सिर्फ दिल्ली समझती है बूढ़ी आंखों का दर्द

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नई दिल्ली (अन्नू मिश्रा)। माना जाता है कि भारत संस्कारों का देश है, यहां माता-पिता को भगवान का साक्षात रूप माना जाता है। बड़ी-बड़ी दुहाइयां दी जाती हैं लेकिन वर्तमान सन्दर्भ में देखा जाए तो हकीकत कुछ और ही नज़ारा पेश करती है। आज माता-पिता का मतलब कोई भगवान नही रहा न ही कोई कदर रही है उनके जीवन भर के अनुभवों की। आज के इस लॉजिकल ऑर टैक्निकल समय में माता-पिता का मतलब है वो सोर्स जो बच्चों की इच्छाएं ऑर मांगें पूरी करते हैं। माता-पिता ताउम्र लगा देते हैं अपने बच्चों की छोटी से छोटी खुशियां

पूरी करने में, भरसक प्रयास करते हैं कि अपने बच्चों को एक अच्छा जीवन दे सकें और देते भी हैं और जब यही बच्चे बड़े हो जाते हैं तो अपने माता-पिता को ही अनदेखा कर देते हैं।

बिल्कुल उसी तरह जैसे काम पूरा होने पर हम किसी वस्तु को कबाड़ा समझ कर स्टोर में रख देते हैं।
फिल्मों में यही प्रदर्शित किया जाता है कि भारत में वृद्धों का कितना सम्मान है पर जब हम वास्तविक दुनियां में झांकते हैं तो ऐसे परिवार भी बहुत कम मिलते हैं जिसमें वृद्ध शामिल हों। आजकल ओल्ड एज़ होम में ही वृद्धों को देखना ज्यादा आसान है। आप कभी समय निकाल कर ओल्ड एज़ होम जरूर जाइये और देखिये वहां का दृश्य बेचारे बूढे़ मां-बाप अब भी इस आस में जीते मिलगें कि उनका बेटा आएगा और उन्हें यहां से ले जाएगा। कई तो सदमे में जी रहे हैं कि क्या जिसने उनके साथ ऐसा किया वो उनकी अपनी ही संतान है।

बहरहाल आज भी कई बच्चे ऐसे भी मौजूद हैं जो अपने मां-बाप की सेवा को ही अपना जीवन मानते हैं पर ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं। हाल ही में हुए हेल्प एज़ इण्डिया का एक

सर्वे दर्शाता है कि भारत में लगभग 50 फीसदी से भी अधिक वृद्ध अपनी ही संतान द्वारा उपेक्षित हैं ऑर साल दर साल ये तादात बढ़ती ही जा रही है.

एक एनजीओ की दस साल के अध्ययन ने जो विश्व वृद्ध उपेक्षा दिवस से एक दिन पहले पेश हुआ यह दर्शाता है कि भारत में दिल्ली ही वो महानगर है जहां वृद्ध अन्य महानगरों की अपेक्षा कम उपेक्षित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यह भी जानकारी मिली है पिछले एक दशक में वो वृद्ध भी दुखी है और खुद को अकेला महसूस करते हैं जो कि अपने परिवार के साथ रहते हैं।

इसका कारण देश में हुए कई सामाजिक बदलाव हो सकते हैं जिसने पारिवारिक स्थितियों को भी प्रभावित किया है।

वृद्ध उपेक्षा के सन्दर्भ में यह देखा गया है देश में लगभग 61 फीसदी बुजुर्ग अपनी बहुओं द्वारा सताए हुए हैं और लगभग 59 फीसदी ऐसे हैं जिन पर अत्याचार उनके अपने ही बेटों द्वारा होता है। इसके पीछे एक कारण वृद्धों की अपने बच्चों पर आर्थिक निर्भरता भी है जिसके कारण उन्हें अपनी ही संतान द्वारा उपेक्षित होना पड़ता है। 12 शहरों में हुए 1200 वरिष्ठ नागरिकों पर हुए सर्वेक्षण से पता चला है कि इनमें से 77 फीसदी वरिष्ठ ऐसे हैं जो अपने परिवार के साथ रहते हैं। जिसमें से दिल्ली में लगभग 22 फीसदी वरिष्ठ हैं जो परिवार के साथ रहते हैं और बैंगलोर में 20 फीसदी हैं। इस लिहाज से देखे तो वृद्धों के मामले में दिल्ली के हालात बैंग्लोर से बेहतर दिखाई दे रहें हैं।

वहीं कुछ शोध यह भी बताते हैं कि उपेक्षित होने वाले वरिष्ठ नागरिकों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। जहां पुरुषों की संख्या 48 फीसदी है वहीं महिलाओं की संख्या 52 फीसदी है। शोध के मुताबिक यह भी पता चला है कि 41 फीसदी वृद्ध ऐसे हैं जो परिवार में अपने साथ हो रही उपेक्षा को गोपनीय रखते हैं हेल्पिंग एजेंसी की मदद नहीं लेते। और कुछ ऐसे हैं जो झिझक के कारण अपनी समस्या नहीं बताते। और कुछ ऐसे हैं जो इस बात से अंजान है कि वो ऐसी परिस्थितियों में कैसे और किससे मदद लें. सर्वेक्षण के मुताबिक लगभग 60 से 65 फीसदी ही ऐसे वरिष्ठ नागरिक हैं जो पुलिस हेल्प लाईन के विषय में जागरुक हैं। पर इनमें से भी केवल 12 फीसदी ही ऐसे हैं जिन्होंने पुलिस से संपर्क किया।

बहरहाल देश में वृद्धों की स्थिति यकीनन निराशाजनक और असंतोषजनक है। पर संस्थाएं अब भी भरसक प्रयास कर रही है वृद्धों को अपने हक में जागरूक करने के लिए और उनकी स्थिति सम्मानजनक बनाने के लिए। खैर खुशी इस बात की जरूर है कि देश की राजधानी दिल्ली में वृद्धों की स्थिति में सुधार है। पर एक नागरिक होने के नाते और मानवता ने नाते हम सबको अपने अपने स्तर पर अपने बड़ो के प्रति प्रेम ऑर कर्तव्यनिष्ठ भाव और व्यवहार रखना होगा तभी देश में वृद्धों के हालात सुधर पाएंगे।

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