इतिहास के पन्नों से- आओ चलें फकीरों की मजार पर सजदा करने
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) रूहानियत का दूसरा नाम बस्ती राजधानी की निजामउद्दीन है। ये जगह इसलिए खास है क्योंकि इधर मजार हैं हजरत निजामउद्दीन औलिया साहब की तथा उनके शिष्य अमीर खुसरो साहब की। दोनों बेहद पहुंचे हुए सूफी-फकीर थे। राजधानी के केन्द्र यानी कनॉट प्लेस से मुश्किल से ये जगह 15 मिनट की ड्राइव है।
आते सैकड़ों लोग
माहे रमजान हो या बाकी दिन-महीने, इधऱ गहमागहमी बनी रहती है। हजरत निजामउद्दीन औलिया साहब और उनके चेले खुसरो साहब की दरगाह पर रोज सैकड़ों लोग पहुंचते हैं। आप जैसे ही वेस्ट निजामउद्दीन पहुंचते है बस्ती निजामउद्दीन में जाने के लिए तो आपको कव्वालियों के गूंजने की आवाजें सुनाई देने लगती हैं।
जैसे-जैसे आप इन दोनों फकीरों की मजार के पास पहुंचते हैं तो कव्वालियों के आवाजें आपको तेज सुनाई देने लगती हैं। छाप तलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइकें या मेरा पीर सबका वलि है जैसे बोलों पर आधारित कव्वालियों पर लोग झूम रहे होते हैं।
इतिहास के पन्नों से-रमजान पर रौनक जामा मस्जिद की
रूहानियत की महक
सारे माहौल में एक अलग किस्म की रूहानियत होती है। लगता है कि इंसान किसी दूसरे जहां में आ गया है। उस जहां में जिधर करियर, पैसा,शोहरत जैसे शब्दों के लिए कोई स्थान नहीं है।
दिल्ली दूर अस्त
दरअसल हजरत निजामउद्दीन औलिया साहब के लिए कहते हैं कि वे जब राजधानी में रहते थे, तब अलाउद्दीन खिलजी का राज था। खिलजी बेहद घटिया किस्म का राजा था। उसे हजरत निजामउद्दीन औलिया साहब से नाराजगी रहती थी वे उनके दरबार में हाजिरी देने के लिए नहीं आते।
वह एक बार आगरा से आ रहा था। उसने अपने लोगों से कहा कि वे हजरत निजामउद्दीन औलिया साहब को उनके दरबार में पेश होने के लिए कहे। जब ये बात उन्हें बताई गई तो उन्होंने कहा कि दिल्ली दूर अस्त। राजा दिल्ली आने से पहले ही खुदा के घर चला गया।
पाकिस्तान से भी
इन दोनों फकीरों की मजारों पर लगने वाले सालान उर्स में पाकिस्तान से भी हर साल सैकड़ों लोग पहुंचते हैं। यहां पर राजा से लेकर रंक आते हैं उन महान फकीरों का आशीर्वाद लेने के लिए।













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