लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचेगी बंगाल की आंधी

West Bengal
लोकसभा चुनाव में बंगाल कैसे वोट करेगा? क्या वोटों की लहर ठीक वैसे ही होगी जिसमें तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में वामपंथी दलों का पत्ता साफ कर दिया था, क्या ममता बनर्जी एक बार फिर पार्टी का परचम लहरा पायेंगी? इन सवालों के जवाब तो ईवीएम खुलने के बाद ही मिलेंगे, लेकिन वर्तमान समीकरण अभी से तृणमूल और लेफ्ट विंग के बीच कड़ी टक्कर को दर्शा रहे हैं। साथ में चलेगा मोदी फैक्टर।

सीएनएन आईबीएन के ओपिनियन पोल की मानें तो तृणमूल कांग्रेस इस साल 20 से 28 सीटों तक जीत सकती है, जबकि लेफ्ट फ्रंट 7 से 13। वोट शेयर की बात करें तो तृणमूल के खाते में 33 प्रतिशत और लेफ्ट के खाते में 25 प्रतिशत वोट गिरेंगे। वहीं कांग्रेस को 19 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी का प्रभाव यहां ज्यादा नहीं दिख रहा है, लिहाजा भाजपा को 6 से 14 फीसदी तक मिल सकते हैं।

केंद्र में ममता का सिक्का

उत्तर प्रदेश में जो सपने मुलायम सिंह यादव देख रहे हैं, बंगाल में वही हाल ममता बनर्जी का है। ममता को सबसे ज्यादा सीटें मिलने का साफ मतलब है कि सरकार बनाने में वो अहम भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगा कि वो एनडीए के साथ जाएंगी या तीसरे मोर्चे के साथ। लेकिन इन सर्वेक्षणों के परिणाम उलट भी हो सकते हैं, क्योंकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। बंगाल में कानून व्यवस्था चरमरा गई है, इसमें कोई शक नहीं। लगातार हुईं रेप की वारदातों की वजह से लोगों में गुस्सा व्याप्त होने लगा है।

हाल ही में पार्क स्ट्रीट रेप केस को लेकर ममता सरकार को बड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उसके बाद परगना जिले में और बीरभूम में सामूहिक बलात्कार और कई अन्य मामले ऐसे हैं, जिनकी वजह से लोगों का दिल खट्टा हो गया है। कानून व्यवस्था से इतर बात करें तो उद्योग बढ़ाने के मामले में भी ममता सरकार फेल हुई है। ममता सरकार बनने के बाद से कोई भी बड़ा निवेशक बंगाल को नहीं मिला। जबकि यहां पर हर साल भारी संख्या में स्नातक छात्र निकल रहे हैं। इसके मुख्य कारण नंदीग्राम और सिंगुर विवाद हैं।

और आगे बात करें तो शारदा ग्रुप का चिट फंड घोटाला है, जिसमें 14 लाख निवेशकों का पैसा डूब गया। बिजनेस टुडे मैगजीन की एक खबर के अनुसार इसमें तृणमूल के कई नेता लिप्त हैं। सरहद की बात करें तो बांग्लादेश बॉर्डर पर निरंतर घुसपैठ पश्चिम बंगाल को पीछे धकेलने का काम कर रही है।

बंगाल में मोदी इफेक्ट

इन सब बातों के बीच यहां पर नरेंद्र मोदी का जादू भी आ जाता है। मोदी ने बंगाल में बहुत ज्यादा रैलियां नहीं की हैं, लेकिन उनके फॉलोवर्स की संख्या यहां पर लगातार बढ़ रही है। मोदी की वजह से भाजपा के स्थानीय नेताओं का कद भी ऊंचा हो रहा है। खास बात यह है कि बंगाल के सोशल मीडिया में भाजपा तेजी से आगे बढ़ रही है, यानी उसका टार्गेट यूथ है।

नरेंद्र मोदी की बंगाल सेना में 12 हजार सदस्य जुड़ चुके हैं। इसमें कई प्रोफेशनल्स और कॉलेज छात्र हैं। यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। दोहा की पबित्रा डे लोकसभा चुनाव के 10 दिन पहले कोलकाता आयेंगी और मोदी का प्रचार करेंगी। वहीं सत्य प्रकाश यादव, तनमय बसक, देव साहक जैसे कई हैं, जो सिर्फ मोदी का प्रचार करने के लिये कोलकाता जायेंगे।

कुल मिलाकर इस लोकसभा चुनाव में बंगाल की जमीन पर राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा दिखाई देगी और तो और यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यहां के लोग वामपंथी दलों के बचेकुचे नेताओं से दूर भागने के प्रयास में हैं। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

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