Rajya Sabha Elections: राज्य सभा चुनाव के बाद इंडी एलायंस में खलबली
Rajya Sabha Elections: भारत में 18वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव की तिथियों का ऐलान अगले कुछ दिनों में होने वाला है। राजनीतिक दलों की तैयारियां भी अब जोर पकड़ने लगी हैं। इस बीच राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्षी दलों की बेचैनी बढ़ा दी है।
क्रॉस वोटिंग और पार्टी निष्ठा के उलट राजनीतिक दांवपेंचों के आरोपों के बीच मंगलवार 27 जुलाई 2024 को 15 सीटों के लिए हुए मतदान में बीजेपी ने सबसे ज्यादा यूपी में 8 तथा हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में 1-1 सीटों पर जीत हासिल की। इसके अलावा यूपी में समाजवादी पार्टी को 2 और कांग्रेस को कर्नाटक में तीन सीटें ही मिल सकीं। इन जीतों में कई विधायकों के इधर से उधर होने की बड़ी भूमिका रही है।

विधायक जी सुबह एक पार्टी के साथ तो शाम को दूसरी पार्टी के साथ
राजनीतिक दलों की बेचैनी इस बात को लेकर है कि जिस तरह विधायकों की एक दल से दूसरे दलों में आवाजाही हो रही है, उससे चुनावी प्रक्रिया के दौरान भी यह कह पाना लगभग नामुमकिन है कि कौन किसके साथ है। सुबह जो विधायक एक पार्टी के साथ था, शाम को उसके दूसरी पार्टी के दफ्तर में होने की सूचना आ जाती है। इसको लेकर लोकसभा चुनाव से पहले सभी दलों खासकर विपक्षी इंडिया गठबंधन में खलबली है।
राहुल गांधी की पहले भारत जोड़ो यात्रा और फिर भारत जोड़ो न्याय यात्रा से कांग्रेस की बड़ी उम्मीदें बंधी थीं, लेकिन यूपी में जैसे हालात दिख रहे हैं, उससे पार्टी के रणनीतिकारों को फिर से सोचने पर विवश कर दिया है। समाजवादी पार्टी के यूपी में कांग्रेस के साथ गठबंधन से कुछ फायदा होने की उम्मीद भी टूट रही है। खुद समाजवादी पार्टी में ही एकजुटता सवालों के घेरे में है। इसका सबसे ताजा उदाहरण प्रयागराज में दिख रहा है। कभी मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी और समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे कुंवर रेवती रमण सिंह के पार्टी से बगावत करने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
रेवती रमण भी विरोध में
रेवती रमण तीन बार के सांसद और सात बार के विधायक रहे हैं। उनका आरोप है कि इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से 1984 के बाद से आज तक कोई भी कांग्रेस प्रत्याशी नहीं जीत सका है। जिस सीट पर कांग्रेस को 35 साल से जीत नहीं मिल सकी, उस सीट को अखिलेश यादव ने किस आधार पर कांग्रेस को दे दिया?
यह भी आरोप है कि अखिलेश यादव सभी फैसले खुद ले रहे हैं और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं। इस अनदेखी से पार्टी के कई निष्ठावान और वरिष्ठ नेता अपमानित महसूस कर रहे हैं। वे या तो पार्टी से अलग होने की तैयारी में लग गए हैं या फिर लोकसभा चुनाव में बगावती तेवर अपनाते हुए दूसरे दलों की मदद करने जा रहे हैं। रेवती रमण सिंह ने खुलकर मीडिया के सामने अखिलेश को इसका खामियाजा भुगतने की भी चेतावनी दे दी है।
बीजेपी अपने सभी हथियारों को धार देने में जुटी
बंगाल में ममता बनर्जी भी कांग्रेस से दूरी बनाकर चल रही हैं। उनके और पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के बीच जिस तरह की बयानबाजी हुई है, उससे टीएमसी ने साफ कर दिया है कि वह अकेले ही मैदान में उतरेगी।
उधर, बिहार में हाल ही में नीतीश कुमार के राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन से अलग होकर फिर से एनडीए के साथ राज्य में सरकार बनाए जाने से राजनीतिक पंडितों ने साफ भविष्यवाणी कर दी है कि बीजेपी कहीं कोई मौका छोड़ने के मूड में नहीं है।
पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में तीसरी बार सत्ता पाने के लिए बीजेपी अपने सभी हथियारों को धार देने में जुटी है। इसके साथ ही उसे अपने उन लक्ष्यों को पाने के लिए भी लड़ाई लड़नी है, जिसके लिए वह संपूर्ण विपक्ष से अलग दिखती है।
हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने जिस तरह से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने के लिए चुनावी मैदान में तैयारी के साथ उतरी थी, उससे यह साफ जाहिर है कि लोकसभा चुनाव में वह उससे भी ज्यादा कमर कसकर मुकाबला करने जा रही है।
ऐसे में मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिए बनाए गए विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन में न तो ऐसा कुछ ठोस आधार दिख रहा है, जिसके बूते वे मुकाबला कर सकें और न ही उनमें आपसी एकजुटता ही नजर आ रही है। इसका सबूत महाराष्ट्र है, जहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पार्टी से इस्तीफा देकर बीजेपी में शामिल हो गए। बीजेपी ने भी उन्हें हाथोंहाथ राज्यसभा का तोहफा देते हुए निर्विरोध जीत दिला दी।
दक्षिण का रुख करें तो केरल में सीपीएम और कांग्रेस अलग-अलग लड़ रहे हैं, लेकिन देश के दूसरे हिस्से में वे एकसाथ है। इससे जनता में यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस राजनीतिक जीत के लिए किसी को भी दोस्त और किसी को शत्रु बना लेती है। पीएम नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में इसका जिक्र कर चुके हैं। अब देखना है कि अगले कुछ दिनों में देश के चुनावी हालात किस तरफ मोड़ लेते हैं।
लोकसभा में मौजूदा समय में कुल 545 सीट हैं। इनमें से बीजेपी के पास 301 सीटें हैं। अभी बीजेपी के पास यूपी में सर्वाधिक 62 सीटें हैं। इसके बाद सबसे ज्यादा 28 सीटें मध्य प्रदेश में है। बीजेपी को सबसे ज्यादा चुनौती दक्षिण के राज्यों में है। उसके पास तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में एक भी सीट नहीं है। हालांकि इस बार प्रधानमंत्री मोदी का दक्षिण के राज्यों में खासा जोर है। वह तमिलनाडु समेत साउथ के राज्यों में लगातार दौरे और रैलियां कर रहे हैं।
इससे यह साफ जाहिर है कि बीजेपी 2024 के चुनाव में वहां से सीटें निकालने की रणनीति पर पूरी तरह से सक्रिय है। वैसे भी बीजेपी का लक्ष्य इस बार 400 के पार जाना है। अभी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की सीटें मिलाकर कुल 334 हैं। यह आंकड़ा बहुमत से काफी अधिक है। अगर बीजेपी केवल इसी को बरकरार रख लेती है तो भी विपक्ष धराशायी हो जाएगा।
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