मासिक-धर्म: किसी अच्छे डिटर्जेंट से साफ़ कीजिये अपनी सोच
औरत है तो भैया कभी भी किसी भी बात के लिए फटकार दो, हमेशा से भारतीय समाज में ऐसा होता आया है। अगर वो रोये तो त्रिया चरित्र दिखा रही है। ताने दो देकर जान ले लो। लडकी है तो तेज़ नही बोल सकती जोर से नहीं हंस सकती, प्यार नहीं कर सकती और सबसे मज़ेदार बात तो ये की माहवारी में आराम नहीं कर सकती। पूछिए क्यों?

अरे जनाब हर महीने ही तो होता है ये सब,कुछ नया तो नहीं, दुनिया में सबको होता है। क्या हर वक्त इसी का रोना रोटी रहेगी, यह सब कुछ नहीं होता उठ कर काम करो, दुनिया में बस तुमको ही पीरियड्स होते हैं क्या? ये की बड़ी बात नहीं वगैरह वगैरह।
समाज को यह आम लगता है
और ये बाते ये ताने तो हर लडकी सुनती है कभी माँ से कभी बॉय फ्रेंड से कभी पति से कभी सास से और कभी उस दोस्त से जिसे शायद पीरियड्स में दर्द नही होता। बॉयफ्रेंड और पति तो कभी ये बातें नही समझ सकते क्योंकि वो कभी इस दौर से गुजरेंगे नहीं। रही बात माँ और सास की तो वो वैसा ही करेंगी जैसा उन्होंने अपने बचपन से होते हुए देखा है।
पीएमएस है एक मुश्किल दौर
पीरियड्स में होने वाली तकलीफ़ें यानि पीएमएस या प्री मेंसट्रूअल सिंड्रोम पर बहस जारी है क्योकिं समाज के एक बड़े हिस्से का यह मानना यह की ऐसा वैज्ञानिक तौर पर नहीं होता यह सिर्फ हमारी सोच है।
लेबर जैसा पेन भी हो सकता है
डॉक्टर्स बताते हैं की 100 में से एक लड़की को पीरियड्स के दौरान लेबर जैसा दर्द होता है और कई केसेस ऐसे भी होते हैं जिनमे पीरियड्स कब आते है और चले जाते हैं मालूम नही चलता।आपको एक किस्सा बताती हूँ जहाँ पीरियड्स के दौरान होने वाली छूतछात और रोक टोक से अवसाद ग्रस्त होकर एक 14 साल की लडकी ने आत्महत्या कर ली।यह एक पहला केस नहीं है। पीरियड्स के दिनों में उदासी अपराधबोध और डॉ का कारण डॉक्टरों के अनुसार शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव हैं।
कुछ एक आंकड़ों के माध्यम से बताना चाहती हूँ
- unicef ने 2015 में एक सर्वे किया जिसमे यह मालूम हुआ की 28 लाख लडकियाँ स्कूल में टॉयलेट न होने के कारण पीरियड्स के दौरान स्कूल जाना छोड़ देती हैं।
- और साथ ही घर में होने वाले तमाम अंधविश्वासों के कारण 19 लाख लडकियाँ पीरियड्स शुरू होते ही हमेशा के लिए स्कूल जाना छोड़ देती हैं।
- 2010 के एक सर्वे के मुताबिक 100 में से केवल 12 लडकियाँ सैनिटरी पैड्स का प्रयोग करती हैं, जहाँ देश में पीरियड्स होने वाली महिलाओं की संख्या 35 करोड़ से अधिक है ऐसे में 12 प्रतिशत औरतों का ही पैड्स इस्तेमाल करना या कर पाना महिला स्वाथ्य के लिए खतरे की घंटी है।
- मुझे याद है मेरे घर में भी बड़ी औरतें एक ही कपड़ा धो धो कर सालों इस्तेमाल करती थीं।
- टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट में जिसमे एम्स ने के सर्वे किया था उसमे यह खुलासा हुआ की महिलाओं में आत्महत्या के कई कारणों में एक कारण माहवारी के दौरान अवसाद का होना भी है।
सोच को साफ़ रखना है जरूरी
हम सब जानते हैं कि यह एक स्वाभाविक समस्या है लेकिन अपने दिमाग की गंदगी को साफ़ करके हम कई महिआलों को एक बेहतर स्वास्थ्य और खुशनुमा कल डे सकते हैं। करना सिर्फ इतना है की अपने इर्द गिर्द फैली अन्धविश्वास की गंध को साफ करना है।












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