Mount Everest Day: एवरेस्ट की चोटी पर 70 वर्ष पहले रखा गया था पहला कदम
29 मई 1953 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में शुमार माउंट एवरेस्ट पर दो देशों के झंडे गड़े थे। यही वजह है कि इस दिन को अंतरराष्ट्रीय माउंट एवरेस्ट दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

हर पर्वतारोही का सपना होता है कि वह एवरेस्ट की चोटी पर फतह करे। इसके लिए कई दिनों की ट्रेनिंग और तमाम हिदायतों के साथ एक पर्वतारोही एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ता है। ऐसे में दो पर्वतारोही थे जिन्होंने पहली बार एवरेस्ट पर पांव रखे थे। वे थे नेपाल के तेनजिंग नॉर्गे शेरपा और न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी। 29 मई 1953 को दोनों ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में शुमार एवरेस्ट पर दो देशों के झंडे गाड़े थे। यही वजह है कि इस दिन को अंतरराष्ट्रीय माउंट एवरेस्ट दिवस के तौर पर मनाया जाता है। वहीं आपको बता दें कि एडमंड हिलेरी के निधन के बाद नेपाल ने इस दिवस को मनाने का फैसला किया था। अंतरराष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस का आयोजन एडवेंचर स्पोर्ट्स टूरिज्म सोसाइटी और नेपाल टूरिज्म बोर्ड (NTB) द्वारा किया जाता है।
इससे पहले भी हो चुके थे प्रयास
वर्ष 1953 में सबसे पहले तेनसिंग नोर्गे शेरपा और एडमंड हिलेरी ने एवरेस्ट पर सफल चढ़ाई की थी जिसके बाद से जुलाई 2022 तक 6,098 लोगों द्वारा लगभग 11,346 बार शिखर की चढ़ाई की जा चुकी हैं। हालांकि, शेरपा और हिलेरी की यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी। ये दोनों ब्रिटिश अभियान का हिस्सा थे, जिसका नेतृत्व उस समय जॉन हंट ने किया था। शेरपा तेनजिंग ने अपनी आत्मकथा 'टाइगर ऑफ द स्नोज' में लिखा है कि जब हिलेरी ने सबसे ऊंची चोटी के शिखर पर पहला कदम रखा तो उनका उत्साह दोगुना हो गया था। दोनों 29 मई 1953 को सुबह 11:30 बजे शिखर पर पहुंचे थे। ऑक्सीजन गैस का अभाव था।
आपको बता दें कि एवरेस्ट पर चढ़ने का सबसे पहला प्रयास साल 1921 में एक ब्रिटिश दल द्वारा किया गया था। लेकिन तेज तूफान ने उनकी चढ़ाई को रोक दिया। 1922 में भी एक अन्य दल ने प्रयास किया लेकिन हिमस्खलन ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद 1924 में अंग्रेजों ने तीसरा एवरेस्ट अभियान भी शुरू किया। मगर शिखर से महज 900 फीट पीछे से उनको वापस आना पड़ा।
माउंट एवरेस्ट में अब तक हुई मौतें
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी को फतह करना इतना आसान नहीं है। यहां कई लोग अपनी जान भी गवां चुके हैं। 25 अप्रैल 2015 को आए 7.8 तीव्रता के भूकंप के कारण माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप में 19 लोगों की मौत हो गई थी। वहीं 14 अप्रैल 2014 को एक हिमस्खलन ने 16 नेपाली पर्वतारोही गाइडों को मौत की नींद सुला दिया था। इस क्षेत्र में ऑक्सीजन का दबाव बेहद कम होता है। ऐसे में अब तक मौतों के आंकड़ों की बात करें तो 300 से अधिक मौतें यहां हो चुकी हैं। वहीं आपको बता दें कि पिछले 30 वर्षों में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के दौरान हुई मौत के मामले में मृत्यु दर लगभग एक प्रतिशत है।
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के रिकॉर्ड
माउंट एवरेस्ट पर फतह करने के कई रिकॉर्ड बन चुके हैं। नेपाल के अप्पा शेरपा ने 21 बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का रिकॉर्ड कायम किया हुआ है। तो वहीं हरियाणा से विकाश कौशिक और उनकी पत्नी सुषमा कौशिक एवरेस्ट पर चढ़ने वाले सबसे युवा दंपत्ति बने है। वहीं 45 साल की प्रेमलता अग्रवाल ने सबसे उम्रदराज पर्वतारोही का रिकॉर्ड अपने नाम किया है। इसके साथ ही आपको बता दें कि अरुणाचल प्रदेश की 32 साल की अंशु जामसेपना पहली महिला है जिन्होंने एक ही सीजन में दो बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी। वहीं भारत की रेकिंग की बात करें तो भारत टॉप पांच देशों में शुमार है जिसने सबसे ज्यादा बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की है। इसमें नेपाल, अमेरिका, ब्रिटेन भी शामिल हैं।
भारत की पहली महिला पर्वतारोही बछेंद्री पाल
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1984 में जब भारत ने एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए एक दल का गठन किया तो उसमें 11 पुरुष और पांच महिलाएं शामिल थी। इस दल का नाम 84 था। लेकिन तूफान और कठिन चढ़ाई का सामना करते हुए केवल एक महिला ने एवरेस्ट की चोटी फतह की थी उनका नाम बछेंद्री पाल था। वह भारत की पहली महिला बनी जिन्होंने एवरेस्ट की छोटी पर फतह हासिल की। बछेंद्री पाल को 1986 में अर्जुन अवार्ड, पदमश्री, पर्वतारोहण फाउंडेशन से गोल्ड मेडल और उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने भी गोल्ड मेडल से नवाजा था।












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