Srivari Hundi Tirupati: तिरूपति बालाजी मंदिर की इस हुंडी में भक्त करते हैं करोड़ों का दान
तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ने चालू वित्तीय वर्ष के लिये ₹4411.68 करोड़ का बजट पेश किया है। यह मंदिर के इतिहास में अभी तक का सबसे बड़ा बजट है। इसमें लगभग 50 प्रतिशत कमाई श्रीवारी हुंडी से होने का अनुमान है।

पिछले दिनों आंध्र प्रदेश की तिरूमाला पहाड़ियों पर स्थित भगवान वेंकटेश्वर स्वामी को समर्पित तिरूपति बालाजी मंदिर में साल 2022 में लगभग 2.37 करोड़ भक्तों ने ₹1,450 करोड़ का दान श्रीवारी हुंडी में दिया। इस दान में भारतीय रुपयों के साथ-साथ अमेरिकी डॉलर, मलेशियाई डॉलर, सिंगापुर डॉलर और अन्य देशों की मुद्राओं सहित सोना एवं चांदी भी शामिल हैं।
बीते सालों में हुंडी से मिला दान
मंदिर को वर्ष 2018 में श्रीवारी हुंडी से ₹1066.48 करोड़ का दान प्राप्त हुआ। जबकि 2019 में 6 प्रतिशत की वृद्धि के साथ ₹1161.74 करोड़ मंदिर को दान में मिले। कोविड महामारी के बावजूद 2021 में 1.04 करोड़ भक्तों से ₹833.41 करोड़ का चंदा मंदिर को श्रीवारी हुंडी संग्रह के माध्यम से प्राप्त हुआ था। अब सवाल पैदा होता है कि आखिर यह श्रीवारी हुंडी संग्रह क्या होता है और कैसे इसका प्रयोग मंदिर में होता है?
क्या है श्रीवारी हुंडी संग्रह
वित्तीय साधन के रूप में हुंडी का प्रचलन प्राचीन भारत से चला आ रहा है। इसका उपयोग व्यापार में धन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए किया जाता था। हुंडी एक आदेश पत्र जैसा होता है जो किसी व्यक्ति द्वारा नामित व्यक्ति को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का निर्देश देती है। सामान्य भाषा में हुंडी को आज की दुनिया का चैक भी माना जा सकता है।
जबकि तिरूपति बालाजी मंदिर में हुंडी का प्रयोग तो धन के लिये किया जाता है लेकिन उसका तरीका अलग होता है। दरअसल, मंदिर परिसर में श्रीवारी हुंडी स्थापित है जिसका उपयोग भक्तों से ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों प्रकार से दान लेने के लिए किया जाता है। इस श्रीवारी हुंडी में भक्त अपनी इच्छा से गुप्त दान दे सकते हैं।
मंदिर में इसकी स्थापना 25 जुलाई 1821 में 'सिरी कोलुवु' नाम से की गई थी। यह पीतल का बड़ा बर्तन है जो सफेद कपड़े से ढका होता है। इसका आकर 9 फीट लंबा होता है। यह श्रीवारी हुंडी एक हॉल की छत से बंधी होती है और इस पर लिपटे कपड़े में अनेक छिद्र बनाये हुए हैं। इन छिद्रों द्वारा ही श्री तिरूपति बालाजी के दर्शन उपरांत भक्त श्रीवारी हुंडी में अपनी श्रद्धानुसार दान देते हैं।
श्रीवारी हुंडी में कितना दान मिलता है मंदिर को
भारत सरकार के बजट की तरह ही तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) हर साल अपना बजट पेश करती है। वर्ष 2023-24 के लिए मंदिर ने अपना वार्षिक बजट ₹4411.68 करोड़ का पेश किया है, जो मंदिर के इतिहास में अभी तक का सबसे बड़ा बजट है और वित्तीय वर्ष 2022-23 से 43 प्रतिशत अधिक है। चालू वित्तीय वर्ष 2023-24 के बजट में लगभग 50 प्रतिशत की कमाई श्रीवारी हुंडी से होने का अनुमान है। इसके अलावा मंदिर को बैंकों में जमा धन से ब्याज, प्रसाद व भक्तजनों को मिल रही अनेकों सुविधाओं से धन प्राप्त होता है।
कहां व्यय होगा यह भारीभरकम बजट
तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) तिरुपति वेंकटेश्वर मन्दिर का प्रबंधन, धार्मिक कार्यों का संचालन व मंदिर के वित्त की देखरेख करती है। इसका मुख्यालय तिरुपति में है और इसमें लगभग 16,000 लोग कार्यरत हैं। इन्हीं लोगों के वेतन व मजदूरी आदि के भुगतान में मंदिर का मुख्य खर्च होता है।
एक अनुमान के अनुसार तिरुपति मंदिर ट्रस्ट कर्मचारियों के वेतन और भक्तों की सुविधाओं पर सालाना ₹695 करोड़ रुपए खर्च करता है। इसके साथ-साथ मंदिर के कामकाज और प्रसादम बनाने के लिए सामग्री की खरीद, इंजीनियरिंग कार्य और कर्मचारियों को ऋण या अग्रिम में भी मंदिर का खर्चा होता है।
हिंदू धर्म दान एक्ट 1951 कानून के तहत मंदिर के बैंक खातों में जमा धन पर 14 प्रतिशत प्रशासन शुल्क (राज्य सरकार), 4 प्रतिशत ऑडिट शुल्क और 4 से 10 प्रतिशत 'कमिश्नर कॉमन गुड फंड' के रूप में खर्च होता है। इसके अलावा मंदिर का पैसा सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं में भी स्थानांतरित किया जाता है।
क्या है हिंदू धर्म दान एक्ट, 1951
हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडाउमेंट एक्ट, 1951 (अर्थात हिंदू धर्म दान एक्ट, 1951) वर्ष 1951 में पारित किया गया। जिसके अनुसार भारत में बड़े-बड़े मंदिरों का प्रबन्ध सरकार ने अपने हाथों में ले रखा है। फिलहाल देश की सभी राज्य सरकारों ने सैकड़ों हिन्दू मन्दिरों का प्रबंधन अपने अधिकार में लिया हुआ है। इन मंदिरों से सरकारों को अरबों रुपए की कमाई होती है।
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