Sushma Swaraj: अपनी ओजस्वी वाणी के लिए प्रसिद्ध थीं सुषमा स्वराज
प्रखर और ओजस्वी वक्ता, प्रभावी सांसद और कुशल प्रशासक मानी जाने वाली सुषमा स्वराज की आज पुण्यतिथि है। विरोधी दलों के नेता भी उनके मुरीद थे। उनका जन्म 14 फरवरी 1952 को अंबाला में हुआ था। इनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे।
सुषमा स्वराज ने चंडीगढ़ में पंजाब विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री पूरी की और 1973 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में पंजीकृत हुईं। एक छात्रा के रूप में वह छात्र राजनीति का भी हिस्सा रहीं।

राजनीतिक जीवन की शुरुआत
1977 में सुषमा स्वराज ने जनता पार्टी के सदस्य के रूप में हरियाणा विधानसभा का चुनाव लड़ा और मात्र 25 साल की उम्र में वह देश की सबसे कम उम्र की मंत्री बनी। यहां उन्होंने राज्य सरकार में श्रम और रोजगार और शिक्षा मंत्री के तौर पर कार्य किया। बाद में खाद्य और नागरिक आपूर्ति (1987-90) मंत्री के रूप में सुषमा स्वराज ने कुशल प्रशासन का परिचय दिया।
इसके बाद 1984 में वह भाजपा में शामिल हो गयी। उन्हें पार्टी का सचिव नियुक्त किया गया। सुषमा स्वराज की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह सात बार संसद सदस्य के तौर पर चुनी गयी थी। उन्हें उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से भी नवाजा गया था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 1996 में सुषमा स्वराज सूचना और प्रसारण मंत्री के तौर पर कैबिनेट में शामिल की गयी। इसके बाद 1998 में केंद्रीय मंत्रिमंडल को छोड़कर वह दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी थी।
बतौर विदेश मंत्री प्राप्त की ख्याति
सुषमा स्वराज अपनी दरियादिली और सहानुभूति के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने अपने कामों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखा। यही कारण है कि बतौर विदेश मंत्री जब उन्होंने कार्यभार संभाला तो वो सोशल मीडिया में भी काफी एक्टिव रहती थीं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब एक ट्वीट के जरिए सुषमा जी ने ईराक में फंसे 168 लोगों को बचाया था।
एक किस्सा यह भी है जब उन्होंने अपने नाम के आगे चौकीदार लिखा था। तब एक यूजर ने उनसे सवाल किया था कि हमें लगा कि आप हमारी विदेश मंत्री है। आप खुद को चौकीदार क्यों बुलाती है? तब सुषमा ने जवाब दिया कि मैंने अपने नाम के आगे इसलिए चौकीदार लगाया है क्योंकि मैं विदेशों में भारतीय हितों और भारतीय नागरिकों की चौकीदारी कर रही हूं। सऊदी अरब में बंधुआ बनाकर रखे गए 13 लोगों को जब उन्होंने मदद पहुंचाकर बचाया था तब विपक्षी नेताओं ने भी उनकी जमकर तारीफ की थी।
हाजिर जवाबी और ओजस्वी वक्ता
विदेश मंत्री रहते हुए एक यूजर ने उनसे यह कहते हुए मदद मांगी कि वह मंगल पर फंस गया है। इसका जवाब देते हुए उन्होंने लिखा था कि यदि आप मंगल पर फंस गए हैं तो भारतीय दूतावास वहां आकर भी आपकी मदद करेगा। वहीं जब वो संसद में भाषण देने के लिए उठती थीं तो विपक्ष भी उनकी बात को सुनता था।
लोकसभा में तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जब शायराना अंदाजा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने जवाब दिया तो सारा सदन मुस्कुरा उठा था। सुषमा स्वराज ने उनके किसी वक्तव्य पर कहा था कि तुम्हें वफा याद नहीं हमें जफा याद नहीं, जिंदगी और मौत के दो ही तो तराने हैं। एक तुम्हें याद नहीं एक हमें याद नहीं।
संयुक्त राष्ट्र में दिया गया ऐतिहासिक भाषण आज भी जनता को उनकी याद दिलाता है। जहां उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सबक सिखाया था। वहीं संस्कृत में जब सुषमा जी ने भाषण दिया था तो उनकी संस्कृत सुनकर शंकराचार्य भी उनके मुरीद हो गए थे। 67 साल की उम्र में इस लोकप्रिय नेता का निधन हो गया।












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