यूपी की सियासी जमीन पर चमक रहे हैं अन्य राज्यों के नेता

Uma Bharti
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की जमीन सियासी तौर पर हमेशा दूसरे राज्यों के नेताओं के लिए उर्वरक ही साबित हुई है। प्रदेश के सियासी इतिहास पर नजर डालें तो यह हकीकत खुलकर सामने आती है। लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस जहां दो गुजरातियों को प्रदेश का प्रभारी बनाकर अपना सियासी लक्ष्य पूरा करने की रणनीति के तहत काम कर रही हैं, वहीं यह भी तय है कि अगर इन दोनों दलों में से किसी का भी चुनावी परिणाम वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव से बेहतर रहा तो भाजपा से अमित शाह और कांग्रेस से मुधसूदन मिस्त्री की वाहवाही तय है।

दोनों ही गुजरात में चर्चित नाम हैं, खासतौर से शाह तो भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ माने जाते हैं, वहीं मिस्त्री की पहचान कांग्रेस के जुझारू नेताओं में होती है। साफ है कि देश के सबसे बड़े चुनाव में सबसे मजबूत राज्य उत्तर प्रदेश में ये दोनों गैर प्रांतीय नेता अपने नाम का परचम लहराने के लिए जुटे हुए हैं।

यहां मिली जीत उन्हें उनके राज्य से भी कई गुना ज्यादा पहचान और नाम दिला सकती है। हालांकि उत्तर प्रदेश में अपनी सियासत चमकाने वाले दक्षिणी भारतीय नेताओं की भी कमी नहीं है। ऐसे कई नेता रहे जो यहां आए और यहां की राजनीति में रच-बस गए।

सुचेता कृपलानी, सरस्वती अम्माल, जयप्रदा, मीरा कुमार और उमा भरती इसी कड़ी का हिस्सा रही हैं। मीरा कुमार भले एक चुनाव जीत कर अपने गृह राज्य वापस चली गई हों, लेकिन आंध्र प्रदेश से आई जयाप्रदा ने उत्तर प्रदेश में ही घर कर लिया।

जया वर्तमान में प्रदेश के रामपुर जिले से दूसरी बार सांसद हैं और पूर्व विधानसभा चुनाव में अपने सियासी गुरु अमर सिंह के लोकमंच के लिए उत्तर प्रदेश में ही सक्रिय रहीं। वहीं उमा भारती के अलावा पहले भी अनेक महिलाएं ऐसी रही हैं, जिन्हांेने अपने प्रदेशों को छोड़कर उत्तर प्रदेश में आकर राजनीति में मुकाम हासिल किया।

प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी को ही लीजिए। जो 1908 में पंजाब प्रांत के अंबाला में पैदा हुईं और पढ़ाई पंजाब और दिल्ली में पूरी की लेकिन उन्होंने राजनीति के लिए उत्तर प्रदेश को ही अपनी कर्मभूमि बनाया।

सुचेता कृपलानी, सरस्वती अम्माल, जयप्रदा, मीरा कुमार, उमा भरती की कहानी

सुचेता कृपलानी यहां के मेंहदावल सीट से विधायक और गोंडा से सांसद रहीं। मूलत: पंजाब की होने के बावजूद उन्हें उत्तर प्रदेश रास आया। हालांकि उत्तर प्रदेश में सक्रिय होने से पहले वे दिल्ली से भी सांसद रही थीं।

कांग्रेस के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में ही केरल की दो बहनें सरस्वती अम्माल और अलमेलु अम्माल सक्रिय हुईं। दोनों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति में खासी सक्रियता दिखाई। सरस्वती अम्माल तो कांग्रेस की सरकार में मंत्री भी रहीं। वे उत्तर प्रदेश की विधान परिषद की सदस्य थीं, जबकि उनकी बहन अलमेलु अम्माल बस्ती जनपद के सदर सीट से दो बार 1984-89 विधायक रहीं।

रामपुर की सांसद जयाप्रदा ने भले आंध्रप्रदेश में रहते हुए तेलुगू देशम की राजनीति की हो और वे इसी दल से राज्यसभा की सांसद भी रहीं हो लेकिन उत्तर प्रदेश उन्हें ऐसा भाया कि यहीं की होकर रह गई। वे रामपुर की संसदीय सीट से दूसरी बार 2009 में निर्वाचित हुई, जबकि इससे पूर्व वे इसी सीट से 2004 में चुनी गई थी। दोनों ही बार वह समाजवादी पार्टी से चुनी गईं।

सबसे अहम बात रही कि सपा से निष्कासन के बाद भी आज तक उनका उत्तर प्रदेश से मोह भंग नहीं हुआ है और अपने संसदीय क्षेत्र में आकर वह विरोधियों को बिना कुछ कहे जवाब देती रहती हैं।

लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन भी उत्तर प्रदेश से ही राज्यसभा की सदस्य रहीं। वे मूलत: उत्तर प्रदेश की नहीं थीं, लेकिन वे काफी समय तक यहां सक्रिय रहीं। चुनावी राजनीति में सीधे न आते हुए भी उन्होंने समाजवादी पार्टी की ओर से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व किया। सपा की पूर्व सरकार में फिल्म निर्माण बोर्ड की अध्यक्ष की हैसियत से उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल था।

लोकसभा की अध्यक्ष मीरा कुमार ने अपनी चुनावी राजनीति की पारी की शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही की थी। आईएफएस की सेवा से निवृत्त होने के बाद उन्होंने कांग्रेस के झंडे तले 1985 में पहला उपचुनाव बिजनौर से ही जीता। हालांकि इस उपचुनाव के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश की ओर फिर से रुख नहीं किया।

वहीं मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की बात करें तो वह मौजूदा समय में महोबा की चरखारी सीट से विधायक हैं। भाजपा में वापसी के बाद से ही उन्हें जहां विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में भाजपा को पुनर्जीवित करने का दायित्व सौंपा गया। वहीं अब पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें उत्तराखंड का प्रभार सौंपा है।

उमा के सियासी सफर पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश के अयोध्या कांड के दौरान ही वह सुर्खियों में आईं और इसी से उन्हें बड़ी राजनीतिक पहचान मिली। वह खुद कहती हैं कि उनमें भारत बसता है, वह मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में पैदा हुईं, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में झांसी की चरखारी से विधायक हैं और अब देव भूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की प्रभारी बनाई गई हैं।

यहां तक कि अटल बिहारी बाजपेयी जैसे भाजपा के वरिष्ठ नेता भी मध्य प्रदेश में चुनावी शिकस्त के बाद उत्तर प्रदेश में लखनऊ संसदीय सीट से सांसद बनने के बाद ऐसे चमके कि उन्हें प्रधानमंत्री तक की कुर्सी हासिल हुई। इस कड़ी में ये चुनिंदा नाम ही नहीं हैं, बल्कि सभी सियासों दलों में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है।

साफ है कि उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन ने कई नेताओं के राजनैतिक जीवन को ऐसा खाद-पानी दिया, जिसकी बदौलत वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सके।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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