Resolution on PoK: जब भारतीय संसद ने पारित किया था पीओके को वापस लेने का सर्वसम्मत प्रस्ताव

पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर को लेकर भारतीय संसद ने 22 फरवरी 1994 को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसके तहत हर साल 22 फरवरी को जम्मू-कश्मीर संकल्प दिवस के रूप में याद किया जाता है।

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Resolution on PoK: 22 फरवरी 1994 का दिन भारत का कश्मीर को लेकर स्पष्ट संकल्प का दिन है। 29 साल पहले आज ही के दिन संसद ने एक प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर अपना हक जताते हुए कहा था कि यह भारत का अटूट अंग है। पाकिस्तान को वह हिस्सा छोड़ना होगा, जिस पर उसने कब्जा कर रखा है।

संसद का वह प्रस्ताव मोटे तौर पर इस तरह था कि यह सदन पाकिस्तान एवं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकी शिविरों पर गंभीर चिंता जताता है। पाकिस्तान की तरफ से आतंकियों को हथियारों, धन की आपूर्ति के साथ-साथ आतंकियों को भारत में घुसपैठ करने में मदद दी जा रही है। वहीं भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के उन क्षेत्रों में जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में हैं, वहां की दयनीय स्थितियों और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त करता है।

संसद ने सर्वसम्मति से लिया संकल्प

भारतीय संसद ने इस संकल्प को 22 फरवरी 1994 को सर्वसम्मति से ध्वनिमत से स्वीकार किया था। इस संकल्प में घोषणा की गयी थी कि जम्मू और कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा। इसे देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के किसी भी प्रयास का हरसंभव विरोध किया जायेगा। भारत की अपनी एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता है और इनके खिलाफ कोई प्रयास होता है तो उसका मजबूती से मुकाबला करने की इच्छा एवं क्षमता है।

भारत मांग करता है कि पाकिस्तान को भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के क्षेत्रों को खाली करना चाहिए, जिस पर उसने आक्रमण के माध्यम से कब्जा कर लिया है। साथ ही, भारत यह संकल्प करता है कि भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के सभी प्रयासों का दृढ़ता से मुकाबला किया जाएगा।

शिमला समझौता की भूमिका

दरअसल, शिमला समझौते के तहत दोनों देशों की नियंत्रण रेखा को दोनों देशों के बीच सरहद के रूप में स्वीकार किया गया था तो फिर संसद में पारित इस प्रस्ताव का क्या मतलब है? साल 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच समझौता हुआ था। इस समझौते में सहमति बनी थी कि कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जितने भी विवाद हैं, उनका हल शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत कर निकाला जाएगा। कोई भी देश दोनों के बीच के इन विवादों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नहीं उठाएगा। कश्मीर में दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा (LoC) स्थापित किया जाना निर्धारित किया गया था। हालांकि, पाकिस्तान बार-बार इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय पटल पर उठाता है और इस संधि को तोड़ता है इसलिए भारत की संसद द्वारा यह फैसला किया गया था।

पाकिस्तान ने मचाया 'कत्लेआम'

अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की तरफ से कबाईलियों द्वारा जम्मू और कश्मीर रियासत पर हमला किया गया। आधुनिक उपकरणों से लैस इस पाकिस्तानी घुसपैठ में पाकिस्तानी सेना भी शामिल थी। अनुमानों के अनुसार इस हमले में हिंदुओं और सिखों का कत्लेआम किया गया। वहीं मरने वालों की संख्या 30,000 थी और 100,000 से ज्यादा लोग शरणार्थी बनने को मजबूर हो गये। वहीं 4 सितंबर 1947 को जम्मू और कश्मीर राज्य बलों के ब्रिटिश चीफ ऑफ स्टाफ ने राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कहा गया कि 2 और 3 सितंबर 1947 को मुख्य रूप से पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले के सशस्त्र मुस्लिम निवासियों ने घुसपैठ की थी।

सारा खेल लियाकत अली खान का था?

आक्रमण की योजना और क्रियान्वयन पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के पास थी। दरअसल, उनके पास पाकिस्तान का रक्षा विभाग भी था। इस हमले में रक्षा सचिव इस्कंदर मिर्जा (बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने), एनडब्लूएफपी (ख़ैबर पख़्तूनख़्वा) के मुख्यमंत्री खान अब्दुल कयूम खान और इशाक अहमद खान (बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति) शामिल थे।

राजा हरि सिंह ने भारत के साथ हाथ मिलाया

इस हमले के दौरान, जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ अपनी रियासत का विलय कर लिया। विलय 26 अक्टूबर 1947 को हुआ और रियासत की रक्षा के लिए भारतीय सैनिकों का पहला जत्था अगले ही दिन सुबह यानी 27 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर में उतरा। कश्मीर में सैन्य ऑपरेशन शुरू करने के अगले कुछ ही दिनों में भारतीय फौजों ने पाकिस्तानियों को श्रीनगर में घुसने से रोकते हुए कश्मीर घाटी के बाहर धकेल दिया। पाकिस्तान ने कश्मीर के भारत में विलय को नहीं मानते हुए, खुले तौर पर कश्मीर में जंग छेड़ते हुए अपनी सेनाएं तैनात कर दीं।

फिर 1 जनवरी 1948 को भारत ने इस पाकिस्तानी हमले के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी शिकायत दर्ज करवाई। जहां एक साल की सुनवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता पर 1 जनवरी 1949 को दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम हुआ और दोनों देशों के बीच कश्मीर में सीमा रेखा निर्धारित हुई। जिसे लाइन ऑफ कंट्रोल कहा गया। वहीं संघर्ष विराम के बावजूद कश्मीर में दोनों देशों की सेनाएं अपनी मौजूदा स्थिति से पीछे नहीं हटीं। वहीं जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के पास रहा, जबकि गिलगित-बाल्टिस्तान और कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा बरकरार रखा, जिसे वो आजाद कश्मीर और भारत में उसे पीओके कहा जाता है।

पीओके की आबादी और शरणार्थी समस्या

विभाजन के समय, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) की 12.5 प्रतिशत आबादी में हिंदू और सिख शामिल थे। दोनों आज वहां मौजूद नहीं हैं। वैसे वर्तमान में कश्मीर घाटी के आठ जिलों में फैले 121 गांवों में लगभग 80,000 सिख रहते हैं। 1947-48 युद्ध के दौरान रातों-रात लाखों लोग शरणार्थी बन गए। भारत 226,000 शरणार्थियों (जम्मू और कश्मीर में 181,000) का घर बन गया। हिंदू और सिख शरणार्थियों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

दरअसल पश्चिमी पंजाब अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गया था, इसी दौरान इन शरणार्थियों को 1947 में महाराजा हरि सिंह ने आश्रय प्रदान किया था। लेकिन, जब महाराजा ने श्रीनगर छोड़ा तो शेख अब्दुल्ला ने 1947-48 में पाकिस्तान और पीओजेके के हजारों हिंदू और सिख शरणार्थियों को कश्मीर में बसने की अनुमति नहीं दी। आज भी, वे राज्यविहीन हैं, राज्य की आबादी में उनकी गिनती भी नहीं है। दूसरी ओर, दूर-दूर से आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों का राज्य प्रशासन ने खुले हाथों से स्वागत किया और वे चुपचाप राज्य में बस गये। इनमें तिब्बत और झिंजियांग (जहां वे दो शताब्दियों पहले चले गए थे), पीओके के शरणार्थी भी शामिल थे।

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