Swami Prasad Maurya: बार-बार पाला बदलने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य का क्या है इतिहास
Swami Prasad Maurya: बार बार पार्टी बदलने और पिछले कुछ समय से हिंदू धर्म पर अवांछित टिप्पणियां करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने फिर एक बार पाला बदलने का निर्णय कर लिया है। उन्होंने समाजवादी पार्टी के महासचिव पद से त्यागपत्र दे दिया है।
"मैंने अपने तौर-तरीके से पार्टी का जनाधार बढ़ाया और भाजपा के जाल में फंसे लोगों को वापस लाने की कोशिश की तो पार्टी के कुछ छुटभइये नेता इसे मेरा निजी बयान बताने लगे।

मैं सपा का राष्ट्रीय महासचिव हूं लेकिन मेरा बयान निजी हो जाता है और बाकी राष्ट्रीय महासचिव के बयान पार्टी के बयान हो जाते हैं। ये हैरानी की बात है। यदि महासचिव के पद में भी भेदभाव है तो मैं इस पद का त्याग करता हूं।" ये बातें स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव को सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा वाले पत्र में लिखा है।
दरअसल बीते कुछ समय से धर्म संबंधी विवादित बयान देने के कारण स्वामी प्रसाद मौर्य का समाजवादी पार्टी के अंदर ही विरोध होने लगा था। अखिलेश यादव के करीबी नेता मनोज पांडेय ने तो उन्हें 'विक्षिप्त' करार दिया। वह कहते हैं कि मौर्या का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है।
पार्टी में अलग थलग पड़ने से आहत स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी नाराज बताए जा रहे हैं और वह सपा से अलग भी कोई राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं। वैसे भी स्वामी प्रसाद मौर्य का किसी पार्टी में रहते हुए नाराज होना और पार्टी छोड़ना कोई नयी बात नहीं है। 1980 में राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले मौर्य अब तक कई बार पाला बदल चुके हैं।
स्वामी प्रसाद मौर्य का आधार
पिछड़ी जाति से आने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य का जन्म 2 जनवरी 1954 को प्रतापगढ़ जिले के चकवड़ गांव (कुंडा) में हुआ था। लेकिन, उन्होंने अपनी सियासी कर्मभूमि के लिए रायबरेली के ऊंचाहार को चुना। मौर्य ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से लॉ में स्नातक और एमए की डिग्री हासिल की।
इसके बाद 1980 में राजनीति में सक्रिय रूप से कदम रखा। सबसे पहले स्वामी प्रसाद मौर्य इलाहाबाद युवा लोकदल की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य बने। वह जून 1981 से 1989 तक पार्टी में महामंत्री पद पर रहे। इसके बाद सन् 1989-1991 तक लोकदल के मुख्य महासचिव रहे। स्वामी साल 1991-1995 तक जनता दल के प्रदेश महासचिव भी रहे।
स्वामी प्रसाद मौर्य 80 के दशक से ही चुनावी किस्मत आजमा रहे हैं। उन्होंने डलमऊ विधानसभा सीट अपने लिए चुनी, जो आज ऊंचाहार सीट के नाम से जानी जाती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वामी प्रसाद मौर्य को ऊंचाहार में सियासी ठिकाना उनकी ही मौर्य जाति के रामनाथ सेठ ने दिया था।
स्वामी प्रसाद को चुनाव लड़ने के लिए रामनाथ सेठ ने आर्थिक मदद के साथ-साथ जाति के वोटों को एक करने में भी मदद की। इस दौरान वे लोकदल से लेकर जनता दल से कई बार चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। फिर उन्होंने मायावती के पहली बार सीएम बनते ही बसपा का दामन थाम लिया।
1996 में शुरू हुआ असल सियासी सफर
यहां से स्वामी प्रसाद मौर्य की असली सियासी कहानी शुरू हुई। बसपा में वह प्रदेश महामंत्री और उपाध्यक्ष की हैसियत से आए और फिर डालमऊ से विधायक चुने गए। 1996 में स्वामी प्रसाद मौर्य पहली बार डलमऊ सीट से विधायक बने और दोबारा इसी सीट से 2002 में जीतकर फिर विधानसभा पहुंचे।
साल 1997 में ही वह बसपा-बीजेपी गठबंधन की सरकार में मंत्री भी बन गए। राजनीतिक समीकरण बदले तो साल 2001 में वह नेता प्रतिपक्ष भी नियुक्त किए गए। 2002 में फिर विधायक बने स्वामी प्रसाद मौर्य 2002-2003 में बसपा सरकार में मंत्री रहे।
साल 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने अपनी 'सवर्ण विरोधी' छवि से बाहर निकलते हुए दलित-ब्राह्मण भाईचारे के साथ सोशल इंजीनियरिंग का एक नया फॉर्मूला अपनाया। इस चुनाव में बसपा को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। लेकिन, 2007 में बसपा की लहर के बावजूद मौर्या को हार का मुंह देखना पड़ा। पर मायावती ने हारने के बाद भी उन्हें अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाया। इसके बाद मौर्य 2009 में कुशीनगर की पडरौना सीट से उपचुनाव में जीतकर विधानसभा पहुंचे, जिसके बाद से लगातार तीन बार इसी सीट से जीत हासिल की। उन्होंने अपनी पुरानी सीट ऊंचाहार अपने बेटे उत्कृष्ट मौर्य (अशोक मौर्य) को सौंप दीं।
जब मायावती को छोड़ अलग हुए स्वामी प्रसाद मौर्य
जब साल 2012 में बसपा चुनाव हार गई तो मायावती ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया पर आपसी झगड़े में पड़कर स्वामी ने 2016 में बसपा के साथ पुराना रिश्ता खत्म कर दिया। तब मुलायम सिंह, शिवपाल यादव और आजम खान ने उन्हें सपा में आने का खुला न्योता दिया था। लेकिन, उन्होंने लोकतांत्रिक बहुजन मंच बनाया।
इसके बाद साल 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए और फिर योगी सरकार में मंत्री बने। हालांकि जनवरी 2022 में उन्होंने बीजेपी और यूपी कैबिनेट मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद साल 2022 के चुनाव के पहले वह अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी में आ गए। सपा ने 2022 के विधानसभा में उन्हें कुशीनगर की फाजिलनगर सीट से अपना प्रत्याशी बनाया था। जिसमें उनको बीजेपी प्रत्याशी सुरेंद्र कुशवाहा के हाथों करारी मात खानी पड़ी। इसके बाद में अखिलेश यादव ने उन्हें विधान परिषद भेजा।
बेटी, बेटा-बहू सब राजनीति में
स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य फिलहाल बदायूं से भाजपा सांसद हैं। इस वजह से भी पिता और बेटी के बीच राजनीतिक विवाद सुनने को मिलते रहते हैं। बेटी संघमित्रा मौर्य ने 2019 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव को हराया था।
इतना ही नहीं स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे उत्कृष्ट मौर्य रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा सीट से कई बार चुनाव लड़ चुके हैं पर अभी तक उन्हें जीत नहीं मिली है। वहीं स्वामी प्रसाद मौर्य की बहू ऊंचाहार के गौरा ब्लॉक से ब्लॉक प्रमुख का चुनाव जीत चुकी हैं।












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