Old Parliament: वर्तमान का अतीत से साक्षात्कार कराता रहेगा हमारा पुराना संसद भवन
Old Parliament: 18 सितंबर (सोमवार) को 96 वर्ष पहले बनी देश की संसद की पुरानी इमारत में संसदीय काम काज का आखिरी दिन था। 27 फीट लंबे सैंडस्टोन के बने 144 स्तंभों के सहारे वाली वृताकार इमारत को अब हमारी धरोहर के रूप में पहचाना जायेगा। गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर संसद का विशेष सत्र सदन की नई बिल्डिंग में चलाया जाएगा। पर पुराना संसद भवन अपने अतीत के साथ साथ भारत के लोकतान्त्रिक जीवन के 75 साल का साक्षी बनकर भी अपने होने तक खड़ा रहेगा।
पुरानी संसद का इतिहास
ब्रिटेन के ड्यूक ऑफ कनॉट ने 12 फरवरी 1921 को रायसीना हिल्स पर इस भव्य इमारत की नींव रखी थी। जॉर्ज पंचम के शासन काल में देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट करने यानी साल 1911 से ही एक ऐसी प्रशासनिक इमारत की जरूरत महसूस की जा रही थी।

काउंसिल हाउस बनाने के लिए ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को काम पर लगाया गया था। बेकर ने ही इसका लोकेशन और डिजाइन फाइनल किया था। इमारत की नींव रखते हुए ड्यूक ऑफ कनॉट ने इसे भारत की बेहतरीन नियति के पुनर्जन्म का प्रतीक बताया था। उसकी यह बात फली-फूली, मगर इमारत ब्रिटिश सरकार के लिए कम और स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के मंदिर के रूप में ज्यादा पहचानी और पूजी गई।
2500 राजमिस्त्रियों की 6 साल की मेहनत और 83 लाख रुपए से ज्यादा की लागत से तैयार यह इमारत अपने वक्त में ही दुनिया भर में आर्किटेक्चर का बेमिसाल उदाहरण साबित हुई थी। 18 जनवरी, 1927 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के शाही बग्घी में मौजूदा विजय चौक (तब ग्रेट प्लेस) पहुंचने और बेकर के हाथों उन्हें चाबी सौंपे जाने के साथ ही इस इमारत का औपचारिक उद्घाटन हो गया था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भी गवाह
ब्रिटिश काउंसिल हाउस यानी सेंट्रल एसेंबली की बैठक में 8 अप्रैल, 1929 को दोपहर में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से विवादित पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाने के दौरान क्रांतिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वरनाथ दत्त ने धुएं और तेज आवाज वाला बम फेंकने के बाद इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए, स्वतंत्रता की मांग से जुड़े पैम्फलेट उड़ाए और अपनी गिरफ्तारी दी। उन्होंने साफ-साफ कहा कि उन्होंने किसी की जान लेने के लिए नहीं, बल्कि बहरी सरकार को सुनाने के लिए जरूरी धमाके को अंजाम दिया था।
इनके विरोध के कारण दोनों ही विवादित विधेयक एक वोट से पारित नहीं हो पाये। देश की आजादी वाली रात यानी 14 अगस्त, 1947 की रात 11 बजे इसी भवन में अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा का विशेष सत्र बुलाया था। सुचेता कृपलानी की मधुर आवाज में वंदे मातरम के गायन के साथ सभा की कार्यवाही की शुरुआत की गई थी।
ऐतिहासिक फैसलों का मंदिर
इसी संविधान सभा में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना ऐतिहासिक और प्रसिद्ध भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' दिया था। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद इसी भवन में उन्हें प्रधानमंत्री नेहरू ने श्रद्धांजलि दी थी। चीन के धोखे के बाद साल 1962 में पछतावे से भरे उनके भाषण का भी गवाह यह भवन बना है।
पाकिस्तान से युद्ध के दौरान 1965 में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के देशवासियों से एक शाम उपवास का ऐतिहासिक आह्वान कर अमेरिकी दबाव को मानने से इंकार करने का निर्णय का साक्षी भी यह संसद भवन बना। 1971 में पाकिस्तान के लगभग 93 हजार सैनिकों के आत्मसमर्पण और बांग्लादेश के निर्माण को लेकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रशंसा का ऐतिहासिक दृश्य भी यहां सबने देखा है।
22 जुलाई 1974 को इंदिरा गांधी ने संसद में बताया था कि भारत ने पोखरण में शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण कर लिया है। वहीं, 21 जुलाई, 1975 को लोकतंत्र पर काले धब्बे की तरह लगने वाले आपातकाल की घोषणा की भी यह इमारत गवाह बनी है। आपातकाल खत्म होने के बाद के बड़े फैसले में इस सदन ने 1996 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अविश्वास प्रस्ताव के बाद इस्तीफे की घोषणा करते और 1998 में भारत को परमाणु हथियारों से संपन्न होने का ऐलान करते भी देखा।
वहीं, देश की सबसे बड़ी विधायिका ने 13 दिसंबर, 2001 को सबसे बड़ा आतंकवादी हमला भी झेला। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में यह सदन कई ऐतिहासिक बदलावों का साक्षी बना है। इनमें जीएसटी, नोटबंदी, कश्मीर से 35 ए और आर्टिकल 370 हटाना और देश को नया संसद भवन मिलना सबसे बड़े परिवर्तनों में शामिल है।
बरकरार रहेगा अस्तित्व
केंद्रीय भवन और शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मार्च, 2021 में राज्य सभा में कहा था कि एक बार नया संसद भवन तैयार हो जाने के बाद 24,281 वर्ग मीटर में बने पुरानी भवन की मरम्मत कर इसे वैकल्पिक इस्तेमाल के लिए रखा जाएगा। सदन में ही केंद्र सरकार ने कहा कि पुराने संसद भवन को संरक्षित कर रखा जाएगा। यह देश की पुरातात्विक संपत्ति होगी। उन्होंने कहा था कि संसदीय कार्यक्रमों के लिए ज्यादा जगह बनाने के लिए इसे 'रेट्रोफिट' यानी फिर से सुसज्जित किया जाएगा।
साल 2022 में सामने आई मीडिया रिपोर्ट में सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से कहा गया कि संसद की पुरानी इमारत को संसदीय संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि दर्शक और सैलानी पार्लियामेंट्री म्यूजियम में आ सकेंगे। संसद की कार्यवाही वाली जगह देख सकेंगे और वहां बने हुए विभिन्न चैंबर्स में भी बैठ सकेंगे। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि संसद की पुरानी इमारत में राष्ट्रीय अभिलेखागार को भी शिफ्ट किया जा सकता है।












Click it and Unblock the Notifications