ललन सिंह के लिए बहुत कठिन है डगर मुंगेर की
Munger Lok Sabha Seat: जनता दल यू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह, जिन्हें बिहार में लोग ललन बाबू कहते हैं, मुंगेर लोक सभा सीट पर कई समीकरणों को साधने में लगे हैं। यदि समय पर सभी चुनौतियों से वे पार नहीं पा सके तो यह चुनाव उनके लिए पसीने छुड़ाने वाला भी हो सकता है।
एक तो बिहार में जदयू कमजोर हुईं है, दूसरे बीजेपी के सामान्य कार्यकर्ता उनसे अब भी दूरी बनाए हुए है और राजद ने जाति समीकरण बिठा कर एक ऐसी उम्मीदवार को उतारा है, जिसके पति बाहुबली हैं, और उनकी जाति का यहाँ अच्छा खासा वोट भी है।

ललन सिंह के लिए मुंगेर में कभी खुशी कभी गम
मुंगेर लोकसभा क्षेत्र 2009 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया है। उसके पहले यह बाढ़ संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता था, जहां से खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सांसद हुआ करते थे। 2009 से ही ललन सिंह यहाँ से लड़ते रहे हैं। मुंगेर से वह दो बार जीत चुके हैं और एक बार हार भी चुके हैं। 2014 के चुनाव में बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी बीना देवी ने उनको हराया था। एक बार को छोड़कर ललन सिंह लगातार एनडीए के उम्मीदवार के रूप में ही चुनाव लड़ते रहे हैं। 2010 में वह कुछ समय के लिए नीतीश कुमार से अलग हो गए थे।
ललन सिंह की चुनौतियाँ
ललन सिंह की पहली चुनौती बीजेपी के कार्यकर्ताओं को मनाने की है। हालांकि बीजेपी पदाधिकारियों का कहना है कि एक बार जनता दल यू के साथ सीट शेयरिंग हो गई, तो पुरानी सभी बातें हम भूल गए। हमारे लिए चेहरा कोई मायने नहीं रखता, सीट मायने रखती है। सभी पार्टी कार्यकर्ता मोदी के 400 के मिशन के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन यही बात नीचे के कार्यकर्ता नहीं करते।
स्थानीय बीजेपी के लोग कहते हैं कि वे ललन सिंह के हाथों अपनी बेइज्जती नहीं भूल सकते। चूंकि उनके सामने कोई योग्य उम्मीदवार खड़ा नहीं है, इसलिए कहीं और वोट करने का विकल्प उनके पास नहीं है, लेकिन ललन सिंह को लेकर आम बीजेपी कार्यकर्ता में उत्साह नहीं है, जिसका नुकसान ललन सिंह को हो सकता है। एक बीजेपी कार्यकर्ता का कहना था कि यदि राजद किसी फॉरवर्ड क्लास को यहाँ से टिकट देता तो निश्चित रूप से लोग उसे वोट देते।
गैंगस्टर अशोक महतो की पत्नी हैं आरजेडी उम्मीदवार
ललन सिंह के सामने राजद ने 45 वर्षीय अनीता कुमारी महतो को टिकट दिया है, जिनकी पहचान 57 वर्षीय सजायाफ्ता गैंगस्टर अशोक महतो की पत्नी के रूप में है। अनीता और अशोक महतो की शादी भी अभी हाल ही में हुईं है। अब अशोक महतो क्षेत्र की जनता से मुंह दिखाई में अनीता कुमारी को वोट देने के लिए कह रहे हैं।
अशोक महतो 90 के दशक के खतरनाक गैंगस्टर थे। 17 साल जेल में रहने के बाद वह नवंबर 2023 में बाहर आए। महतो अपसढ़ नरसंहार मामले में मुख्य आरोपी थे, जिसमें नवादा में 12 लोगों की हत्या हुई थी। अशोक महतो का नाम पांच बार के विधायक और दो बार के सांसद राजो सिंह की हत्या (2005) और नवादा जेल ब्रेक (2001) में भी शामिल रहा है। उन पर खाकी-द बिहार चैप्टर नाम से एक वेब सीरीज भी बन चुकी है।
धानूक जाति के महतो उपनाम का आरजेडी को काफी फायदा मिल सकता है। यहाँ इनकी जाति के लगभग डेढ़ लाख और कुर्मी जाति के भी दो लाख वोट हैं। इस लोक सभा में मल्लाह जाति के भी लगभग एक लाख से अधिक वोट हैं। मुकेश साहनी के आरजेडी के साथ जाने के बाद यह वोट बैंक भी आरजेडी के साथ जा सकता है। फिर यादव और मुस्लिम मतदाताओं की भी संख्या अच्छी खासी है। यानी यह जातिगत समीकरण ललन सिंह का खेल बिगाड़ भी सकता है। आरजेडी मुंगेर लोकसभा चुनाव को गड़ी-पिछड़ी जाति के नाम पर ही लड़ने की कोशिश कर रहा है।
भूमिहारों के भरोसे एनडीए
दूसरी तरफ ललन सिंह मुंगेर में सबसे ज्यादा भूमिहार जाति के वोट पर भरोसा कर रहे हैं। यहाँ लगभग 4 लाख भूमिहार वोटर हैं। इसी समीकरण की वजह से इसी सीट पर भूमिहार उम्मीदवार जीत हासिल करता रहा है। जेडीयू के ललन सिंह भी इसी जाति से आते हैं। यहाँ कुशवाहा वोटर भी करीब 2 लाख है, जो एनडीए में शामिल उपेन्द्र कुशवाहा के कहे अनुसार वोट कर सकता है। करीब डेढ़ लाख बनिया वोटर भी हैं, जो बीजेपी के सपोर्टर माने जाते हैं।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मुंगेर लोकसभा सभा चुनाव में कुर्मी, धानुक के साथ एमवाई समीकरण बनने के आसार हैं। लेकिन अनिता देवी को लेकर लोगों में यह बात भी घर कर रही है कि कहीं इनकी उम्मीदवारी और जीत बिहार को 90 के दशक में ना लौट दे। जहां कानून दम तोड़ चुका था और प्रदेश में गुंडा राज कायम हो गया था।
यदि जनता में यह आशंका घर करती है तो मुंगेर के राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ भी एक मुश्त ललन सिंह को वोट कर सकते हैं। जंगल राज लौटने की आशंका पीएम मोदी भी जता चुके हैं। यह गोलबंदी ललन सिंह के पक्ष में जा सकती है। वैसे आरजेडी अभी तक यहाँ लोक सभा की सीट नहीं जीत सका है।
2014 में आरजेडी ने प्रगति मेहता को उतारा और उन्हें लगभग 2 लाख वोट मिले। उसके पहले वर्ष 2009 में आरजेडी ने राम बदन राय को उतारा था और उन्हें भी केवल एक लाख 84 हजार 956 मत प्राप्त हुए। इस बार मामला थोड़ा अलग है। अब लालू के बजाय तेजस्वी आरजेडी का नेतृत्व कर रहे हैं और वह रोजगार और सत्ता में जाति के आधार पर भागीदारी की बात करते हैं। अगर राजद को यहाँ कामयाबी मिलती है तो उनकी राजनीति के इस नए ट्रेंड पर मुहर लग जाएगी।












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