Facebook और FM ..का 'नो कनेक्शन' .. बस बजाते रहो..

लखनऊ। फेसबुक अकाउंट इंसान के व्यक्तित्व का आईना होता है जहाँ हम उसकी पसंदगी और नापसंदगी को जान सकते हैं। फेसबुक और ट्विटर जैसी साईट्स में अखबार और टीवी की दुनिया के बड़े नाम देश और दुनिया के मुद्दों पर धारदार तरीके से अपनी बात रख जनमत बनाने का काम कर रहे थे वहीं रेडियो की दुनिया के रेडियो जॉकी (प्रस्तोता).. हेलो कैसे हैं आप लोग, क्या आपने कभी किसी से प्यार किया है, जैसी बेसिर पैर की बातें जो वे पहले से रेडियो पर बोलते चले जा रहे हैं वही फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग पर भी कर रहे हैं।

तर्क यह दिया जा सकता है कि फेसबुक हर किसी का अपना व्यक्तिगत माध्यम है और कोई किसी को हर मुद्दे पर लिखने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। बात सही भी है पर फेसबुक जैसा माध्यम जिसकी आजकल जनमत निर्माण में बड़ी भूमिका है वहां लोग आपसे महज इसलिए जुड़े हुए हैं कि आप रेडियो के बड़े प्रस्तोता हैं उन लोगों को देश दुनिया और अन्य मुद्दों के बारे में आपकी क्या व्यक्तिगत राय मायने रखेगी और किसी मुद्दे या घटना विशेष के संदर्भ में जनमत निर्माण में असर डालेगी। फेसबुक जैसी अन्य सोशल नेटवर्किंग साईट्स में यहाँ रेडियो अन्य जन माध्यमों के प्रयोगकर्ताओं के मुकाबले एकदम फिसड्डी नजर आता है।


फेसबुक अकाउंट व्यक्तित्व का आईना होता है..

टीवी और समाचारपत्रों से जुड़े हुए लोग उन मुद्दों और घटनाओं पर बेबाकी से अपने फेसबुक अकाउंट के माध्यम से अपने विचार रख रहे हैं। वहीं निजी ऍफ़ एम् स्टेशन के ये रेडियो जॉकी जिनके पास पर्याप्त मात्र में फेसबुक पर जनसमर्थन मौजूद है वे अपने फेसबुक अकाउंट को निजी ऍफ़ एम् का साइबर संस्करण बनाये हुए हैं जिनमें न तो कोई दिशा है न कोई विचार है न किसी बदलाव की छटपटाहट अगर कुछ है तो सिर्फ जो चल रहा है उसे चलाते रहो। उत्तर भारत के कई बड़े रेडियो जॉकी के फेसबुक अकाउंट को खंगलाने के बाद मैंने यह पाया कि यह रेडियो को एक ऐसा जनमाध्यम बनाने पर तुले हैं जो यह चाहता ही नहीं कि लोग किसी मुद्दे पर सोचे।

फेसबुक अकाउंट बना निजी ऍफ़ एम् का साइबर संस्करण

सरकार ने सिर्फ रेडियो समाचारों के प्रसारणों पर रोक लगाई है आप जो रेडियो पर नहीं कह पा रहे हैं तो उसके लिए फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग को जरिया बनाया जा सकता है पर यहाँ एक खतरा है फेसबुक पर कुछ कहने के लिए विचार होने चाहिए और ये रेडियो जॉकी या तो विचार शुन्यता का शिकार हैं या ये अपने एक्सपोज हो जाने का खतरा नहीं मोल लेना चाहते क्यूँकी जब आप किसी मुद्दे पर स्टैंड लेंगे तो लोगों को आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता का पता पड़ जाएगा और ये खतरा कोई भी जॉकी नहीं उठाना चाहता।

रेडियो संस्थान से वैचारिक विमर्श की इजाजत नहीं

तर्क यह भी दिया जाता है कि रेडियो संस्थान किसी भी मुद्दे पर अपने फेसबुक पेज से किसी वैचारिक विमर्श की इजाजत नहीं देते ठीक है आप अपने फेसबुक पेज से विमर्श को बढ़ावा नहीं दे सकते लेकिन आप अपने व्यक्तिगत अकाउंट से तो यह कार्य कर ही सकते हैं, फिलहाल इन सबके बीच में ऍफ़ एम् रेडियो से कुछ जा रहा है तो वह है विचार.. जिसमें नो दिमाग.. बस बजाते रहो।

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