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Pulses Import: दाल के लिए हम कनाडा पर आश्रित नहीं, विकल्प और भी हैं

Pulses Import: भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश होने के साथ-साथ एक बड़ा दाल आयातक देश भी है। हम सबसे ज्यादा दाल कनाड़ा से आयात करते हैं जिसके साथ अभी तनाव चल रहा है। भारत में कनाडा से ज्यादातर मसूर दाल और म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) उर्वरकों का आयात होता है। आशंका जताई जा रही है कि यदि कनाडा के साथ संबंधों में सुधार नहीं होता तो दाल आयात प्रभवित हो सकता है और भारत- कनाडा के बीच चल रहे मतभेदों के कारण हमारी थाली में दाल कम पड़ सकती है। तो क्या भारत में दाल संकट खड़ा हो सकता है या फिर हमारे पास और भी विकल्प हैं।

भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश

वित्तीय वर्ष 2022-23 में 278.10 लाख टन दलहन का उत्पादन हुआ, जो अब तक का सर्वाधिक उत्पादन है। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। भारत विश्व का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक देश बन गया है। हम अकेलेे दुनिया भर के कुल दाल उत्पादन का 25-30 प्रतिशत उत्पादन करते हैं। यह मौजूदा केंद्र सरकार की प्रोत्साहन नीति का असर है। पर बावजूद इसके हमारी बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों के अनुपात में दलहन की खेती व उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पाई। बल्कि भारत में प्रति व्यक्ति उपलब्धता में कमी ही आई है। वर्ष 1951 में जहां प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता (एक साल) 22.1 किग्रा. थी, जो वर्ष 2021 में घटकर 16.4 किग्रा. रह गई है। वर्ष 2010 में प्रति व्यक्ति दाल उपलब्धता प्रतिवर्ष सिर्फ 12.9 किग्रा. ही थी।

Pulses Import: India have options rather than dependent on Canada for pulses

दालों की नियमित आपूर्ति हेतु भारत सरकार दालों का आयात करती है। जिसके चलते आयात में वृद्धि हो रही है और जमाखोरी व गुटबंदी के कारण दालों के मूल्य में वृद्धि भी हो रही है। पिछले एक साल में अरहर दाल के दामों में 39 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोत्तरी हुई है।

उत्पादन व खपत में अंतर

विश्व के कुल दाल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है, जबकि भारत में दाल की खपत विश्व के कुल उत्पादन का 28 प्रतिशत है। यानी दालों की खपत उत्पादन से 3 फीसदी ज्यादा है, जिसकी पूर्ति हम आयात के जरिए करते हैं।

उत्पादन में वृद्धि की गुंजाइश

भारत में वित्तीय वर्ष 2014-15 के दौरान 235.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर दलहन की खेती से 171.5 लाख टन दालों का उत्पादन हुआ। जबकि 2019-20 में 230.25 लाख हेक्टेयर, वर्ष 2020-21 में 254.63 लाख हेक्टेयर, वर्ष 2021-22 में 273.02 लाख हेक्टेयर तथा वर्ष 2022-23 में लगभग 310 लाख हेक्टेयर भूमि पर दलहन की खेती की गई। पिछले साल हमने कुल 278.10 लाख टन दालों का उत्पादन किया।

वित्तीय वर्ष 2014-15 से वित्तीय वर्ष 2022-23 तक यानि इन 9 वर्षों के दौरान दलहन की खेती का क्षेत्रफल लगभग 32 प्रतिशन बढ़ा, जबकि दालों के उत्पादन में 62.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। भारत में दलहन का उत्पादन राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सर्वाधिक होता है। तुअर/अरहर दाल का उत्पादन कर्नाटक और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा होता है।

भारत का दाल आयात

भारत अपनी दाल की आपूर्ति को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से आयात पर निर्भर है। कुल दाल आयात का लगभग 50 प्रतिशत कनाड़ा व म्यांमार से होता है। भारत प्रतिवर्ष कनाडा से औसतन 4 से 5 लाख टन दाल का आयात करता है। सबसे ज्यादा मसूर की दाल कनाड़ा से आयात होती है। इसके अलावा अरहर, चना, उड़द और मूंग दालें भी कनाड़ा से आयात की जाती हैं। कनाड़ा व म्यांमार के अलावा भारत अफ्रीकी देशों से भी दालों का आयात करता है।

वित्तीय वर्ष 2020-21 में भारत ने 24.66 लाख टन दालों का आयात किया, जो वित्त वर्ष 2021-22 में 9.44 प्रतिशत बढ़कर लगभग 27 लाख टन हो गया। जिसके चलते भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा आयातक भी बन गया।

कनाड़ा नहीं, तो कौन?

अगर भारत कनाडा के बीच रिश्ते बिगड़ते हैं और हम किसी कारण से कनाडा से दाल का आयात नहीं कर पाते हैं तो क्या भारतीयों की थाली में दाल नहीं आएगी? विशेषज्ञ बताते हैं कि शुरूआती कुछ परेशानियों के अलावा भारत में दाल का संकट नहीं आएगा। क्योंकि भारत के पास ऑस्ट्रेलिया के रूप में बेहतर विकल्प मौजूद है। ऑस्ट्रेलिया भी मसूर दाल का एक बडा निर्यातक देश है। भारत ने वर्ष 2022-23 में ऑस्ट्रेलिया से 3.5 लाख टन दाल का आयात किया था। इसके साथ-साथ भारत अमरीका से भी दालों का आयात बढ़ा सकता है।

आत्मनिर्भर बनना एक मात्र विकल्प

दालों का उत्पादन बढ़ाने की गुंजाइश अभी भी काफी है। इसके लिए नए किस्म और बीज प्रतिस्थापन पर सरकार का प्रमुख फोकस होना चाहिए। अरहर, मसूर और उड़द के लिए अधिक उपज देने वाली किस्मों के बीज, जो या तो केंद्रीय बीज एजेंसियों के पास या राज्यों में उपलब्ध हैं, उनका मुफ्त वितरण कर किसानों को दलहन की ओर मोड़ा जा सकता है। इंटरक्रॉपिंग से भी दालों का उत्पादन प्रभावी ढंग से बढ़ाया जा सकता है। असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में दाल के उत्पादन में बढ़ोतरी की बहुत संभावनाएं हैं ।

नीति आयोग के अनुमान के अनुसार 2029-30 में दालों की मांग बढ़कर 32.64 मिलियन टन हो जाएगी। इसलिए अगले सात वर्षों में उत्पादन में लगभग 50 लाख टन की वृद्धि आवश्यक है। यदि इस लक्ष्य को प्राप्त करना है तो दालों के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के लिए एक ठोस नीति की आवश्यकता है।

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