इतिहास के पन्नों से- पटना जाएं तो सदाकत आश्रम जाना मत भूलें
नई दिल्ली- पटना(विवेक शुक्ला) आप बिहार की राजधानी पटना जाएं और वहां पर सदाकत आश्रम न जाएं, ये कैसे हो सकता है। गंगा से सटा है सदाकत आश्रम। इससे बापू से लेकर देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का गहरा संबंध रहा। बापू इधर लगातार आते रहे। राजेन्द्र बाबू ने अपने जीवन के अंतिम दिन इधर ही गुजारे। उन्होंने 28 फ़रवरी, 1963 को इसी आश्रम में अंतिम साँसें ली थीं।
बापू ने किया था शिलान्यास
सदाकत आश्रम से ही आजकल बिहार कांग्रेस पार्टी का दफ्तर चलता है। सदाकत आश्रम को करीब से जानने वाले मृत्युजंय सिंह कहते हैं कि इसकी स्थापना 1921 में की गई थी। महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी ने सदाकत आश्रम का शिलान्यास किया था।
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जयप्रकाश नारायरण का दौर
स्वाधीनता आंदोलन और फिर जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के दौर में ये क्रांतिकारियों की गतिविधियों का गढ़ रहा। जाहिर है, इन सब वजहों के चलते सदाकत आश्रम का अपना विशेष स्थान है बिहार और देश के लिए।
सब करते थे आदर
इसकी मौलाना मजरूल हक ने असहयोग आन्दोलन के दौरान स्थापना की थी। उनका हिन्दू-मुसलमान सभी आदर करते थे। वे हिन्दू-मुसलमानों के बीच सौहार्दपूर्ण संबध बनाए रखने के लिए लगातार काम करते रहे। बता दें कि सदाकत का अरबी में अर्थ होता है सत्य।
भाजपा सांसद आर.के. सिन्हा तो सदाकत आश्रम को किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं मानते। वे याद करते हैं उस दौर को जब बिहार और पटना में माता-पिता अपने बच्चों को इधर लेकर आते थे ताकि उनमें देश भक्ति की भावना के संस्कार पैदा हो सकें।
बेशक, सदाकत आश्रम राष्ट्रीय आन्दोलन में बिहार का मुख्यालय रहा था। आज़ादी की लड़ाई के दौर में सदाकत आश्रम में स्वाधीनता सेनानी मिलकर अहम फैसले लेते थे। उनकी गर्मागर्म बैठकें इधर होती थीं। इधर आजकल राजेन्द्र बाबू का संग्रहलाय भी है। इधर उनके जीवन से जुड़ी बहुत सी चीजें रखी हुईं है। जिन्हें रोज देखने के लिए आते हैं।













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