सात फेरे अब नहीं रहे सात जन्मों का साथ, जानिए क्यों?
लखनऊ। विवाह को भारत में सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है | विवाह का अर्थ है विशेष रूप से उत्तरदायित्व का वहन करना। पाणिग्रहण संस्कार हिन्दू धर्म में विवाह संस्कार को कहते हैं जो की रीति रिवाजों के अनुसार सात जन्मों का सम्बन्ध होता है।
हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है। किन्तु समय और परिस्तिथिक बदलावों के साथ इस सामाजिक संस्था में भी बड़ा बदलाव आया है, इसी से निपटने के लिए सरकार ने 1955 में हिन्दू विवाह अधिनियम के कानून को लागु किया।
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इस दौरान तीन अधिनियम पारित किये गये
- हिन्दू उत्तराधिका अधिनियम 1955
- हिन्दू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम 1956
- और हिन्दू एडॉप्शन और भरण पोषण अधिनियम 1956
इन सभी नियमों को लागू करने का मुख्य उद्देश्य हिन्दू विवाह की वैदिक रीतियों को आधुनिकता का कलेवर चढ़ाना था|
आपको बता दूं की इस कानून के तहत कौन कौन सी सुविधाए प्राप्त हैं -
अधिनियम द्वारा अब हिंदू विवाह प्रणाली में निम्नांकित परिवर्तन किए गए हैं :
- अब हर हिंदू स्त्री-पुरुष दूसरे हिंदू स्त्री-पुरुष से विवाह कर सकता है, चाहे वह किसी जाति का हो।
- एकविवाह तय किया गया है। द्विविवाह अमान्य एवं दंडनीय भी है।
- न्यायिक पृथक्करण, विवाह-संबंध-विच्छेद तथा विवाहशून्यता की डिक्री की घोषणा की व्यवस्था की गई है।
- प्रवृत्तिहीन तथा विवर्ज्य विवाह के बाद और डिक्री पास होने के बीच उत्पन्न संतान को वैध घोषित कर दिया गया है। परंतु इसके लिए डिक्री का पास होना आवश्यक है।
- न्यायालयों पर यह वैधानिक कर्तव्य नियत किया गया है कि हर वैवाहिक झगड़े में समाधान कराने का प्रथम प्रयास करें।
- बाद के बीच या संबंधविच्छेद पर निर्वाहव्यय एवं निर्वाह भत्ता की व्यवस्था की गई है। तथा
- न्यायालयों को इस बात का अधिकार दे दिया गया है कि अवयस्क बच्चों की देख रेख एवं भरण पोषण की व्यवस्था करे।
भारत की विचारधारा पर पश्चिमी सभ्यता का काफी असर
समय इस बात का साक्षी है की भारत की विचारधारा पर पश्चिमी सभ्यता का काफी असर है, ये किसी हद तक ठीक भी है लेकिन एक खुले विचार की महिला होने के नाते भी मैं यह सोच रखती हूँ की विवाह किसी भी धर्म में एक पवित्र बंधन होता है जिसे किन्ही छोटी मोटी परेशानियों या दिक्कतों पर तोड़ने के बारे में नहीं सोचना चाहिए, यह एक विश्वास है जो दोनों हम राहियों को आपस में होना बेहद जरूरी है।













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