Taiwan: ताइवान मामले पर चीन पूरी दुनिया को क्यों धमका रहा है?
Taiwan: चीन इस समय ताइवान को लेकर बेहद आक्रामक मुद्रा में है। जब से ताइवान में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी राष्ट्रपति का चुनाव जीत कर आई है, तभी से चीन पूरी दुनिया को यह धमकी दे रहा है कि जो भी ताइवान को एक स्वतंत्र देश मानकर उसके साथ कोई अलग राजनयिक संबंध स्थापित करेगा वह उसका दुश्मन होगा।

सैन्य बल की धौंस
बीजिंग छोटे और कमजोर देशों को पैसे और सैन्य बल की धौंस देकर ताइवान से संबंध खत्म करने के लिए मजबूर भी कर रहा है। प्रशांत क्षेत्र का देश नाउरू चीन की धमकी के बाद ताइवान से राजनयिक संबंध तोड़ने वाला पहला देश बन गया है, जिसे चीन एक उदाहरण के तौर पर पेश कर रहा है।
चीन का सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि चुनाव के तुरंत बाद नाउरू द्वारा ताइवान से संबंध तोड़ने का फैसला यह दर्शाता है कि एक-चीन सिद्धांत पर एक आम सहमति है। इस फैसले को अमेरिका के नेतृत्व वाले थोड़े से पश्चिमी देशों द्वारा उठाए गए कुछ कदमों के खिलाफ एक तमाचा भी माना जा सकता है। ये देश चीन के खिलाफ "ताइवान कार्ड" खेलना चाहते हैं। वैसे भी ताइवान को एक अलग देश के रूप में मान्यता देने वालों राष्ट्रों की संख्या केवल 11 है। उनमें सात लैटिन अमेरिका और कैरेबियन के देश हैं और तीन प्रशांत द्वीप समूह के। एक देश अफ्रीका का भी है। चीन इन सभी देशों को अलगाववादी बताता है।
ताइवान को अपना भविष्य तय करने का अधिकार
13 जनवरी को घोषित चुनाव परिणाम में ताइवान की सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) के विलियम लाई चिंग-ते ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया है। वह 20 मई को पदभार ग्रहण करेंगे। विलियम लाई का कहना है कि ताइवान के 23.5 मिलियन लोगों को अपना भविष्य तय करने का पूरा अधिकार है और बीजिंग को उनके लोगों के लिए बोलने या विश्व मंच पर उनका प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन चीन लाई को एक खतरनाक अलगाववादी बताता है और धमकी देता है कि ताइवान को वह किसी भी दिन अपने में मिला सकता है।
निर्वाचित राष्ट्रपति विलियम लाई हर हाल में ताइवान की रक्षा करने का वादा करते हैं। उन्हें वाशिंगटन पर पूरा भरोसा है। चुनाव परिणाम के आने के अगले ही दिन, यानि 14 जनवरी को एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ताइवान पहुँच गया था, जिनमें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्टीफन हेडली और पूर्व उप विदेश मंत्री जेम्स स्टाइनबर्ग भी थे। अमेरिका समेत उन तमाम देशों के प्रति चीन ने खुली नाराजगी व्यक्त की है, जिन्होंने ताइवान के निर्वाचित राष्ट्रपति को बधाई दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के साथ कनाडा, जापान, फ्रांस और ब्रिटेन ने भी ताइवान चुनाव में जीत के लिए लाई को बधाई दी थी।
अमेरिकी दखल कितना प्रभावी
वाशिंगटन और बीजिंग के बीच पहले से ही एक औपचारिक राजनयिक संबंध है, लेकिन अमेरिका ताइवान का भी खुल कर समर्थन करता है। वह बलपूर्वक ताइवान की यथास्थिति को बदलने के चीन के किसी भी प्रयास का विरोध करता है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल समय समय पर ताइवान का दौरा करते रहते हैं।
चीन लगातार इस अमेरिकी 'दखलंदाजी' का विरोध कर रहा है और ताइवान के चारों ओर आसमान और पानी में लड़ाकू जेट और नौसेना के जहाज तैनात कर रहा है। साथ ही चीन ने यह चेतावनी भी दी है कि यदि कोई देश ताइवान की "स्वतंत्रता" की वकालत करता है तो वह उसके साथ राजनयिक संबंध खत्म कर लेगा। बीजिंग का यह साफ कहना है कि दुनिया में केवल एक ही चीन है और ताइवान उसी चीन का एक अविभाज्य हिस्सा है। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार ही पूरे चीन का प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र अधिकृत शक्ति है।
क्या युद्ध है आखिरी विकल्प ?
चीन के इस समय 182 देशों के साथ राजनयिक संबंध हैं। बीजिंग का यह भी दावा है कि ये सभी देश वन चाइना पॉलिसी को मानते हैं। चीन के दबाव में 2016 से लेकर अभी तक 10 देशों ने ताइवान के साथ "राजनयिक संबंध" तोड़ दिए हैं। चीन ने रूस, इंडोनेशिया, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, बांग्लादेश, फिलीपींस, श्रीलंका, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, जिम्बाब्वे, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, बेलारूस, सर्बिया सहित कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा है कि इनमें से किसी देश ने भी ताइवान के विलियम लाई को चुनाव जीतने की बधाई नहीं दी है। ग्लोबल टाइम्स अंत में लिखता है - इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्षेत्रीय राजनीतिक परिदृश्य कैसे विकसित होता है, चीन का पूर्ण पुनर्मिलन हो कर रहेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि चीन आने वाले दिनों और हफ्तों में अपनी नाराजगी दिखाने के लिए ताइवान पर आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ा सकता है, या मई के लिए और अधिक सशक्त प्रतिक्रिया दे सकता है, जब लाई पदभार संभालेंगे। चीन को जानने वाले कहते हैं कि बीजिंग के टूलबॉक्स में भी कई प्रकार अस्त्र हैं।
चीन मुक्त व्यापार समझौते के तहत ताइवानी आयातों के लिए राहत शुल्क को समाप्त कर सकता है या समझौते को ही पूरी तरह से निलंबित कर सकता है। वह ताइवान पर सैन्य दबाव और भी बढ़ा सकता है, और अधिक लड़ाकू जेट और युद्धपोतों को द्वीप के आसमान और पानी के करीब भेज सकता है। लेकिन चीनी अर्थव्यवस्था में आई परेशानियों और वाशिंगटन द्वारा संबंधों को स्थिर करने के प्रयासों के बीच क्या यह आक्रामक रूप बरकरार रहेगा।












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