर 2022 को संसद में यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल रखा गया है। भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने यह प्रस्ताव पेश किया। हालांकि, इसे लेकर संसद में हंगामा भी मचा और विपक्ष ने इस बिल का जमकर विरोध किया है।
आखिर क्या है समान नागरिक कानून
इसका मतलब है कि देश में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होगा। चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। UCC जहां भी लागू किया जाएगा, वहां शादी, तलाक, जमीन-जायदाद और गोद लेने के नियम में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। इसमें धर्म, संप्रदाय, जेंडर के आधार पर भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होती है। फिलहाल धर्म के आधार पर इन मसलों के लिए अलग-अलग कानून हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसियों का अपना-अपना पर्सनल लॉ है जबकि हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं।
यहां गौर करने वाली बात ये है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में भारत में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून का प्रावधान लागू करने की बात कही गई है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य' के सिद्धांत का पालन भी करना है। अब सवाल ये है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में इसको लागू करना क्या इतना आसान है। जहां आजादी के इतने वर्षों से सभी को अपने-अपने धर्मों के हिसाब से रहने और जीने की आजादी है।
किन राज्यों में UCC को लेकर चल रही है प्रक्रिया
सबसे पहले आपको इस बात की जानकारी दें कि भारत में गोवा इकलौता ऐसा राज्य है। जहां पर समान नागरिक संहिता (UCC) लागू है। ये पुर्तगाली नागरिक संहिता 1867 के नाम से मशहूर है। दरअसल गोवा के भारत में 1961 में विलय के बाद भी कोड वहां लागू रहा।
जबकि देश के कई राज्य उत्तराखंड, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक में समान नागरिक संहिता पर ड्राफ्ट लाने की तैयारी राज्य सरकार द्वारा की जा रही है। इसके लिए कई राज्यों द्वारा एक्सपर्ट कमेटी भी बनाई जा चुकी है। हालांकि, ये सभी राज्य बीजेपी शासित प्रदेश हैं।
देश को UCC की क्या जरूरत है?
1975 में लगाए गए आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के जरिए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द जोड़ा गया था। इसके तहत ये कहा गया था कि सरकार किसी खास धर्म का समर्थन नहीं करेगी लेकिन UCC के पक्ष में धार्मिक आधार पर पर्सनल लॉ होने की वजह से संविधान के पंथनिरपेक्ष की भावना का उल्लंघन होता है। UCC के आने के बाद से धर्म, जाति, लिंग, लैंगिक समानता के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। UCC नहीं होने की वजह से शादी, तलाक, हलाला, बहुविवाह, उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर विशेष समुदाय की महिलाओं के साथ भेदभाव और शोषण होता है।
एक पक्ष क्यों करता है इसका विरोध
अल्पसंख्यक समुदाय के लोग UCC का खुलकर विरोध करते हैं। दरअसल आजादी के बाद से ही ये समाज इसे उनके निजी जीवन में दखल मानता है। इनका कहना है कि संविधान के मौलिक अधिकार के तहत अनुच्छेद 25 से 28 के बीच हर शख्स को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। इसलिए हर धर्म पर एक समान पर्सनल लॉ थोपना संविधान के साथ खिलवाड़ करना है। अगर इसे लागू कर दिया जाए तो ये उसके अधिकारों को छीनने के बराबर होगा। वहीं मुसलमानों को तीन शादियां करने का अधिकार नहीं रहेगा। तलाक देने के लिए कानून का पालन करना होगा और शरीयत के हिसाब से जायदाद का बंटवारा नहीं होगा। साथ ही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 371(A-J) में देश के आदिवासियों को अपनी संस्कृति के संरक्षण का अधिकार है। अगर हर किसी के लिए समान कानून लागू किया जाएगा तो देश के अल्पसंख्यक समुदाय और आदिवासियों की संस्कृति पर असर पड़ेगा।
UCC पर क्या कहता है संविधान
वहीं संविधान को देखें तो भाग 4 में UCC का जिक्र किया गया है। अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्व को शामिल किया गया है। इसी हिस्से के अनुच्छेद 44 में नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।
अब यहां सवाल उठता है कि जब संविधान में इसका जिक्र है तो आजादी के बाद इस पर कोई कानून क्यों नहीं बना? दरअसल संविधान के भाग 3 में देश के हर नागरिक के लिए मूल अधिकार की व्यवस्था की गई है, जिसे लागू करना सरकार के लिए बाध्यकारी है। जबकि संविधान के भाग 4 में जिन नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया गया है, उसे लागू करना सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है। अब बाध्यकारी नहीं होने की वजह से ही देश में अब तक UCC नहीं बन पाया है।
सुप्रीम कोर्ट की राय 'स्पष्ट'
कई मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों में भी ये सवाल उठती रही है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी कई बार कहा गया है कि देश में अलग-अलग पर्सनल लॉ की वजह से भ्रम की स्थिति बन जाती है। सितंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने निराशा जताई थी कि समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई ठोस कोशिश नहीं की गई है।
अक्टूबर 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि केंद्र सरकार एक समान कानून बनाकर पर्सनल लॉ की विसंगतियों को दूर कर सकती है। वहीं साल 2022 के अक्टूबर महीने में केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट को हलफनामा दायर कर कहना पड़ा कि वो संसद को समान नागरिक संहिता पर कोई कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती है।
साथ ही आपको बता दें कि साल 1985 का शाह बानो का 'ट्रिपल तलाक' और साल 1995 का सरला मुद्गल का मामला (बहुविवाह केस) की सुनवाई के दौरान भी कोर्ट की तरफ से एक समान कानून बनाने की मांग उठती रही है।












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