N. Biren Singh: फुटबॉलर से पत्रकार और फिर राजनीति में, जानें कैसे बने बीरेन सिंह मणिपुर के मुख्यमंत्री
N. Biren Singh: मणिपुर में जारी हिंसा के बीच राज्य के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह 30 जून को अपना इस्तीफा पत्र लेकर राजभवन के लिए निकले। इस बीच उनकी महिला समर्थकों ने राजभवन के बाहर सड़क पर जाम लगा दिया और मुख्यमंत्री के काफिले को आगे नहीं जाने दिया। फिर एक नाटकीय घटनाक्रम के दौरान कुछ महिला समर्थकों ने उनके इस्तीफे को फाड़ दिया और उनसे रिजाइन न करने का अनुरोध किया। इसके बाद मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर कहा कि वह अपने पद से इस्तीफा नहीं दे रहे है।
बता दें कि मणिपुर में 29 जून को फिर से भड़की हिंसा में तीन लोगों की मौत हो गयी और पांच घायल हो गये थे। वहीं ह्यूमन राइट वॉच के मुताबिक अब तक 100 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि लगभग 40,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं। मणिपुर में हिंसा रूक नहीं रही है इसलिए मुख्यमंत्री बीरेन सिंह अपने पद से इस्तीफा देना चाहते थे।

लेकिन, क्या आपको पता है कि मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह राजनेता बनने से पहले मशहूर पत्रकार थे। उससे पहले सेना के जवान और उससे भी पहले एक फुटबॉलर थे। जबकि उनका बेटा अजय मैतेई एक हत्यारा निकला। चलिए, आज हम आपको बीरेन सिंह का पूरा इतिहास बताते हैं।
कौन हैं नोंगथोम्बम बीरेन सिंह?
एन. बीरेन सिंह का जन्म 1 जनवरी 1961 को मणिपुर की राजधानी इंफाल में हुआ था। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मणिपुर विश्वविद्यालय से ही बीए की डिग्री हासिल की। बीरेन सिंह को बचपन से ही फुटबॉल में दिलचस्पी थी। जब वह 18 साल के थे, तब एक मैच के दौरान सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की फुटबॉल टीम में चुन लिये गये। वह अपने राज्य के बाहर फुटबॉल खेलने वाले मणिपुर के पहले खिलाड़ी थे।
बीरेन सिंह ने शुरुआत में तो फुटबॉल को अपने करियर के तौर पर चुना और बीएसएफ की तरह से फुटबॉल खेलते हुए साल 1981 में डूरंड कप में हिस्सा लिया और कोलकाता के मोहन बागान की टीम को हराया। साल 1992 तक उन्होंने बीएसएफ और राज्य के लिए खेलना जारी रखा, इसी दौरान उनकी रूचि पत्रकारिता की तरफ जगने लगी। उन्होंने मणिपुर के ही स्थानीय अखबार नाहरोल्गी थोउदांग में नौकरी शुरू की। पत्रकारिता जगत में वह काफी तेजी से आगे बढ़ते गये और 9 साल में ही यानी वर्ष 2001 तक अखबार के संपादक बन गये।
पत्रकारिता के लिए जेल गये बीरेन सिंह
बीरेन सिंह एक अच्छे फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन उस दौरान प्रदेश में उतने चर्चित नहीं थे। जब वह पत्रकारिता में आये तब उनकी एक अलग पहचान बन गयी। इस दौरान वह ऑल मणिपुर वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के अध्यक्ष भी रहे। इसलिए प्रदेश के न केवल पत्रकारों के साथ, बल्कि कई प्रमुख संगठनों के पदाधिकारियों व बड़े नेताओं के साथ अच्छी जान-पहचान बन गयी। यहां तक की कई नेताओं को वह मुश्किल परिस्थियों में सलाह भी दिया करते थे। जब वह अखबार के संपादक थे, उस दौरान उनके अखबार में प्रकाशित एक खबर को कथित तौर पर देशद्रोही बताया गया। इस लेख के कारण बीरेन सिंह को गिरफ्तार भी कर लिया गया। उन्हें इसके लिए कुछ दिन जेल में बिताने पड़े थे। हालांकि, वह आर्टिकल क्या था इसका जिक्र कहीं और नहीं मिलता।
ऐसे हुई राजनीतिक करियर की शुरुआत
एन. बीरेन सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत साल 2002 में क्षेत्रीय पार्टी डेमोक्रेटिक पीपुल्स पार्टी से जुड़कर की थी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह राज्य की हेनगांग विधानसभा सीट से विधायक चुने गये। साल 2004 के चुनाव से पूर्व इस पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया था। तब वह कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में सतर्कता राज्य मंत्री बनाये गये।
इसके बाद साल 2007 में इसी विधानसभा क्षेत्र से दोबारा चुने गये और उन्हें सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण, युवा मामले और खेल मंत्री बनाया गया। इसके बाद साल 2012 में वह तीसरी बार अपनी सीट बचाने में सफल रहे लेकिन मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किये गये। इसका कारण था साल 2011 में उनके बेटे अजय मैतेई का एक हत्याकांड में नाम आना। मंत्री न बनाये जाने से तत्कालीन मुख्यमंत्री इबोबी सिंह से उनके संबंध खराब हो गये और दोनों के बीच दूरियां आ गयीं। इसके बाद उनके राजनीतिक करियर में 'भाजपा' चैप्टर शुरू होता है।
क्या है बीरेन सिंह के बेटे का पूरा मामला
20 मार्च 2011 को होली का दिन था (जिसे स्थानीय रूप से योशांग के नाम से मनाया जाता है)। उस दिन 21 वर्षीय इरोम रॉजर अपने चार दोस्तों के साथ कार लेकर शहर में घूमने निकला था। उसी समय मंत्री एन. बीरेन का बेटा एन. अजय (उस समय एन. बीरेन कांग्रेस सरकार में युवा मामलों और खेल मंत्री थे) भी अपनी बोलेरो गाड़ी में इन लोगों के आगे चल रहे थे। उनकी गाड़ी के पीछे एक दोपहिया गाड़ी पर दो लड़कियां थीं। अजय न तो उन्हें रास्ता दे रहे थे, न रॉजर और न उनके दोस्तों को। तब रॉजर ने कई बार हॉर्न दिया, जिसके बाद अजय ने अपनी गाड़ी बीच रास्ते में ही रोकी और गुस्से में बाहर आकर रॉजर पर गोली चला दी। जिसके बाद अस्पताल ले जाते हुए रॉजर ने दम तोड़ दिया।
इस हत्याकांड ने पूरे मणिपुर को हिला कर रख दिया था क्योंकि इस हत्या का आरोप तत्कालीन खेल मंत्री के बेटे पर था और जो मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के करीबी भी थे। इसके बाद पूरे मणिपुर में प्रदर्शन होने लगा। जनता के गुस्से के चलते मुख्यमंत्री को यह भी कहना पड़ा कि पूरी जांच के लिए मामला पुलिस से सीबीआई को ट्रांसफर किया जाएगा। इसके बाद 22 मार्च को रॉजर का अंतिम संस्कार किया गया। जनवरी, 2017 में इंफाल की एक सत्र अदालत ने 33 वर्षीय अजय को धारा 304 (2) के तहत 'हत्या की श्रेणी में नहीं आने वाली हत्या' का दोषी ठहराया। इसके तहत उसे पांच साल की सजा सुनाई गयी, तब तक बीरेन सिंह भाजपा ज्वाइन कर चुके थे।
बेटे की गिरफ्तारी से नाराज थे बीरेन सिंह
साल 2011 में अपने बेटे की गिरफ्तारी से बीरेन सिंह काफी नाराज थे। इसके बाद साल 2012 में पद नहीं मिलना उनके उदास मन को और चोट कर गया। हालांकि, पार्टी और इबोबी सिंह से नाराज चल रहे बीरेन सिंह को मनाने के लिए कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश कांग्रेस का उपाध्यक्ष बना दिया गया, लेकिन इबोबी सिंह के साथ समझौते का कोई संकेत नहीं मिला।
दूसरी ओर भाजपा, असम और अरुणाचल प्रदेश में सरकार बनाने के बाद मणिपुर पर नजर रख रही थी, उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो इबोबी सिंह को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सके। तभी भाजपा ने बीरेन सिंह पर दांव खेला और भाजपा 2015 से ही बीरेन को लुभाने की कोशिश करने लगी। वहीं अक्टूबर 2016 में बीरेन ने हाथ का साथ छोड़ कमल को थाम लिया।
उन्हें भाजपा ने राज्य चुनाव प्रबंधन समिति का प्रवक्ता और सह संयोजक नियुक्त किया। इसके बाद साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वह हेनगांग सीट से चुनाव जीत गये। जिसके तुरंत बाद बीजेपी ने उन्हें मणिपुर का सीएम घोषित कर दिया। यह पहली बार था जब मणिपुर में बीजेपी की सरकार बनी थी। इसके बाद साल 2022 में मणिपुर की 60 सदस्यीय विधानसभा में 32 सीट जीत कर बीजेपी ने सत्ता में दोबारा वापसी की। दूसरी बार भी बीजेपी विधायक दल के नेता एन. बीरेन सिंह को चुना गया और दोबारा मणिपुर के मुख्यमंत्री बने।












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