Teachers' Shortage: जब मास्टर जी ही नहीं होंगे, तो बच्चे शिक्षित कैसे होंगे?
Teachers' Shortage: मास्टर जी स्कूल में नहीं होंगे तो दुनियां के ये बच्चें शिक्षित कैसे होंगे? यह चिंता हमारी-आपकी है, जिसे यूनेस्को ने अपने शब्दों में जारी किया है। पिछले हफ्ते 5 अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस मनाया गया। इस अवसर पर यूनेस्को ने जो आंकड़े जारी किए उससे पता चलता है कि विश्व में 44 मिलियन यानि लगभग साढ़े चार करोड़ शिक्षकों की कमी है। इससे और निराशाजनक बात यह है कि शिक्षकों के पेशे में जाने वाले लोग भी कम हैं। पढ़े-लिखे लोगों के लिए शिक्षक बनना आकर्षक करियर नहीं लगता। यूनेस्को ने भारत में भी 10 लाख से अधिक स्कूली शिक्षकों की कमी का आकलन किया है। देश के स्कूलों में कुल 19 प्रतिशत या 11.16 लाख शिक्षण पद खाली हैं।
शिक्षकों की भर्ती में समस्या केवल धन की नहीं
यूनेस्को का मानना है कि बिना बड़ी संख्या में शिक्षकों की भर्ती किए 2030 तक दुनिया के सभी प्राथमिक और माध्यमिक वर्ग के लिए योग्य बच्चों को शिक्षा नहीं दी जा सकेगी। शिक्षकों की भर्ती में समस्या केवल धन की नहीं है, बल्कि पेशे के प्रति घटती रुचि भी इसके लिए जिम्मेदार है। यूनेस्को के महानिदेशक ऑड्रे अज़ोले ने खास तौर पर यह ज़ोर दिया कि जहां दुनिया के कई देशों में शिक्षक की नौकरी के लिए उम्मीदवारों की कमी है, वहीं कुछ क्षेत्रों में शिक्षक के तौर पर काम कर रहे लोगों का इस पेशे को छोड़ कर चले जाना भी बड़ी समस्या है।

नौकरी छोड़ कर जा रहे हैं शिक्षक
शिक्षकों की कमी के मामले में भी दक्षिणी एशिया के देश ही दुनिया भर में आगे हैं। इस क्षेत्र में 78 लाख शिक्षकों की कमी है। यूनेस्को ने शिक्षा के क्षेत्र से नौकरी छोड़कर जाने वाले 79 देशों में अध्ययन किए हैं, जिससे पता चलता है कि प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों के बीच नौकरी छोड़ने की दर जो 2015 में 4.6 प्रतिशत थी, जो 2022 में लगभग दोगुनी होकर 9 प्रतिशत हो गई। जो कारण सामने आए हैं, उनमे खराब कामकाज की परिस्थितियाँ, उच्च स्तर का तनाव और कम वेतन हैं। अब यूनेस्को ने सभी देशों को यह सुझाव दिया है कि शिक्षकों की स्थिति में सुधार के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन दें, शिक्षक और शिक्षा पर बेहतर परामर्श कार्यक्रम चलाएं और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श भी शिक्षकों को दें।
ग्रामीण इलाकों में स्थिति बदतर
शिक्षकों की कमी दुनिया में हर जगह देखी जा रही है। खासकर स्कूल वर्ष की शुरुआत से पहले शिक्षण संस्थान शिक्षकों की भर्ती के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में भी यही दृश्य दिखाई दे रहा है। कम वेतन, लंबे समय तक काम और तनाव के कारण इस पेशे से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। अमेरिका के ग्रामीण इलाकों के बच्चे विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि इस क्षेत्र के स्कूल उपनगरीय स्कूलों के साथ शिक्षकों के लिए प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं हैं।
भारत में शिक्षक छात्र अनुपात ज्यादा
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) देशों में नार्वे और बेल्जियम की स्थिति काफी हद तक ठीक है। इन देशों में छोटी कक्षाओं में काम करने वाले शिक्षकों में प्रति शिक्षक औसतन लगभग 10 छात्र हैं, वहीं मेक्सिको की स्थिति एकदम उलट है। यहां प्रति शिक्षक लगभग 24 से 27 छात्र हैं। अमेरिका में प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा दोनों में प्रति शिक्षक लगभग 15 छात्र हैं। अभी 2023 में ही केंद्र सरकार ने लोक सभा में एक प्रश्न के उत्तर में कहा था कि देश में प्राथमिक स्तर के लिए छात्र-शिक्षक अनुपात का मानदंड प्रति 30 छात्रों पर एक शिक्षक और उससे ऊँची कक्षा के लिए 35 छात्रों पर एक शिक्षक है।
शिक्षकों की कमी का विद्यार्थियों की प्रगति, उपलब्धि और उनके व्यवहार पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे बच्चों को सीखने के संसाधनों का पर्याप्त प्रावधान नहीं हो पाता। कम शिक्षक सभी विद्यार्थियों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते हैं।
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