भक्तों की इच्छाओं से बोझिल होते भगवान

लखनऊ। शहर की गलियों व कूचों में चमचमाती रौशनी की रौनक मानो यह अहसास करा रही है कि नए साल का आगाज हो चुका है। इस स्वर्णिम छड़ को हर कोई जीना चाहता है। सुबह से ही मंदिरों के कपाट खुल गए हैं। धूप, अगरबत्ती व इत्र की सुगंध में भक्त भी लीन हैं। जयकारों के बीच नव वर्ष की मंगल कामना की इच्छा लिए भक्तों का ताता रुक नहीं रहा। दिल में आस्था, मन में आशा लिए सभी अपनी मुरादें भगवान को समर्पित करने में जुट गए हैं।

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इन सबसे इतर शायद किसी को भी इस बात का जरा भी अहसास नहीं है कि हम सब भगवान के जीवन में किस तरह खलल पैदा कर रहे हैं। उनकी शांति को कैसे भंग कर रहे है। कभी श्रृंगार के नाम पर उन्हें फूलों से बोझिल किया जा रहा है तो कभी घंटा, शंख व अत्याधुनिक माध्यमों से उनके जीवन में अशांति का विष घोला जा रहा है।

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क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की, कि उनकी क्या इच्छा है? वह हमसे क्या उम्मीद करते हैं? शायद नही! गीता में भगवान ने स्वयं अपने मुख से कहा है कि

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि।।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। अब सवाल यह उठता है कि जब भगवान ने स्वयं अपने मुख से हमें कर्म करने की प्रेरणा दी है तो फिर हम फल की इच्छा लेकर गुहार क्यों लगाते हैं?

हम फल की इच्छा लेकर गुहार क्यों लगाते हैं?

इसका यह मतलब बिल्कुल नही है की भगवान की पूजा अर्चना करना गलत है। पूजन से किसी को भी ऐतराज नही लेकिन जब भगवन स्वयं कर्म का पाठ पढ़ाते हैं तो फिर फलों की कामना के लिए इस तरह से उनसे आस लगाना भी कितना जायज है?

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