Uniform Civil Code: समान नागरिकता कानून से जुड़े पांच सवाल और उनके जवाब
Uniform Civil Code: जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर सार्वजनिक रूप से बात की है तभी से पूरे देश में यूसीसी चर्चा का विषय बना हुआ है। अब केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए यूसीसी पर ड्राफ्ट बनाने की तैयारी के लिए मंत्री समूह (जीओएम) का गठन किया है। जिसकी अध्यक्षता पृथ्वी विज्ञान मंत्री किरेन रिजिजू को सौंपी गयी है।
इसी बीच, यूसीसी पर उत्तराखंड सरकार द्वारा गठित जस्टिस रंजना देसाई कमेटी का मसौदा तैयार है। ऐसा कहा जा रहा है कि सबसे पहले उत्तराखंड सरकार यूसीसी लागू करने जा रही है। इसके बाद गुजरात व मध्य प्रदेश में इसे लागू किए जाने की संभावना है।

दरअसल, समान नागरिक संहिता सामाजिक मामलों से संबंधित एक कानून है जो विभिन्न धर्मों के लोगों के लिए शादी, तलाक, बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया, संपत्ति का अधिकार से जुड़े कानूनों में समान रूप से लागू होता है। आसान शब्दों में कहें तो जिस देश में समान नागरिक संहिता लागू है, वहां अलग-अलग पंथ और मजहबों के लिये अलग-अलग सिविल कानून नहीं होते। यानी देश के हर नागरिक पर एक ही कानून लागू होगा जो किसी भी पंथ जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है।
संविधान में क्या कहा गया?
समान नागरिक संहिता भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 का हिस्सा है। संविधान में इसे नीति निदेशक तत्व में शामिल किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार का दायित्व है। अनुच्छेद 44 उत्तराधिकार, संपत्ति अधिकार, शादी, तलाक और बच्चे की कस्टडी के बारे में समान कानून की अवधारणा पर आधारित है।
मगर, संविधान का अनुच्छेद 25 इसके आड़े आ जाता है। यूसीसी का विरोध करने वालों का कहना है कि समान नागरिक संहिता का मतलब हिन्दू कानूनों को सभी धर्मों पर लागू करने जैसा है, जबकि अनुच्छेद 25 किसी भी धर्म को मानने और उसके प्रचार की आजादी देता है। साथ ही इसका विरोध करने वाले आर्टिकल-14 की भी बात करते है कि यूसीसी समानता की अवधारणा के विरूद्ध है। वैसे भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान 'आपराधिक संहिता' है, लेकिन समान नागरिक कानून नहीं है।
क्या है समान नागरिक संहिता का इतिहास?
ऑर्ब्जबर रिसर्च फाउंडेशन के एक लेख के मुताबिक ऐतिहासिक रूप से यूनिफॉर्म सिविल कोड का विचार 19वीं और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोपीय देशों में तैयार किया गया था। इसी के तहत सिविल कोड की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में भी हुई। पहली बार भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का जिक्र 1835 में ब्रिटिश सरकार की एक रिपोर्ट में किया गया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि अपराधों, सबूतों और ठेके (अनुबंध) जैसे मसलों पर समान कानून लागू होना चाहिए। हालांकि, इस रिपोर्ट में ये कहीं नहीं कहा गया था कि इस कानून को लाने के लिए हिंदू और मुसलमानों के धार्मिक कानूनों में कोई फेरबदल की जाएगी या उनसे छेड़छाड़ की जायेगी।
हालांकि, 1857 के युद्ध के बाद अंग्रेजों को एक सख्त संदेश दिया कि वे भारतीय समाज के ताने-बाने को न छेड़े तथा शादियां, तलाक, मेनटेनेंस, गोद लेने और उत्तराधिकार जैसे मामलों से संबंधित कोड में कोई बदलाव लाने की कोशिश नहीं करें।
कैसे आया हिंदू कोड बिल का अस्तित्व?
साल 1937 में ब्रिटिश शासन के दौरान ही हिंदू महिलाओं का संपत्ति का अधिकार अधिनियम 1937 लागू किया गया था, जिसे देशमुख बिल भी कहा जाता है। इसी बिल के आधार पर सर बेनेगल नरसिंह राव अध्यक्षता में 'बीएन राव कमेटी' का गठन 1944 में किया गया था। इस कमेटी का मकसद भारत में हिंदू लॉ की जरूरत को परखना था। साल 1947 में इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट संसद को सौंप दी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि अब देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिया जाये। वहीं इस सिफारिश को तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने इसे यूनिफॉर्म सिविल कोड की जगह हिंदू कोड बिल में बदलकर पास कर दिया।
जब यह हिंदू कोड बिल लाया गया तब इसका भारी विरोध हुआ था। इसके तहत हिंदू धर्म के लोगों को सिर्फ एक शादी, तलाक से जुड़े नियम और महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने की बात कही गयी थी। तब 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बिल पर नाराजगी जतायी थी। उन्होंने कहा था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड की जगह किसी धर्म विशेष को कानून के दायरे में लाना मुश्किलें पैदा कर सकता है। काफी हो हंगामे के बाद भी नेहरू सरकार ने साल 1956 में हिंदू कोड बिल पर मुहर लगा दी थी।
संविधान सभा में पहली बार यूसीसी पर हुई तीखी बहस?
23 नवंबर 1948 को पहली बार संविधान सभा में समान नागरिक संहिता पर हुई बहस का पूरा ब्यौरा दिया गया है। इसके मुताबिक बॉम्बे (अब की मुंबई) की संविधान सभा के सदस्य मीनू मसानी ने प्रस्तावित किया था। उन्होंने अनुच्छेद 35 में समान नागरिक संहिता की बात कही थी। इस पर सबसे पहले महिला सदस्यों का समर्थन मिला था।
संविधान सभा में 15 महिला सदस्य थीं, इनमें हंसा मेहता शामिल थीं। उन्होंने मौलिक आधिकार उप-समिति के सदस्य के तौर पर यूसीसी की पैरवी की थी। इसके अलावा राजकुमारी अमृतकौर, मीनू मसानी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने भी समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था। यहां तक खुद जवाहरलाल नेहरू समेत पूरी कांग्रेस भी इसके पक्ष में थी। उसी संविधान सभा में यूसीसी का विरोध पांच मुस्लिम सदस्यों (मोहम्मद इस्माइल, नजीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग, बी. पोकर साहब, अहमद इब्राहिम) ने किया था।
संविधान सभा की इस चर्चा के दौरान मद्रास के एक सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने इस प्रस्ताव में अनुच्छेद 35 में इस बात को जोड़ने के संदर्भ देते हुए कहा कि 'बशर्ते कोई भी समूह, वर्ग या लोगों का समुदाय अपने निजी कानून को छोड़ने के लिए बाध्य नहीं होगा यदि उसके पास ऐसा कोई कानून है।' यानि किसी भी समुदाय के कानून, जिसे मान्यता दी गई है... उसमें तब तक बदलाव नहीं हो सकता है जब तक समुदाय की तरफ से इसकी इजाजत नहीं दी गई हो। उन्होंने कहा कि यह उस समुदाय के लोगों का मौलिक अधिकार है और अगर इसके साथ छेड़छाड़ की जाती है तो ये उन लोगों के जीवन के तरीके में हस्तक्षेप करने जैसा होगा।
इसके साथ ही पश्चिम बंगाल से आने वाले सदस्य नजीरुद्दीन अहमद ने भी चर्चा के दौरान कहा था कि समान नागरिक संहिता से सिर्फ मुसलमानों को असुविधा नहीं होगी, क्योंकि सिर्फ मुस्लिमों की नहीं बल्कि हर धार्मिक समुदाय की अपनी धार्मिक मान्यताएं और प्रथाएं हैं, जिनका वे पालन करते है।
समान नागरिक संहिता पर बहसों के बाद अंत में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सभा को आश्वासन देते हुए कहा था कि यूसीसी को फिलहाल लागू नहीं किया जाएगा। क्योंकि आर्टिकल 44 सिर्फ यह कहता है कि राज्य एक नागरिक संहिता बनाने का प्रयास करेगा। हालांकि, आंबेडकर ने भी कहा कि भविष्य में स्वैच्छित तरीके से संसद यूसीसी को लागू करने का प्रावधान कर सकती है।
देश के किस राज्य में 55 सालों से लागू है यूसीसी?
आज जिस समान नागरिक संहिता पर पूरे देश में बहस हो रही है। वो गोवा में 1869 से लागू है। दरअसल 19 दिसंबर को 1961 से पहले गोवा पर पुर्तगालियों का शासन था। साल 1867 में पहली बार पुर्तगाल में यूसीसी कानून बना था। जिसके दो साल बाद गोवा में भी इसे लागू कर दिया गया था। वहीं जब 19 दिसंबर, 1961 में गोवा आजाद हुआ और भारत का हिस्सा बना। तब भारत सरकार ने कई नियम कायदे-कानून बदले लेकिन भारत ने गोवा में लागू पोर्च्युगीस सिविल कोड नहीं बदला। जो आज भी 'गोवा सिविल कोड' के नाम से जाना जाता है। उसे अपने गोवा, दमन और दीव एडमिनिस्ट्रेशन एक्ट, 1962 के सेक्शन 5(1) में जगह दे दी। इस तरह आजाद भारत का पहला राज्य गोवा है जहां भारत सरकार की सहमति से समान नागरिक संहिता 1962 से लागू हुआ है। इसके तहत यहां सभी धर्मों के लोगों पर एक समान कानून लागू होता है।
हालांकि, इस सिविल कोड में एक बड़ी खामी भी है जिस पर सवाल उठते रहे है। इस कोड के मुताबिक हिंदू पुरुषों को यहां एक छूट दी गयी है। अगर कोई हिंदू पुरुष किसी स्त्री से विवाह करता है और उसकी पत्नी 30 साल की आयु तक एक बेटे (लड़का) को जन्म नहीं देती है तो पुरुष को कानूनी अधिकार है कि वह दूसरी शादी कर सकता है। सबसे बड़ी बात कि यह अधिकार सिर्फ हिंदू पुरुषों को मिला हुआ है।












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