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Jallikattu: सुप्रीम कोर्ट ने बदला जल्लीकट्टू पर अपना ही फैसला, जानें इस खेल का इतिहास

जल्लीकट्टू के जरिए सांडों (बैलों) को बूचड़खानों में जाने से रोका जाता है। इस खेल के लिए सांडों को प्रशिक्षित किया जाता है और उन्हें विशेष आहार दिया जाता है।

Supreme Court changed its own decision on Jallikattu know the history of this sport

Jallikattu: जल्लीकट्टू पर तमिलनाडु सरकार के कानून को सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सही ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अजय रस्तोगी, जस्टिस के.एम. जोसेफ, जस्टिस ऋषिकेश राय, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस सी.टी. रविकुमार की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य सरकार के नए कानून में सांडो के साथ क्रूरता के पहलू का ध्यान रखा गया है। क्योंकि, जल्लीकट्टू सदियों से तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा है, इसलिए इसे प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में बैलगाड़ी दौड़ और कर्नाटक के कंबाला (भैंसे की दौड़) को भी वैध करार दिया है और इसके खिलाफ कोर्ट में दायर की गई याचिका को भी खारिज कर दिया है।

गौरतलब है कि तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 2017 में बदलावों की संवैधानिक वैधता को पेटा के नेतृत्व में विभिन्न याचिकाओं के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। तमिलनाडु सरकार ने कानून में यह बदलाव 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किया था। उस समय कोर्ट ने जल्लीकट्टू और इससे मिलते-जुलते दूसरे खेलों पर रोक लगा दी थी।

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    सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह भी टिप्पणी की है कि इस मामले को हमने बारीकी से देखा है और कानून को राष्ट्रपति की सहमति भी प्राप्त है। इसलिए इस पर हम हस्तक्षेप नहीं कर सकते। तमिलनाडु सरकार द्वारा कानून में किया गया संशोधन अनुच्छेद 15ए का उल्लंघन नहीं करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस खेल को लेकर जो नियम बनाए गए हैं, उसे प्रशासन सख्ती से लागू करे। अगर पशुओं के खिलाफ क्रूरता कानून का उल्लंघन हो तो कार्रवाई की जाए।

    क्या है जल्लीकट्टू?

    जल्लीकट्टू एक तमिल शब्द है। जो दो शब्दों 'जल्ली' और 'कट्टू' से मिलकर बना है। जल्ली 'सल्ली' शब्द से आया है, जिसका अर्थ होता है 'सिक्का'। जबकि कट्टू का अर्थ बांधना होता है। इसमें बैलों के सींग पर सिक्कों की थैली को बांधा जाता है।

    जल्लीकट्टू का इतिहास

    बताया जाता है कि जल्लीकट्टू खेल का इतिहास ढ़ाई हजार सालों से भी ज्यादा पुराना है। तमिलनाडु में पोंगल के मौके पर बैलों की पूजा के बाद इस खेल का आयोजन किया जाता है। दरअसल, हिंदू मान्यताओं में सांड या बैल को भगवान शिव का वाहन कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि सांड को काबू करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। कहा जाता है कि प्राचीनकाल में लड़कियों के स्वयंवर के लिए जल्लीकट्टू का आयोजन किया जाता था। इसमें जो योद्धा बैल पर काबू पा लेता था, उसे लड़कियां अपना पति स्वीकार करती थीं।

    कैसे खेलते हैं जल्लीकट्टू का खेल?

    जल्लीकट्टू खेल में भाग लेने वाले बैलों को एक बाड़े में रखा जाता है। उस बाड़े के बाहर एक गेट होता है। इसी गेट के जरिए एक-एक करके बैलों को छोड़ा जाता है। अगर कोई खिलाड़ी निश्चित समय सीमा में बैल को अपने काबू में कर लेता है, तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। अगर कोई खिलाड़ी ऐसा नहीं कर पाता है तो बैल को विजेता घोषित कर दिया जाता है।

    अदालतों में जल्लीकट्टू का विवाद

    साल 2006 में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध के लिए मद्रास हाईकोर्ट की मदुरई बेंच का दरवाजा खटखटाया। इस पर सुनवाई करते हुए मदुरई बेंच की एकल पीठ ने तमिलनाडु सरकार को जल्लीकट्टू या मनोरंजन की आड़ में जानवरों के प्रति क्रूरता को रोकने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया। साल 2009 में तमिलनाडु की सरकार ने जल्लीकट्टू के नियमन के लिए एक कानून पास किया।

    साल 2011 में केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने बैलों के सार्वजनिक प्रशिक्षण और प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद पेटा ने जल्लीकट्टू खेल पर प्रतिबंध लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर रोक लगा दी।

    साल 2015 में तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध को हटाने की मांग की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद, तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार से इस खेल को जारी रखने के लिए अध्यादेश लाने की मांग की।

    साल 2016 में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी करते हुए कुछ शर्तों के साथ जल्लीकट्टू के आयोजन की अनुमति दे दी। केंद्र सरकार ने कहा कि जल्लीकट्टू की प्रतियोगिता के दौरान वीडियोग्राफी का होना जरूरी है। इसके अतिरिक्त, बैलों का मेडिकल टेस्ट किया जाना भी जरूरी है और इसका आयोजन पुलिस और प्रशासन की देखरेख में किया जाए।

    केंद्र सरकार के इस अधिसूचना के खिलाफ एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया के नेतृत्व में पेटा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और केंद्र सरकार की जल्लीकट्टू से संबंधित अधिसूचना को रद्द करने की मांग की। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अधिसूचना पर स्टे लगा दिया।

    इसी दौरान तमिलनाडु सरकार ने पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 2017 पारित किया। इस अधिनियम को रद्द करने के लिए पेटा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस आर.एफ. नरीमन की पीठ ने इसे संविधान की व्याख्या का प्रश्न समझा और इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की सिफारिश कर दी।

    सुप्रीम कोर्ट ने 8 दिसंबर 2022 को तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में प्रचलित खेल जल्लीकट्टू, कंबाला और बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने वाले कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया।

    जल्लीकट्टू पर अपने-अपने दावे और तर्क

    कहा जाता है कि जल्लीकट्टू के इस खेल के चलते पिछले 20 सालों में लगभग 200 लोगों की मौत हुई है। फिर भी यह खेल तमिलनाडु के लोगों पर सिर चढ़ कर बोलता है। इस खेल की लोकप्रियता का पता इसी बात से चलता है कि जल्लीकट्टू के पक्ष में तमिलनाडु की आम जनता के साथ-साथ नेता और अभिनेता खुलकर खड़े होते हैं। इस खेल के बारे में लोगों के अपने-अपने दावे और तर्क हैं। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस खेल में पशुओं के साथ क्रूरता की जाती है।

    वहीं, जल्लीकट्टू के समर्थकों का कहना है कि जल्लीकट्टू में हिस्सा लेने वाले बैलों का इस्तेमाल सिर्फ खेल के लिए किया जाता है। इसके लिए बैलों को विशेष आहार दिया जाता है और इस खेल के लिए उन्हें प्रशिक्षित भी किया जाता है। जल्लीकट्टू समर्थकों का कहना है कि जल्लीकट्टू का खेल सांडों के संरक्षण के लिए खेला जाता है। अगर सांड जल्लीकट्टू में शामिल नहीं होंगे, तो खर्च न उठा पाने की वजह से किसान उन्हें बूचड़खानों को बेच सकते हैं। इसके अलावा इन सांडों को गायों के गर्भधारण के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

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