VP Singh: ओबीसी आरक्षण लागू करने वाले PM थे वीपी सिंह, जिन्होंने आंबेडकर को भारत रत्न सम्मान भी दिया
1989 के लोकसभा चुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस 1984 में प्राप्त 405 सीटों से बहुत नीचे उतर कर मात्र 197 सीटें जीत पाई थीं। पांच साल में कांग्रेस को 200 से ज्यादा सीटों का नुकसान हुआ था। इसका कारण था कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा कांग्रेस छोड़कर पुरानी जनता पार्टी के नेताओं के एक धड़े जनता दल का नेतृत्व करना और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार में हुए बोफोर्स घोटाले को उजागर करके जनता में आक्रोश उत्पन्न करना।

विश्वनाथ प्रताप सिंह, जिन्हें वी. पी. सिंह के नाम से जाना जाता है, के नेतृत्व में 1989 चुनावों में जनता दल को 143 सीटें प्राप्त हुईं। इसके बाद अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनाने के प्रयास प्रारंभ हुए। जनता दल का कहना था कि विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाये। इसके लिए अन्य दलों के नेताओं को मनाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इन नेताओं में सबसे बड़ा नाम चंद्रशेखर का था। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि विश्वनाथ अगर आप नेता का चुनाव लड़ रहे है, तो मैं भी लड़ूंगा। संतोष भारतीय की पुस्तक 'वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं' में लेखक ने इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन किया है।
उन्होंने अपनी किताब में लिखा कि अरुण नेहरू ने एक योजना बनाई। इसमें सबसे पहले बीजू पटनायक को तैयार किया गया और उसके बाद देवीलाल को भी प्लान समझाया गया। उनकी योजना थी कि हम चंद्रशेखर से कहेंगे कि हम वी.पी. सिंह की जगह संसदीय दल के नेता के रूप में देवीलाल का नाम प्रस्तावित करेंगे। इसके बाद जब देवीलाल को विजयी घोषित किया जाएगा तो वह अपनी तरफ से विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम प्रस्तावित कर देंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही।
2 दिसंबर 1989 को जैसे ही देवीलाल का नाम घोषित हुआ तो संसद में एक खामोशी छा गयी। पर जैसे ही देवीलाल ने वी.पी. सिंह का नाम प्रस्तावित किया तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। और इस तरह विश्वनाथ प्रताप सिंह यानी वी.पी. सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। आज उनके जन्मदिन के मौके पर हम आपको उनसे जुड़े कुछ किस्सों के बारे में बताएंगे।
राजनीतिक सफर पर एक नजर
राजा बहादुर राय गोपाल सिंह के पुत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून 1931 को इलाहाबाद में हुआ था। वह 1947-48 में वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज में छात्र संघ के अध्यक्ष और इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष रहे। इसके बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य बने। दो बार लोकसभा सांसद व एकबार राज्यसभा के सांसद भी रहे। इस दौरान 1980 से 1982 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 1983 में फिर से केंद्र में आए और केंद्रीय वाणिज्य मंत्री होने के साथ साथ आपूर्ति विभाग का अतिरिक्त प्रभार संभाला। वी.पी. सिंह 1984 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गये और 31 दिसंबर 1984 को केंद्रीय वित्त मंत्री बने।
राजीव गांधी से अनबन
प्रधानमंत्री राजीव गांधी से खटपट के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़कर अपना खुद का सियासी दल जन मोर्चा बनाया तो उसमें आरिफ मोहम्मद खान भी शामिल थे। साथ ही चौधरी देवीलाल, मुलायम सिंह यादव, डॉ. संजय सिंह और जफर अली नकवी भी जुड़ गये। राजीव गांधी की सरकार में बतौर वित्त मंत्री से इस्तीफा देकर चुनाव मैदान में उतरे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स में दलाली के मुद्दे पर राजीव गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया था। चुनावी सभाओं में वी.पी. सिंह जेब से एक पर्ची निकालते थे और बताते थे कि इस पर्ची में वे नाम लिखे हैं जो बोफोर्स की दलाली में शामिल थे। वह कहते थे कि इधर प्रधानमंत्री पद की शपथ लूंगा उधर बोफोर्स दलालों को जेल भेजने का काम करुंगा।
मंडल कमीशन और वीपी सिंह
डॉ. भीम राव आंबेडकर को हर राजनीतिक दल महत्व देता है। पर क्या आप जानते हैं कि आंबेडकर को सरकारी तौर पर सम्मानित करने की शुरुआत वी.पी. सिंह के समय ही शुरू हुई थी। वी.पी. सिंह के कार्यकाल में भारतीय समाज की छह हजार से ज्यादा जातियों को सिर्फ चार बड़े वर्गों में बांट दिया गया था। इनमें अनुसूचित जाति और जनजाति तो पहले से ही थी। इसमें बाद में दो अन्य वर्ग जोड़े गए, जिनमें अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग शामिल हैं। आज भारत में हर नागरिक इन चार श्रेणियों में से किसी एक पहचान के साथ देखा जाता है। उस समय मंडल कमीशन की सिफारिशों को देश में लागू कर दिया था।
वी.पी. सिंह के इस फैसले से ओबीसी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिला। वहीं, दूसरी ओर इसी फैसले की वजह से सवर्ण समाज की नजर में वह विभाजनकारी व्यक्तित्व बन गये। आपको बता दें कि संसद के सेंट्रल हॉल में आंबेडकर की तस्वीर लगाने से लेकर उन्हें भारत रत्न देने तक के फैसले वी.पी. सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ही लिये गये थे। शायद ही यह बात किसी को पता हो कि उन्होंने भूदान आंदोलन में हिस्सा लेते हुए अपनी अधिकांश जमीन दान में दे दी थी। इसके बाद परिवार वालों ने उनसे नाता तोड़ लिया था।
लंबे समय तक कांग्रेस नेता रहे वी. पी. सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्र में कई बार मंत्री भी बने। लेकिन प्रधानमंत्री बनने का अवसर उन्हें कांग्रेस छोड़ने पर ही मिला, जब 1989 में भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों के सहयोग से उन्होंने जनता दल की सरकार बनाई। हालांकि 1990 में लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम मंदिर निर्माण हेतु निकाली गई रथ यात्रा रोकने पर भाजपा ने वी. पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और वी. पी. सिंह सरकार गिर गई। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से जनता दल से अलग हुए एक धड़े ने चंद्रशेखर के नेतृत्व में सरकार बनाई। हालांकि चार महीने बाद ही कांग्रेस ने उससे अपना समर्थन वापस ले लिया और चंद्रशेखर सरकार भी गिर गई।












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