Rahul Gandhi Yatra: राहुल गांधी की यात्रा और कांग्रेस की मुश्किल
Rahul Gandhi Yatra: कांग्रेस नेता और वायनाड से सांसद राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा रविवार 17 मार्च 2024 को मुंबई में पूरी हो गई। राहुल गांधी इससे पहले भी भारत जोड़ो यात्रा निकाल चुके हैं।
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इन दो यात्राओं को निकालने के पीछे पार्टी भले ही किसी भी तरह के सियासी उद्देश्य से इनकार कर रही हो, लेकिन यह सबको पता है कि 2024 लोकसभा चुनाव के मिशन के तहत राहुल गांधी यात्रा पर निकले थे। अब बड़ा सवाल यह है कि इन यात्राओं से राहुल गांधी और उनकी पार्टी को हासिल क्या हुआ?

उम्मीद के विपरीत परिणाम
राहुल गांधी ने इस साल की शुरुआत में जब अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा की शुरुआत की, तो उसके पहले पार्टी तीन अहम राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव हार चुकी थी। हालांकि इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करने के उद्देश्य से बना इंडी गठबंधन से कांग्रेस को बड़ी उम्मीदें थीं और जिस तरह 26 दलों का साथ मिला, उससे यह एक बड़ी ताकत की तरह लग रहा था। ऐसे में जब यात्रा शुरू हुई तो उम्मीदें भी बढ़ने लगीं।
राहुल गांधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा जिस दिन शुरू की, उसी दिन महाराष्ट्र कांग्रेस के बड़े नेता मिलिंद देवड़ा ने पार्टी छोड़ दी और एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना में शामिल हो गये। यात्रा के ठीक दो दिन बाद हरियाणा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने पार्टी छोड़ बीजेपी ज्वाइन कर ली। अशोक तंवर को बीजेपी ने लोकसभा का टिकट दे दिया। इसके कुछ दिन बाद ही महराष्ट्र के पूर्व सीएम अशोक चव्हाण ने भी पार्टी छोड़ दी। इस बीच यात्रा असम पहुंची तो टकराव के चलते उनके पूरे यात्रा ग्रुप के खिलाफ ही असम पुलिस ने केस दर्ज कर लिया।
राम मंदिर के प्रति उदासीनता से अपने लोग ही नाराज
जनवरी में राहुल गाधी जब असम में अपनी यात्रा कर रहे थे तो उस दौरान ही अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को निमंत्रण भेजा गया, लेकिन पार्टी ने निमंत्रण को ठुकरा दिया। इसका उलटा असर पार्टी पर ही पड़ गया।
आम जनता में तो पार्टी के इस रवैये के खिलाफ गुस्सा दिखा ही, खुद पार्टी के कई नेताओं ने भी इसका विरोध किया। उनका मानना था कि निमंत्रण को राजनीति से अलग रखकर स्वीकार करना चाहिए था। इससे नाराज पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भी कांग्रेस छोड़ दी।
लोकसभा चुनाव के पहले जहां राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के जरिए बीजेपी खुद को हिंदूवादी दिखाने का प्रयास कर रही थी, तो वहीं कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने के आरोप लग रहे थे। हालांकि पार्टी का यह तर्क था कि धार्मिक कार्यक्रम में उसे जाने से परहेज है, क्योंकि वह सभी धर्मों को समान भावना से देखती है लेकिन फिर भी उसकी छवि खराब हो चुकी थी।
डैमेज कंट्रोल के लिए राहुल गांधी असम के कामाख्या मंदिर में दर्शन पहुंचे, लेकिन मंदिर के पास ही उनका विरोध होने लगा। राहुल गो बैक के नारे लगाए जाने लगे। हालांकि कांग्रेस इन्हें चंद बीजेपी कार्यकर्ताओं की हरकत बताकर इग्नोर करती दिखी।
बंगाल में नहीं मिला साथ
असम से राहुल गांधी पश्चिम बंगाल पहुंचे तो उनके और पार्टी नेता अधीर रंजन चौधरी के बयानों के चलते सत्ताधारी दल टीएमसी भड़क गई। नतीजा ये हुआ कि जो ममता बनर्जी एक वक्त कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम कैंडिडेट बनाने का समर्थन कर रही थीं, उन्होंने कांग्रेस के साथ बंगाल की 42 सीटों पर किसी भी तरह के गठबंधन से इनकार कर दिया। कांग्रेस के लिए हालत यह हो गई थी कि वह वहां पर टीएमसी से 3-5 सीटों के गठबंधन पर बातचीत करने लगी, लेकिन अचानक ममता बनर्जी ने अपने सभी 42 प्रत्याशी उतार दिए। यानी बंगाल में इंडी गठबंधन का अस्तित्व ही खत्म हो गया।
राहुल जब बंगाल से बिहार के किशनगंज पहुंचने वाले थे, उससे पहले ही राज्य में बड़ा खेला हो गया। आरजेडी, कांग्रेस के साथ गठबंधन कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार गठबंधन से अलग हो गये और बीजेपी के साथ एनडीए में शामिल हो गये। इसके साथ ही वहां आरजेडी, कांग्रेस और जेडीयू की नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई और नीतीश कुमार के ही नेतृत्व में जेडीयू और बीजेपी की सरकार फिर से बन गई। यानी कांग्रेस के हाथ से बिहार की सत्ता तो गई ही, नीतीश कुमार के जाने से इंडी गठबंधन की एकजुटता पर भी सवाल खड़े हो गये।
राहुल गांधी की यात्रा यूपी पहुंची तो समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ सीट शेयरिंग का विवाद शुरू हो गया। अखिलेश यादव ने तो यहां तक चेतावनी दे दी कि जब तक सीट शेयरिंग पर बात फिक्स नहीं होगी, तब तक वे इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं होंगे। बहरहाल काफी मान मनौवल के बाद आखिरकार सपा कांग्रेस के बीच बात बनी।
सपा ने कांग्रेस को 17 सीटें देकर पीडीए (यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के तहत इंडिया अलायंस को कुछ मजबूती मिलने के संकेत दिए। कांग्रेस को दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के तहत 7 में से तीन सीटें मिल सकीं। पंजाब में दोनों दलों ने नंबर वन और नंबर दो होने के चलते अलायंस नहीं किया।
यानी कुल मिलाकर राहुल गांधी की यात्रा जिस मिशन पर निकली थी, वह कहीं दिख नहीं रहा है। राहुल गांधी के सलाहकार उनको चाहे जो भी फीडबैक दें, लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि एनडीए गठबंधन के आगे इंडी गठबंधन और कांग्रेस की विपक्षी एकता का दावा कमजोर साबित हो रहा है।
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