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Paswsn Family: चिराग के लिए आसान नहीं रामविलास पासवान का राजनीतिक वारिस बनना

Paswsn Family: बिहार की राजनीति में 60 के दशक के अंत में जब रामविलास पासवान का उदय हुआ था, वह देश में सामाजिक क्रांति का दौर था। उस समय समाजवाद पनप रहा था और कांग्रेस देश की सत्ता पर थी।

उस दौर में रामविलास पासवान न केवल खुद को राजनीति के बड़े कद्दावर नेता के रूप में स्थापित करने में सफल रहे, बल्कि सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में वह फिट भी बैठते रहे। अब जब रामविलास पासवान नहीं रहे तो उनकी विरासत को लेकर टकराव शुरू हो गया है। टकराव बाहर कम, परिवार के अंदर ही ज्यादा दिख रहा है।

Paswsn Family

पासवान और परिवारवाद

खुद रामविलास पासवान ने लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के परिवारवाद की तरह अपना कुनबा भी राजनीति में बढ़ाने के प्रयास किए, लेकिन इस कुनबे में एकजुटता कभी नहीं रही। बेटी-दामाद का उनके साथ असंतोष हो या बेटे का अपने चाचा से विवाद हो, इससे परिवार के अंदर ही कलह के हालात हमेशा बने रहे।

रामविलास पासवान की बेटी आशा और दामाद अनिल साधु 2015 में उनके सामने ही पार्टी में तानाशाही का आरोप लगाकर न केवल अलग हो गए थे, बल्कि लालू प्रसाद यादव के पास जाकर रामविलास पासवान और चिराग पासवान के खिलाफ हाजीपुर और जमुई से टिकट भी मांगे थे। उन्होंने तो यहां तक आरोप लगाया कि रामविलास पासवान केवल अपने बेटे चिराग का ही पक्ष लेते हैं। बेटी आशा पासवान ने आरोप लगाया कि पिता रामविलास पासवान अपनी पहली पत्नी के परिवार के सदस्यों की अनदेखी करते हैं।

असल में कहानी यह है कि राम विलास पासवान ने दो शादियां की थीं। उनकी पहली शादी 1960 में राजकुमारी देवी से हुई थी। उनसे उनकी दो बेटियां ऊषा और आशा थीं। पासवान ने 1981 में दूसरी शादी एक एयर होस्टेस रीना शर्मा से की। चिराग पासवान इन्हीं के बेटे हैं।

रामविलास पासवान की बेटी का कहना था कि वह केवल अपने बेटे का ध्यान रखते हैं, बेटियों का नहीं। हालांकि बेटी का आरोप राजनीतिक ज्यादा था। वह चाहती थी कि उनके पति अनिल साधु को रामविलास पासवान राजनीतिक रूप से मजबूत करें।

विरासत पर टकराव

अब जब लोकसभा चुनाव 2024 का आगाज हो गया है, तब रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत के असली वारिस का दावा करते रहे बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति पारस के बीच टकराव और गहरा हो गया है। अभी हाल में लोकसभा चुनाव 2024 के लिए बिहार में एनडीए गठबंधन में सीटों के बंटवारे में पांच सीट चिराग पासवान के लोजपा को मिल गयी है। जबकि केंद्रीय मंत्री पशुपति पारस को एक भी सीट नहीं मिली।

हालांकि गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी ने उन्हें राज्यपाल बनाने और विधानसभा चुनाव में प्रमुखता से जगह देने का प्रस्ताव दिया है। बीजेपी चिराग पासवान के साथ ही पशुपति पारस को भी साथ रखना चाहती है, लेकिन उन्हें फिलहाल सीट देने को इच्छुक नहीं है।

राजनीति के विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में जब कई दलों का गठबंधन होता है तो उसमें बहुत कुछ त्याग भी करना पड़ता है। पारिवारिक मतभेद अपनी जगह है, लेकिन राजनीतिक गुणागणित परिवार से नहीं, जमीन पर राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से तय होते हैं। अगर बीजेपी को आज चिराग पासवान को ज्यादा सीट देने में भलाई दिख रही है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। क्योंकि इसके पहले बीजेपी ने पशुपति पारस को गठबंधन में सीट भी दी थी और केंद्र में मंत्री पद भी दिया था। तब चिराग पासवान को सत्ता से दूर रखा गया था।

ऐसे में किसके साथ न्याय हुआ और किसके साथ अन्याय हुआ, यह गठबंधन में मायने नहीं रखता है। गठबंधन की मर्यादा की बुनियाद जनता में पहुंच और पकड़ के लिहाज से तय होती है। बिहार के नए राजनीतिक हालात में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू कुछ समय पहले तक आरजेडी के नेतृत्व वाली महागठबंधन का हिस्सा थी, लेकिन अब वह एनडीए के साथ है।

इसी तरह एक अन्य राजनीतिक जानकार बताते हैं कि चिराग पासवान और पशुपति पारस के बीच झगड़े से पहले उनके राजनीतिक गुरु रामविलास पासवान के राजनीतिक कौशल को भी याद किया जाना चाहिए। 1977 में रामविलास पासवान ने हाजीपुर लोकसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ा और 4 लाख 24 हजार 545 वोटों से जीत हासिल कर रिकॉर्ड बना दिया था। 31 साल की उम्र में इतनी बड़ी जीत हासिल करने वाले वे पहले नेता थे।

राजनीतिक कौशल किसके पास

वह नौ बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा के सदस्य रहे। उनका राजनीतिक कौशल ऐसा था कि वह देश के छह अलग-अलग दलों की सरकारों में मंत्री बने। वे विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में भी मंत्री रहे, एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सरकारों में भी मंत्री बने रहे। यानी अवसर को साधने के लिए खुद को अनुकूल बनाए रखा।

इससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के बाद पार्टी की कमान चिराग पासवान के संभालते ही लोक जनशक्ति पार्टी यानी एलजेपी की स्थिति लगातार कमजोर होती रही। पार्टी के एक-एक नेता अलग होते रहे। चिराग को बड़ा झटका तब लगा था, जब उनके छह में से पांच सांसदों ने बागी रुख अपनाते हुए पशुपति पारस को अपना नेता बना लिया और अलग हो गए।

यह चिराग पासवान के लिए राजनीतिक तौर पर बड़ा झटका था। इतना ही नहीं मटिहानी सीट से जीत हासिल करने वाले उनकी पार्टी के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह भी चिराग का साथ छोड़कर जेडीयू में शामिल हो गए थे। पिता के निधन के बाद चिराग का विरोध सिर्फ चाचा पशुपति पारस ने ही नहीं किया, बल्कि उनके चचेरे भाई प्रिंस राज ने भी किया। राम विलास पासवान की पार्टी से सांसद रहे सूरज भान ने ही चिराग पासवान के खिलाफ सांसदों की बगावत में प्रमुख भूमिका निभाई थी।

एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि पशुपति पारस के लिए अच्छा होता, अगर वह हालात को स्वीकार करते और मोदी सरकार में बने रहते। वैसे भी जब हवा मोदी सरकार की तरफ है तब उनके विरोध में जाना न तो राजनीतिक लिहाज से समझदारी भरा कदम है और न ही भविष्य के लिहाज से ही उचित है। विपक्ष में जो हालात हैं, वह 2024 के चुनाव में कोई बड़ी क्रांति लाने जैसी स्थिति में नहीं दिखता है।

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