अगले आंदोलन में 'आप' की गांधी टोपी नहीं पहनेंगे अरविंद केजरीवाल!

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने विगत दिनों में जो कुछ भी किया, वो साफ दर्शाता है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी गांधीवादी नहीं। गांधी टोपी पर "मैं आम आदमी हूं" लिख देने से गांधी की विचारधारा को आप अपने दिल में नहीं उतार सकते। केजरीवाल के हालिया धरने को देखने के बाद एक सवाल भी उठने लगा है कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के पहले वो महात्मा गांधी की समाधि को नमन करने क्यों गये थे?
रेल भवन के बाहर जो धरना दिया उससे उनकी साख गिरती दिख रही है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल अब एक संस्था के प्रतिनिधि हैं और उन्हे संस्थागत व्यवस्था में विश्वास रखते हुए काम करना चाहिये। न कि सस्ती लोकप्रियता के लिए। और दिल्ली एपिसोड के बाद गांधीवादी होने की दुहाई देना केजरीवाल को बंद कर देना चाहिये।
महात्मा गांधी को था जनतंत्र पर भरोसा
आर्इये इस बात को समझे महात्मा गांधी और चौरा-चौरे कांड से। 1922 के असहयोग आन्दोलन के दौरान गोरखपुर के पास चौरा-चौरी नामक स्थान पर 4 फरवरी को एक भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और ये वो लोग थे, जो अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आन्दोलन कर रहे थे। किसी बात को लेकर भीड़ अहिंसक आन्दोलन छोड़ कर हिसंक हो जाती है और उस पुलिस चौकी को घेर कर आग लगा दी गयी।
इस कांड में 22 लोग मारे गये और महात्मा गांधी इस बात से इतने दुखी हुए कि उन्होंने आन्दोलन ही वापस ले लिया। हालांकि आन्दोलन की तीव्रता इतनी ज्यादा चरम पर थी कि कांग्रेस के लोग आन्दोलन वापस लेनें को तैयार नहीं थे, उन्हे शायद जीत सामने दिख रही थी, लेकिन गांधी जी को तो कुछ और ही दिख रहा था। महात्मा गांधी ने कहा कि अगर लोग आन्दोलन की शुद्धता नहीं रख पा रहे हैं तो ऐसी सफलता जंनतंत्र के लिए घातक होगी। बापू को गिरफतार कर लिया गया और वे 6 वर्ष तक जेल में रहे।
अब देखिये दिल्ली में आप की नयी सरकार और उसके अनुभवहीन मंत्री व कार्यकर्ता सरकारी संस्थाओं, सरकारी कर्मचारियों और व्यवस्था के प्रति जिस प्रकार का आचरण कर रहे हैं, उससे लोगों में केवल अराजकता ही फैलेगी। आप का अराजकतावादी तरीका संयम से सिस्टम को ठीक कराता तो नहीं दिख रहा बल्कि ऐसे हथकंडों से लोगों का जनतांत्रिक भरोसा जरुर कम करता दिख रहा है।
गांधीवाद की दुहार्इ देने वाली पार्टी आप के मुखिया को गांधी के चौरा चौरी कांड से सबक लेना चाहिये। अगर वे जनतंत्र की राजनीति में भरोसा करते है तो उन्हें अपनी सोच बदलनी होगी। आप को शायद पता होगा कि हिटलर सत्ता में लोकतांत्रिक रास्ते से ही आया था और उसकी इसी अराजकतावादी सोच ने अधिनायकवाद को जन्म दिया जिसका परिणाम विश्वयुद्ध में दिखा।
केजरीवाल यह न भूलें
केजरीवाल को यह नहीं भूलना चाहिये कि दिल्ली में उनकी सरकार उनके खुद के दम पर नहीं, है बल्कि कांग्रेस के समर्थन पर है। और वह समर्थन खुशी से नहीं दिया गया है, और न ही आप को एक प्लेटफॉर्म देने के लिये बल्कि दिल्ली में वे सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिये दिया गया है। अगर आप का दिल्ली में इतना जोर होता तो भाजपा सबसे बडी पार्टी के तौर पर नहीं दिखती। बहरहाल यहां इससे यह मतलब कदापि नहीं निकालना चाहिये कि लेख भाजपा को सर्पोट कर रहा है।
जनतंत्र और भीड़तंत्र में काफी फरक है और हालांकि दोनों में भीड़ चाहिये होती है, लेकिन जनतंत्र की एक संस्थागत व्यवस्था, भाषा और शालीनता भी होती है। इसी की कमी ही जनतंत्र को भीड़तंत्र, अधिनायकवाद और अराजकतावादी बना देती है। आप के नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल और उनका दल कुछ ऐसा ही करता दिख रहा है। शोर शराबा कर भुक्तभोगियों के काम कराने के नाम पर आप के लोग जैसा कर रहै हैं वह संस्थागत प्रयास नहीं है और जैसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वो एक शुद्ध आंदोलन की भाषा कभी नहीं हो सकती। और अगर केजरीवाल खुद को नहीं बदलना चाहते हैं, तो उम्मीद है अपने अगले आंदोलन में वो "आम आदमी पार्टी" के नाम से रचित गांधी टोपी नहीं पहनेंगे।












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