Dr. Hedgewar: जब डॉ. हेडगेवार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत किया था जंगल सत्याग्रह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध करने के चलते ब्रिटिश सरकार ने दो बार सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।

Dr. Hedgewar: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म (अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार) 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम बलिराम पंत हेडगेवार और माता का नाम रेवतीबाई था। जब वह 13 वर्ष के थे, तभी उनके पिता और माता का निधन प्लेग महामारी की चपेट में आने से हो गया था।
विक्टोरिया और एडवर्ड का विरोध
22 जून 1897 को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के साठ साल पूरे होने के मौके पर भारत में 'जश्न' मनाया जा रहा था। केशव हेडगेवार जिस स्कूल में पढ़ते थे, वहां भी इस मौके पर मिठाई बांटी जा रही थी। परंतु हेडगेवार ने अपने हिस्से की मिठाई फेंकते हुए कहा कि विक्टोरिया हमारी महारानी नहीं है। उस समय केशव हेडगेवार केवल 8 वर्ष के थे।
इसी तरह की एक और घटना उल्लेखनीय है। साल 1901 में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर राजा के प्रति निष्ठा रखने वाले लोगों द्वारा नागपुर में आतिशबाजी का आयोजन किया गया था। केशव हेडगेवार ने अपने मित्रों से इस आतिशबाजी को नहीं देखने का आग्रह किया और कहा कि विदेशी राजा का राज्यारोहण उत्सव मनाना हमारे लिए शर्म की बात है।
वंदेमातरम बोलने पर मिली सजा
केशव हेडगेवार जब मैट्रिक की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके स्कूल का निरीक्षण करने के लिए एक इंस्पेक्टर आया। जैसे ही उसने कक्षा में प्रवेश किया, डॉ. हेडगेवार की अगुवाई में कक्षा के सभी छात्रों ने वंदेमातरम से निरीक्षक का स्वागत किया। इस पर निरीक्षक गुस्से से भड़क उठा और सभी छात्रों को कक्षा से बाहर निकाल दिया।
साल 1910 में हेडगेवार डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए कोलकाता गये और वहीं पर वह क्रांतिकारियों की गुप्त संस्था 'अनुशीलन समिति' से जुड़ गये।
राजद्रोह का मुकदमा लगा
डॉ. हेडगेवार 1915 में बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से कांग्रेस से जुड़ गये। फिर जब महात्मा गांधी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन शुरू किया गया तो डॉ. हेडगेवार ने भी उसमें हिस्सा लिया। उन्होंने नागपुर में आन्दोलन के तहत ब्रिटिश गुलामी का विरोध किया।
गौरतलब है कि नागपुर में असहयोग आंदोलन की सफलता ने ब्रिटिश सरकार को हिला कर रख दिया था। सरकार द्वारा आंदोलन को कुचलने के लिए अपनाए गये सभी हथकंडे नाकाम साबित हो रहे थे। धारा 144 के तहत सभाओं, जुलूसों और भाषणों पर प्रतिबंध लगाया जाने लगा और आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग किया जाने लगा। इन कार्रवाईयों से आंदोलन कमजोर होने के बदले और भी सशक्त होता जा रहा था। अंततः ब्रिटिश सरकार ने प्रभावी नेताओं पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर डॉ. हेडगेवार को जेल भेज दिया।
डॉ. हेडगेवार ने असहयोग आंदोलन के समर्थन में अक्टूबर 1920 में काटोल एवं भरतवाडा की सभाओं में ब्रिटिश सरकार विरोधी भाषण दिए थे। उन पर भड़काऊ भाषण देने, घृणा फैलाने एवं विद्रोह का आह्वान करने का आरोप लगाया गया और मुकदमा दर्ज किया गया। इसके बाद, 19 अगस्त 1921 को उन्हें लगभग एक वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया। महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को वापस लिए जाने के बाद ही डॉ. हेडगेवार जेल से बाहर आ पाए।
डॉ. हेडगेवार ने जंगल सत्याग्रह में लिया हिस्सा
6 अप्रैल 1930 को गुजरात के दांडी में नमक कानून को तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इसके बाद, पूरे देश में सत्याग्रहियों ने कानूनों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया। मध्यप्रांत के अकोला में आंदोलन की शुरुआत 9 अप्रैल 1930 को हुई। वहां भी नमक कानून को तोड़ा गया। परंतु आंदोलन प्रभावी नहीं रहा। सरकार सत्याग्रहियों की गिरफ्तारी न करके संघर्ष को टालती रही। अतः प्रांतीय कांग्रेस ने आंदोलन को और प्रभावकारी बनाने के लिए जंगल सत्याग्रह को भी आंदोलन के कार्यक्रमों में शामिल करने का अनुरोध ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी से किया। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
दरअसल, 1927 का जंगल कानून मध्यप्रांत में लोगों और खासकर किसानों के लिए अत्यधिक नुकसानदायक था। इस कानून से पहले ईंधन के लिए लकड़ी काटने और चारे पर कोई प्रतिबंध या टैक्स नहीं लिया जाता था। लेकिन जंगलों में बढ़ोतरी और सुरक्षा के नाम पर शुरू हुए सरकारी नियंत्रण से स्थिति में बदलाव आ गया। जानवरों के लिए चारा महंगा होने से किसान परेशान हो उठे। मध्यप्रांत में वन विभाग के तहत 19,618 वर्ग मील जंगल था, जिससे सरकार को भारी राजस्व प्राप्त होता था।
इस अन्याय के विरोध में लोगों ने ब्रिटिश सरकार से शिकायत की। काउंसिल से प्रस्ताव पास कर ब्रिटिश सरकार को भेजे गए। काउंसिलों से भी प्रतिनिधियों ने इसके विरोध में आवाज उठाई, पर कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकल पाया। अब प्रतिबंध की अवहेलना करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प बचा भी नहीं था। अतः जंगल सत्याग्रह द्वारा प्रांतीय सरकार के राजस्व को निशाना बनाया गया।
डॉ. हेडगेवार ने संघ कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श के बाद जंगल सत्याग्रह में भाग लेने का फैसला किया। उस समय क्योंकि डॉ. हेडगेवार संघ के सरसंघचालक थे, इसलिए उन्होंने सरसंघचालक का जिम्मा डॉ. लक्ष्मण वासुदेव परांजपे को सौंप कर इस आंदोलन में हिस्सा लेने का फैसला किया। 21 जुलाई 1930 को डॉ. हेडगेवार अपने जत्थे के साथ जंगल सत्याग्रह करने के लिए पहुंचे। सत्याग्रह स्थल पर पुलिस और वन विभाग के अधिकारी मौजूद थे। वन अधिकारी ने उन्हें रोका और पूछा कि आप लोग यहां पर हंसिए लेकर क्यों आए हैं? क्या आप लोगों ने जंगल में घास काटने की अनुमति ली है?
इसकी अवहेलना करते हुए सभी सत्याग्रहियों ने घास काटना शुरू कर दिया। इस पर पुलिस ने सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद, सबको पुलिस चौकी पर ले जाया गया। उसी दिन इन सत्याग्रहियों पर यवतमाल की अदालत में मुकदमा चला और सजा सुनाई गई। डॉ. हेडगेवार को धारा 117 के तहत छह महीने का सश्रम कारावास तथा धारा 379 के तहत तीन महीने का सश्रम कारावास की सजा दी गई। इस तरह से डॉ. हेडगेवार को पूरे नौ महीने का सश्रम कारावास की सजा मिली। बाकी 11 सत्याग्रहियों को चार-चार महीने का कारावास की सजा सुनाई गई।
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