Uniform Civil Code: कई इस्लामिक देशों में भी लागू है समान नागरिक संहिता कानून
उत्तराखंड विधानसभा में पारित किए गए समान नागरिक संहिता विधेयक की असम से सांसद और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल ने कड़ी आलोचना की है और कहा है कि इस कानून को कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए।
उनका आरोप है कि उत्तराखंड के भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुश करने के लिए ऐसा किया है और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी कुछ ऐसा ही करने वाले हैं। असम सरकार विधानसभा के आगामी बजट सत्र के दौरान बहुविवाह पर प्रतिबंध पर निर्णय कर सकती है।

समान नागरिक संहिता पर मुस्लिम विरोध क्यों
बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि भारत में सांस्कृतिक विविधता को बरकरार रखना चाहिए, क्योंकि प्रकृति के खिलाफ किया गया कोई भी काम लंबे समय तक जारी नहीं रह सकता। असम के ही कांग्रेस सांसद अब्दुल खालिक ने आरोप लगाया कि यूसीसी लागू करने का कदम सिर्फ ध्रुवीकरण का प्रयास है। उन्होंने कहा, "वे ध्रुवीकरण के लिए यूसीसी लाते हैं, लेकिन इसे लागू करना संभव नहीं है"।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी समान नागरिक संहिता पर एतराज जताते हुए कहा है कि "ऐसी किसी समान नागरिक संहिता की कोई जरूरत नहीं है"। बोर्ड के कार्यकारी सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने समान संहिता की प्रकृति पर सवाल उठाते हुए अपनी चिंता व्यक्त की।
यूसीसी पर देश भर में छिड़ी बहस
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड विधानसभा में 6 फरवरी को यूसीसी बिल पेश किया। इस विधेयक में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन रिलेशनशिप और संबंधित मामलों से जुड़े कानून शामिल हैं। इसके साथ ही देश में समान नागरिक कानून को लेकर मुस्लिम नेताओं में प्रतिक्रिया जाहिर करने की होड़ लग गई है। जबकि समान नागरिक संहिता किसी खास मजहब या समुदाय का मुद्दा नहीं है। देश में लंबे समय से मुस्लिम संगठनों और इस्लामिक बुद्धिजीवियों की ओर से भी समान नागरिक कानून की मांग की जाती रही है।
इस्लामिक स्कॉलर और मुस्लिम संगठन भी करते रहे हैं समान कानून की मांग
समान नागरिक संहिता को मुस्लिम समाज पर निशाना बताने वालों के लिए समझने वाली बात यह है कि देश में लंबे समय से खुद इस्लामिक स्कॉलर और सामाजिक संगठन इस कानून की मांग करते रहे हैं। साल 1972 में महाराष्ट्र मुस्लिम विमेंस कांफ्रेंस का पुणे में आयोजन किया गया। महाराष्ट्र सहित कोलकता, दिल्ली, सूरत जैसे शहरों से आई लगभग 150 महिलाओं ने तब न सिर्फ अपने मौलिक अधिकारों की मांग उठाई बल्कि एक स्वर में समान नागरिक संहिता का भी समर्थन किया। इस कांफ्रेंस की अध्यक्षता शरीफा तैयबजी ने की थी।
इसके दो साल बाद 1974 में छह गणमान्य मुस्लिम विद्वानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलकर एक ज्ञापन सौंपा था। इस प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया था कि मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, इसलिए भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान संहिता होनी चाहिए।
कांग्रेस सरकार ने भी 1967 में ही बहु-विवाह खत्म करने का दिलाया था भरोसा
मुस्लिम महिलाओं के लिए एक साथ तीन तलाक को हाल ही में भाजपा सरकार ने गैरकानूनी बनाया, लेकिन उसके बहुत पहले कांग्रेस ने मुस्लिम कौम में प्रचलित बहु-विवाह को खत्म करने का भरोसा दिलाया था। 21 दिसंबर 1967 को केन्द्रीय विधि मंत्री गोविंद मेनन ने लोकसभा में कहा था, "संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार सरकार यह प्रयास करती रहेगी कि भारत में बहुविवाह प्रथा बिल्कुल समाप्त हो जाए"। प्रगतिशील बताए जा रहे समान नागरिक कानून में बहु-विवाह पर लगाम का प्रावधान किया जाने वाला है। इस्लामिक विद्वान इसके लिए भी लंबे समय से मांग उठाते रहे हैं। अब असम सरकार ने इसको लेकर बहस छेड़ दी है।
समान नागरिक संहिता पर मुस्लिम महिला विद्वानों की सुलझी हुई राय
जर्मन रेडियो डॉयचे वैले से बातचीत करते हुए संवैधानिक विशेषज्ञ शिरीन तबस्सुम ने समान नागरिक कानून को लेकर कहा, "अगर इस कानून से समानता आती है, तो यह मुस्लिम महिलाओं के लिए फायदेमंद होगा। यूसीसी से लैंगिक भेदभाव खत्म होगा"।
महिला अधिकार कार्यकर्ता जाकिया सोमन भी इस बात से सहमत हैं कि यूसीसी के तहत लैंगिक न्याय और समानता को बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने कहा, "जब नेताओं ने यूसीसी की परिकल्पना की थी, तब उनके मन में भारतीय महिलाओं के अधिकारों के बारे में चिंताएं सबसे ऊपर थीं। यह कानून लैंगिक तौर पर हो रहे भेदभाव को जड़ से खत्म करने और सभी को न्याय दिलाने वाला होना चाहिए"।
जाकिया सोमन ने आगे कहा, "मुस्लिम महिलाओं को शादी, तलाक और पारिवारिक कानून के मामलों में कानूनी सुरक्षा की सख्त जरूरत है। दुर्भाग्य की बात यह है कि धार्मिक गुरु मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार करने में विफल रहे हैं। इसके कारण काफी ज्यादा भेदभाव हुआ है और महिलाओं को न्याय नहीं मिला। एक बेहतर यूसीसी इस भेदभाव को काफी हद तक दूर कर सकता है"।
कई मुस्लिम देशों में भी लागू है समान नागरिक संहिता
समान नागरिक संहिता के बारे में विस्तार से लिखने वाली स्तंभकार आमना बेगम अंसारी का कहना है कि इन मानदंडों को बदलने की जरूरत है। उन्होंने कहा, "बहुविवाह बिल्कुल खत्म होना चाहिए। शादी की उम्र सभी के लिए एक समान होनी चाहिए। कम उम्र की लड़कियों के साथ शादी को बलात्कार माना जाना चाहिए"।
वहीं, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इस्लामिक स्टडीज के प्रोफेसर अख्तरुल वासे ने कहा है कि समान नागरिक संहिता किसी एक धर्म की समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध सभी धर्मो से है। इसलिए मुसलमानों को इस पर गैर जरूरी प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए।
समान नागरिक संहिता को लागू करने वाले मुस्लिम देशों की लंबी लिस्ट में पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे देश शामिल हैं। इसके अलावा अमेरिका और आयरलैंड समेत कई पश्चिम के भी देश हैं जहां यह कानून लागू है।












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