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रायबरेली: सोनिया के सामने जीत का अंतर बढ़ाने की चुनौती

Sonia Gandhi
लखनऊ। नेहरू-गांधी परिवार के गढ़ कहे जाने वाले रायबरेली से लगातार चौथी बार चुनाव लड़ रहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने एक बार फिर कोई मजबूत उम्मीदवार न होने से उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। ऐसे में उनके सामने जीत नहीं, बल्कि जीत का अंतर बढ़ाने की चुनौती होगी। देशभर में भले ही कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर हो और महंगाई को लेकर लोगों में गुस्सा हो, लेकिन रायबरेली में यह फैक्टर न के बराबर देखने को मिल रहा है।

स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन मिश्रा कहते हैं कि यहां सोनिया के खिलाफ सारे बाहरी उम्मीदवार हैं, जिन्हें कोई जानता नहीं है। ऐसा लगता है कि विरोधी दलों ने अपने उम्मीदवार उतारकर महज फर्ज अदायगी की, ताकि उनके राजनीतिक वजूद पर सवाल न खड़े हों।

मिश्रा कहते हैं कि महंगाई को लेकर भले ही लोगों में यहां थोड़ा गुस्सा हो, लेकिन उन्हें पता है कि सोनिया के अलावा दूसरा कोई उम्मीदवार रायबरेली का इतना विकास नहीं कर सकता। यहां बाकी मुद्दों पर विकास का मुद्दा भारी है। यहां के लोगों को कांग्रेस के भ्रष्टाचार या घोटालों से कोई लेना-देना नहीं है, दुनिया में देश की भले ही बदनामी हो, मगर रायबरेली का विकास होना चाहिए। स्थानीय लोग सिर्फ इतने से ही संतुष्ट हैं।

रायबरेली के लोगों का कहना है कि पहले फिरोज गांधी, फिर इंदिरा गांधी और बीते 10 साल से सोनिया ने यहां के विकास के लिए काफी काम किए। इसलिए रायबरेली में गांधी परिवार के खिलाफ जातीय समीकरण काम नहीं करते और उन्हें हर वर्ग और जाति का वोट मिलता है।

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सोनिया को वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में यहां 72 फीसदी के साथ 4,81,490 मत मिले थे। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के आऱ एस़ कुशवाहा को रिकार्ड 3,72,165 वोटों से हराया था। कुशवाहा को 1,09,325 मत मिले थे, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अपना दल के उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाए थे।

पिछले चुनावों की तरह समाजवादी पार्टी (सपा) ने सोनिया के खिलाफ इस बार अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है, तो बसपा से प्रवेश सिंह, तृणमूल कांग्रेस से अंजू सिंह, आम आदमी पार्टी (आप) से पूर्व न्यायाधीशा फखरुद्दीन और भाजपा से वकील अजय अग्रवाल मैदान में हैं।

स्थानीय निवासी कुलदीप नारायण तिवारी कहते हैं, "सोनिया 10 साल से लगातार रायबरेली के विकास के लिए काम कर रही हैं। वह लगभग हर दो महीने में क्षेत्र का दौरा करती हैं। लोगों की समस्याएं सुनती हैं। चुनाव में उतरे बाकी उम्मीदवार अचानक प्रकट हो गए। चुनाव के बाद ये लापता हो जाएंगे। इसलिए हम ऐसे नेता को चुनेंगे जो हमारे सुख-दुख में हमेशा साथ रहता है।"

स्थानीय पत्रकार रामेंद्र सिंह कहते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार की परंपरागत रायबरेली सीट पर हर वर्ग के लोगों का सोनिया के प्रति इतना झुकाव है कि किसी और दल के नेता की दाल यहां नहीं गल सकती। यही कारण है कि दूसरे दलों से कोई बड़ा नेता गांधी परिवार के खिलाफ मैदान में नहीं उतरता। यहां 'लोकतंत्र' की एक अलग तस्वीर दिखती है।

सिंह कहते हैं कि इस चुनाव में सोनिया की जीत का अंतर 10-20 हजार मतों से कम या ज्यादा हो सकता है, लेकिन रायबरेली से उनकी हार नामुमकिन है। रायबरेली में तीसरे चरण में 30 अप्रैल को मतदान होना है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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