100 साल तक खराब की गई है फिल्मी तहजीब, शुद्धिकरण को उठाने होंगे कड़े कदम
कैलाश बाबू को चाहिए कि अब हिन्दी सिनेमा में कुछ आमूल-चूल बदलाव किए जाएं। जैसा कि लगता है कि सिनेमा का जिम्मा कैलाश बाबू पर है तो उन्हें समझने की जरूरत है कि कहां गड़बड़ हो रही है।
नई दिल्ली। किसी शायर का एक शेर है...
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
एक उम्र लगती है दिल को दिल बनाने में...
या फिर गालिब के लब्जों में यूं कहिए 'आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक...' दरअसल किसी भी चीज के बनने या बिगड़ने में एक वक्त लगता है। बिगड़ने में लगे या ना लगे, बनने में या फिर बिगड़े को सुधरने में तो लगता ही है। ये सब बातें इसलिए, क्योंकि दिल्ली की सरकार को इस वक्त हर चीज को बदलने की बड़ी जल्दी है। दिल्ली सरकार के नुमाइंदे भी इस बदलाव में हर तरह से शामिल होना चाहते हैं। मध्य प्रदेश में भी एक पराक्रमी रहते हैं कैलाश विजयवर्गीय साहब। कैलाश बाबू ने सिनेमा के शुद्धिकरण को चुना है।

कैलाश बाबू खुलकर मैदान में आए एक साल पहले बाजीराव मस्तानी और दिलवाले की रिलीज के दौरान। कैलाश जी ने खूब जान लड़ाई कि शाहरुख कि फिल्म को मत देखो, इसे फ्लॉप करो। फिल्म की कमाई बहुत ज्यादा शानदार नहीं रही तो उन्होंने कहा कि दिलवाले को धूल चटाई अब दंगल करना है, निशाने पर थी आमिर खान की फिल्म दंगल। दंगल आई तो वो ज्यादा कुछ कर नहीं सके क्योंकि फिल्म में एक की जगह दो-दो राष्ट्रगान थे, एक कोर्ट का, एक फिल्म का अपना। दूसरे आमिर ने नोटबंदी को भी एतिहासिक बता दिया तो मन ही मन मिसमिसा के रह गए।
अब कैलाश बाबू फिर से पैड बांध पर क्रीज पर हैं और बाउंड्री मारने की कोशिश है शाहरुख खान की फिल्म रईस पर। फेसबुक पर उन्होंने लिखा है ''जो काबिल है, उसका हक कोई बेईमान रईस ना ले जाए।'' वो कहना चाहते हैं कि 'बेईमान' शाहरुख की फिल्म ना देखकर ऋतिक रोशन की 'काबिल' देखी जाइए।

कैलाश बाबू की दिलवाले में सुनी नहीं गई, दंगल ने कमाई के रिकॉर्ड तोड़ दिए और अब रईस पर उन्होंने दांव लगाया है। आखिर क्या वजह है कि कैलाश बाबू की बात पहुंच नहीं पा रही जनता तक। इस पर सोचा तो हमें साफ समझ में आ गया कि इसके पीछे हिन्दी सिनेमा का 100 साल का इतिहास है।
कैलाश बाबू को चाहिए कि अब हिन्दी सिनेमा में कुछ आमूलचूल बदलाव किए जाएं। जैसा कि लगता है कि सिनेमा का जिम्मा कैलाश बाबू पर है तो कैलाश बाबू को कुछ समझने की जरूरत है कि कहां गड़बड़ हो रही है। सोच रहे हैं कि जो हमें समझ आ रहा है, वो कैलाश बाबू को बता दिया जाए, कि हमें कहां सुधार की गुंजाइश लगती है। इससे कैलाश बाबू को कुछ फायदा हो जाए।
दरअसल हमारा सिनेमा जब शुरू हुआ तो उसकी शुरुआत ठीक रही, 'भारतेन्दु हरिशचन्द्र' से। मगर धीरे-धीरे गाड़ी पटरी से उतर गई और आलमआरा से लेकर अब तक जो बातें हमें फिल्मों के बारे में पढ़ाई जाती रहीं, वो एकदम खतरनाक थीं। हिन्दुस्तान में हर जगह, हर स्कूल, यूनिवर्सिटी में (जेएनयू से अलग भी) सिनेमा को गलत तरीके से पढ़ाया गया है। मैं बताता हूं कैसे पढ़ाया गया और कैसे पढ़ाया जाना चाहिए था।
तो कैलाश बाबू, 40 के दशक से ही शुरुआत करें तो अभिनेताओं के बारे में हमें पढ़ाया गया कि दिलीप कुमार बहुत बड़े सुपरस्टार रहे। हिन्दी सिनेमा के पहले सुपरस्टार बता जाते थे हमारे टीचर उन्हें... हमें किसी ने नहीं बताया कि वो तो दरअसल लव जिहाद कर रहे थे और युसूफ खान से नाम बदलकर दिलीप करने के पीछे भी यही वजह थी लेकिन किसी वजह से वो कामयाब ना हो सके और शायरा बानों से शादी करनी पड़ी। ये बात हमें बचपन में बता दी जाती तो क्यों उस आदमी के लिए दिल में इज्जत पैदा होती?
जो तब शुरू हुआ, वही आज के दौर तक चला आ रहा है दिलीप कुमार से लेकर खान तिकड़ी तक हम गलत दिशा में जाते रहे। अब आप बताइए कि इन खानों को बचपन से ही हमें गद्दार पढ़ा दिया जाता तो आज क्यों कैलाश बाबू आपको फेसबुक पर लिखना पढ़ता, और इनसे हमें सावधान करना पड़ता। हमें तो फिल्मों के बारे में सुनकर लगता रहा कि यही लोग बड़े स्टार हैं। आपकी सरकार से पहले तो इनके मुसलमान होने को लेकर भी हमारा ध्यान नहीं गया कभी, तुष्टिकरण वाली सरकारों ने इन्हें सिर पर बैठाए रखा है।
यही मामला अभिनेत्रियों का भी है। मधुबाला को सबसे खूबसूरत हीरोइन कहा गया, तो हम सोच लिए मुसलमान खूबसरत भी हो सकते हैं। मीना कुमारी, वहीदा रहमान, नरगिस से लेकर तब्बू तक.. हमें कहा गया कि इनके जैसी अदाकारा कोई नहीं.. अब बताइए कि ये पढ़ाने की बाते हैं? हमारे दिमाग में गलत छवि बना दी ना, गलत लोगों की...
फिल्मों के बारे में तो बहुत ही गलत बता दिए हमारे टीचर हमें... मुगले आजम में कितना गलत इतिहास दिखाया जाता है, आप तो जानते ही होंगे कैलाश बाबू? अब के. आसिफ को तो दिखाना ही था गलत इतिहास.. लेकिन टीचर तो सही बात बताते। हमें किसी ने नहीं बताया कि मुगल कभी मुहब्बत नहीं कर सकते क्योंकि वो आक्रांताओं के वंशज थे। हमेशा हमारे सामने के. आसिफ, कमाल अमरोहवी, महबूब खान जैसे फिल्मकारों की तारीफ होती रही और हमारी बुद्धि जड़ होती रही।
सबसे ज्यादा सितम तो गीतकारों के नाम पर हुए हैं। साहिर, मजरूह, हसरत, कैफी, निदा, जावेद, जां निसार.. मतलब सारे नाम खास समुदाय के.. और तो और जो नहीं थे वो भी 'गुलजार' हो गए और हम इन्हें भी उन्हीं के भाई समझते रहे। अब बताइए दिमाग में तो गलत तस्वीर बन कर सेट हो गई ना। यहां तक कि मुहम्मद रफी को तो लोग हमें ऐसे बताते रहे, जैसे ये ना हों तो फिल्म इंडस्ट्री ही ना हो... अब आप ये इतिहास ठीक करवाइए खुदा के लिए ताकि आने वाली नस्ले सिर्फ हमारा गौरवशाली इतिहास ही पर्दे पर देखें।
इतना ही नहीं, सबसे खास बात ये है कि ये फिल्म वाले किसी भी धर्म में शादी कर लेते हैं और कुछ भी नाम रख लेते हैं। इससे दर्शकों को भी बड़ी मुश्किल होती है। गुलजार, मीना कुमारी, दिलीप कुमार, जॉनी वॉकर.. ये क्या नाम हैं? कम से कम नाम से पता तो चल जाए कि वो हैं कौन? इंसान फिल्म देखने जाए तो जरा सतर्क तो रहे कि कहीं किसी गलत आदमी की फिल्म देखने तो नहींं जा रहे.. ऐसा ना हो कि हम सोचें कुछ और वहां निकले कुछ और ही...
हां तो ये सारा लब्बोलुआब तुम अगर समझो तो एक गुजारिश है कैलाश बाबू, बस इतना कर दो.. फिल्मों के इस इतिहास को ठीक करा दो। इब्तिदा से आज तक, जितने भी 'बेईमान रईस' हैं, उनकी सारी पुरानी मुगले आजमों को जलवा दीजिए, कुएं में फिकवां दीजिए या फिर किसी कानून के जरिए (ऑर्डिनेंस के तो मास्टर हैं ही आप) ये तय करवा दीजिए कि फिर कोई 'सुल्तान' 'दंगल' में ना उतरे और खुद को 'रईस' ना कह सके। नहीं तो इनकी दंबगई का सिलसिला चलता रहेगा और आपका, हमारा दिल यूं ही जलता रहेगा....
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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