Moon Mission: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाना क्यों है मुश्किल? अब तक कितने मिशन हुए फेल?
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव दुनियाभर की स्पेस एजेंसी के लिए बरमुडा ट्राएंगल बना हुआ है। यहां सॉफ्ट लैंडिंग की चाह रखने वाले कई मून मिशन फेल हो चुके हैं।
हाल ही में भारत का चंद्रयान-2 और रूस का लूना-25 मिशन भी यहां लैंड करने के चक्कर में फेल हो चुके हैं। हालांकि, भारत के चंद्रयान-3 मून मिशन के कामयाब होने की संभावनाएं जताई जा रही है।

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव दुनियाभर की स्पेस एजेंसीज के लिए रहस्य बन गया है। अब तक किसी स्पेस एजेंसी के स्पेसक्राफ्ट ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंड नहीं किया है। चार दशक के बाद रूस द्वारा लॉन्च किया गया लूना-25 मिशन 20 अगस्त के दोपहर में फेल हो गया। इसकी पुष्टि रूसी स्पेस एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने की है। 23 अगस्त की शाम को भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो शायद ऐसा करने वाली पहली स्पेस एजेंसी बन जाएगी।
11 अगस्त को लॉन्च हुए रूसी स्पेस एजेंसी का लूना-25 चांद की सतह से महज कुछ किलोमीटर ऊपर क्रैश हो गया। इससे पहले इसरो का चंद्रयान-2 भी साल 2019 में चांद की सतह से करीब 3 किलोमीटर ऊपर क्रैश हो गया। ऐसे में चांद का यह हिस्सा भी बरमुडा ट्राएंगल की तरह ही रहस्यमयी बना हुआ है। वैज्ञानिकों की मानें तो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर बड़ी मात्रा में खनिज संसाधन होने की संभावना है। साथ ही, यहां जमी हुए बर्फ भी हो सकती है, जिसकी वजह से यहां जीवन की संभावना तलाशी जा सकती है। भारत का तीसरा मून-मिशन चंद्रयान-3 भी यहां उतरकर इसके वातावरण, मिट्टी आदि की जांच करने के लिए है।
21 बार चांद पर उतरने में मिली सफलता
दुनियाभर की स्पेस एंजेसी ने अब तक 21 बार चांद पर उतरने में सफलता पाई है। इनमें से 6 बार चांद की सतह पर इंसानों ने भी कदम रखे हैं। अमेरिका, रूस, चीन जैसे देश चांद की सतह पर अपने झंडे गाड़ चुके हैं। पिछले एक दशक की बात करें तो केवल चीन ही तीन बार चांद की सतह पर उतर चुका है। इसके अलावा 17 बार चांद की सतह पर 70 के दशक में ज्यादातर स्पेस एजेंसी ने उतरने में सफलता पाई है। ये सभी मून मिशन चांद के उत्तरी ध्रुव पर सफल हुए हैं। 1963 से लेकर 1976 के बीच दुनिया की अलग-अलग स्पेस एजेंसियों ने 42 बार चांद पर लैंडिंग करने की कोशिश की है, जिनमें केवल 21 बार ही चांद की सतह पर सफलतापूर्वक उतरा जा चुका है।
3.84 लाख किलोमीटर का मुश्किल सफर
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर क्रैश लैंडिंग के बारे में जानने से पहले हमें चांद और धरती के बीच के 3 लाख 84 हजार किलोमीटर के मुश्किल भरे सफर के बारे में जानना चाहिए। इतनी लंबी यात्रा के दौरान एक छोटी सी चूक भी पूरे मिशन को असफल बना सकती है। धरती के मुकाबले चांद का वातावरण पतला है यानी यहां के वातावरण में अंतरिक्षयान यानी स्पेसक्राफ्ट को कम घर्षण मिलता है, जिसकी वजह से यह चांद की सतह पर तेजी से टकराता है और क्रैश लैंडिंग का शिकार बन जाता है। धरती के वातावरण की बात करें यह काफी मोटा है और स्पेसक्राफ्ट को इसमें पर्याप्त घर्षण मिलता है, जिसकी वजह से उसकी रफ्तार को कम करने में मदद मिलती है और सॉफ्ट लैंडिंग बेहद आसान हो जाती है।
आखिरी 15 मिनट हैं काफी अहम
चंद्रयान-2 मिशन के दौरान इसरो के प्रमुख रह चुके के. सिवान ने भी कहा था कि लैंडिंग के अंतिम 15 मिनट काफी मुश्किल भरे हो सकते हैं। सिवान के अंदेशों के मुताबिक, चंद्रयान-2 लैंडिंग के आखिरी क्षणों में खो गया था, जिसकी वजह से भारत का बहुप्रतीक्षित मून मिशन फेल हो गया था। हालांकि, इस बार इसरो अपने मून मिशन की सफलता को लेकर आशवस्त दिख रहा है। इसरो इस बार चंद्रयान-3 को चांद के दक्षिणी ध्रुव के करीब उतार रहा है। ऐसे में इसके क्रैश होने की संभावना कम दिखाई दे रही है। इसके अलावा इसरो ने इसके लैंडर के लेग्स को मजबूत बनाया है, ताकि क्रैश लैंडिंग की स्थिति में भी इससे प्रज्ञान रोवर आसानी से बाहर निकल सके और चांद की सतह की जांच कर सके।
दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करना क्यों है मुश्किल?
चंद्रयान-3 ने 14 जुलाई को धरती से उड़ान भरने से लेकर अब तक सभी बाधाओं को सफलतापूर्वक पार कर लिया है। 23 अगस्त को इसे चांद की सतह पर पहले शाम 5:45 बजे लैंड करना था, जो अब शाम 6:04 हो गया है। इसके समय में कुछ मिनट का बदलाव हुआ है। चांद के दक्षिणी ध्रुव का तापमान अधिकतम 100 डिग्री सेल्सियस से ऊपर और न्यूनतम माइनस 200 डिग्री सेल्सियस के करीब रहता है। वहां पर्याप्त रोशनी रहती है लेकिन धरती के दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका की तरह ही चांद को ठंडा माना जाता है।
चांद के दक्षिणी ध्रुव को एक चुंबकीय क्षेत्र माना जाता है, जिसे एटकेन बेसिन कहा जाता है। चुंबकीय क्षेत्र होने की वजह से यह स्पेसक्राफ्ट को अपनी तरफ तेजी से खींचता है। चांद पर भेजे जाने वाले स्पेसक्राफ्ट को यहां उतरने से पहले डी-बूस्ट किया जाता है। यह एक ऐसा फेज होता है, जिसमें अंतरिक्षयान की गति को धीरे-धीरे कम किया जाता है, ताकि वह चांद की सतह पर आसानी से सॉफ्ट लैंड कर सके। दक्षिणी ध्रुव एक चुंबकीय क्षेत्र होने की वजह से अंतरिक्ष यान (जो धातु का बना होता है) की स्पीड को प्रभावित करता है।
चंद्रयान-3 के LHDAC (लैंडर हैजार्ड डिटेक्शन एंड अवॉयडेंस कैमरा) ने हाल ही में कई तस्वीरें भेजी हैं, जो दक्षिणी ध्रुव के पास की है। यहां कई बड़े-बड़े गड्ढें तो कहीं मैदानी एरिया को देखा जा सकता है। इसरो अपने अंतरिक्षयान के विक्रम लैंडर को मैंजिनस-यू (Manzinus-U) क्रेटर के पास उतार सकता है। इसमें मौजूद विक्रम लैंडर 12 डिग्री तक झुकाव वाले सतह पर उतरने में सक्षम है। चांद की सतह पर उतरते समय उसकी गति 2 मीटर प्रति सेकेंड रह सकती है, लेकिन उसकी हॉरीजोंटल गति इससे कहीं कम केवल 0.5 मीटर प्रति सेकेंड रहेगी, जो इसकी सॉफ्ट लैंडिंग को आसान बनाएगी।
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