मालदा-पूर्णिया हिंसा, यूपी में "सिर कलम" का कनेक्शन-ए-आज़म

हिंदू संगठन के नेता कमलेश तिवारी का एक बयान और मालदा के कई इलाके जलकर खाक हो गये। इस आग की चिंगारी जब पूर्णिया पर पड़ी तो हिंसा भड़क उठी, जिसका खामियाजा पुलिस को भुगतना पड़ा। इसमें कोई शक नहीं कि बंगाल-बिहार में उठी सांप्रदायिक हिंसा की आग उत्तर प्रदेश में भी फैल सकती है। और अगर यह आग फैली तो इसके जिम्मेदार सीधे तौर पर प्रदेश के मंत्री आजम खां होंगे। जी हां आजम खां का कनेक्शन केवल इन दो हिंसाओं से ही नहीं, बल्क‍ि यूपी में तिवारी सिर कलम करने की धमकी से भी है।

Azam Khan

महज बयान या कहिए एक बहाने ने खुद को इंसानियत से अलग एक धर्म में फिट करते हुए मालदा तैयार कर दिया। निश्चित तौर पर बयान बेवकूफाना ही नहीं बल्कि आस्थाओं के साथ खिलवाड़ था। लेकिन सियासत के चंद प्यादों के चक्कर में बिरादरियों में मतभेद। कुछ असहज सा है।

मालदा के थानों ने मुंह पर डर की उंगली रखकर सरकारों की हकीकत बता दी। मजहबों में असल में कितनी मुहब्बत या सामंजस्य है इसको आग की तपन से खाक हो चुकी गाड़ियों ने समझा दिया। इन सबके इतर जो समझाया गया वो थी जिम्मेदारों की असलियत। प्रशासन की ऐसे मामलों के प्रति गंभीरता, पूर्व तैयारी लगभग सभी की कलई खोल कर रख दी। धर्म का खंजर मालदा में ही नहीं बल्कि बिहार के पूर्णिया को भी बंजर कर मंजर शब्द को परिभाषित कर गया।

क्या हुआ मालदा में-

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में हिंदू महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष कमलेश तिवारी के एक आपत्तिजनक बयान के चलते करीबन ढाई लाख मुसलमानों ने बयान की मुखालिफत करते हुए रैली निकाली। रैली के दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी। भीड़ ने दर्जन भर से ज्यादा गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। इन सबके इतर मालदा जिले के कालियाचक पुलिस स्टेशन पर हमला किया। जिसके बाद प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए धारा 144 लगा दी। जानकारी के मुताबिक पूरे मामले में 10 लोगों को गिरफ्तार कर उन पर गैरजमानती धाराएं लगाई गई हैं।

पूर्णिया में हिंसा या मालदा पार्ट- 2

पूर्णिया में गुरुवार को ऑल इंडिया इस्लामिक काउंसिल की अगुवाई में मुस्लिम समुदाय के करीब 30 हजार लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। दरअसल मालदा की आग की चंद चिंगारियों को हवा देते हुए कहीं न कहीं पूर्णिया में सामंजस्य को फूंकने की कोशिश की जा रही थी। इन सबके बीच मुद्दा फिर से कमलेश तिवारी का पैगंबर मुहम्मद साहब पर की गई वो आपत्तिजनक टिप्पणी थी।

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प्रदर्शन में शामिल हुए नारेबाज बुलंद आवाजों में कमलेश तिवारी को फांसी दो की मांग कर रहे थे। इस दौरान कमलेश तिवारी का पुतला फूंका गया और भीड़ हिंसक हो चली। पुलिस थाने पर हमला हुआ, कंप्यूटर, फर्नीचर को तोड़ डाला। पुलिस की गाड़ियों को भी आग के सुपुर्द कर दिया गया।

यहां तो नीतीश भी हैं जिम्मेदार

मालदा में हो चुकी घटना के बाद बिहार के पूर्णिया में प्रदर्शन की इजाजत प्रशासन की सोच पर सवाल खड़े करती है। बिहार का गृह मंत्रालय, जिसकी कमान स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों में है, उसने पहले से सतर्कता क्यों नहीं बरती। और जिस अध‍िकारी ने प्रदर्शन की इजाजत दी, उसके विरुद्ध अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

मालदा-पूर्णिया का आजम खां से कनेक्शन

उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के कद्दावर मंत्री आजम खां की। 29 नवंबर 2015, एक ऐसी तारीख जब आजम ने गे राइट्स के संदर्भ में बताते हुए कहा कि आरएसएस वाले ऐसे ही हैं, इसीलिए तो शादी नहीं करते। जिसके बाद प्रतिक्रिया में कमलेश तिवारी ने पैगंबर मोहम्मद साहब पर विवादित बयान दिया।

सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हुई टिप्पणी

हिंदू महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष कमलेश तिवारी का पैगंबर मुहम्मद साहब पर दिया गया विवादास्पद बयान सोशल मीडिया पर सर्कुलेट होता रहा वहीं आजम खां का बयान तमाम विवादित बयानों की फेहरिस्त में खो गया।

मुस्लिम धर्म गुरूओं का ध्यान भी कमलेश तिवारी के बयान के ऊपर गया, दूसरी ओर उर्दू मीडिया में तिवारी का बयान भी प्रमुखता से छापा गया। 2 दिसंबर को सहारनपुर के देवबंद में बयान के विरोध में एक बड़ा प्रदर्शन किया गया। दरअसल यह पहली प्रतिक्रिया थी। लोगों की भावनाओं को आहत करने एवं लोगों के गुस्से के मद्देनजर कमलेश तिवारी को अरेस्ट कर लिया गया। सूबे के मुखिया अखिलेश यादव ने कमलेश तिवारी पर कड़ी कार्रवाई करने का मुस्लिम धर्मगुरूओं को आश्वासन भी दिया।

आजम को क्यों भूल गए

निश्चित तौर पर कमलेश तिवारी को पैगंबर मुहम्मद साहब के अपमान के लिए सजा मिलनी चाहिए। सजा के रूप में तिवारी को अरेस्ट भी कर लिया गया। लेकिन सवाल ये भी उठता है कि जहां से इस मामले को पहली चिंगारी मिली कार्रवाई तो उस सिरे से लेकर आखिरी कोने तक होनी चाहिए। केवल इसलिए क्योंकि आजम सपा सपा के वरिष्ठ मंत्री हैं, इसलिये उन्हें छोड़ दिया जाये?

यह गलत है या सही, इसका फैसला हम नहीं कर सकते, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि कार्रवाई नहीं करने के पीछे मुस्ल‍िम वोट हैं। सपा को डर है कि आजम पर कार्रवाई करने से कहीं अल्पसंख्यकों के वोटों का ध्रुवीकरण न हो जाए।

खुलेआम सिर कलम करने का किया गया ऐलान

बिजनौर में कलेक्ट्रेट के बाहर हुई सभा में जमीअत शबाबुल इस्लाम के वेस्ट यूपी महासचिव और जामा मस्‍जिद के इमाम मौलाना अनवारुल हक ने कहा कि बिजनौर जिले के उलेमाओं ने निर्णय लिया है कि अगर कमलेश तिवारी को सजा नहीं मिलती है तो वे उसे खुद सजा देंगे। उन्होंने कहा कि कमलेश तिवारी का सिर कलम करके लाने वाले व्यक्ति को बिजनौर के मुसलमान 51 लाख रुपए का इनाम देंगे। धरना प्रदर्शन के बाद सीएम के नाम संबोधित एक ज्ञापन मजिस्ट्रेट को सौंपा गया, जिसमें कमलेश तिवारी को फांसी दिलाए जाने की मांग की।

सिर कलम करने की बात करने वाले मौलाना साहब जानते हैं, कि जब तक आज़म खां बैठे हैं, जब तक यूपी पुलिस उन्हें हाथ तक नहीं लगायेगी। लेकिन अफसोस इस बात का है कि सीधे-सीधे खुलेआम जान से मारने की धमकी दी गई, और प्रशासन चुप-चाप देखता रहा। ब जान से मारने की धमकी पर किसी को धाराएं क्यों नहीं याद आ रही हैं। सीधे-सीधे देखा जाये तो यहां भी सपा सरकार के हाथ मुस्ल‍िम वोटों की जंजीरों से बंधे हुए हैं।

कानून के लंबे हाथ- कैसे हो सकती है कार्रवाई?

  • खुलेआम सिर कलम करने की बात करने पर 506 IPC के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
  • किसी पर निजी टिप्पणी करने पर 504 IPC के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
  • जाति, धर्म पर टिप्पणी करना 295 IPC के अंतर्गत आता है।

पश्चिम बंगाल के मालदा और बिहार के पूर्णिया में हुई घटना के बाद चंद सवाल उठने लगने लगते हैं। पहला तो ये कि कौन सी वजह है कि भीड़ हिंसक हो उठी? किन लोगों ने अपने अनैतिक हितों को साधने के लिए भीड़ का इस्तेमाल किया? इन सारे सवालों पर जब हमने जानकारों से बात की तो कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं।

    • भीड़ का न तो कोई चेहरा होता है और न ही खुद का दिमाग। असंवेदनशील (असंवेदनशील का अंग्रेजी में मतलब) दिमागों के साथ भीड़ खुद को जोड़कर गलत सही का निर्णय नहीं कर पाती।
    • भेड़चाल में चलने वाले लोग हिंसक घटना में खुद को शामिल करने में बिलकुल भी नहीं हिचकिचाते।
    • शांतिपूर्वक तरीका उत्पात से हर मायने में बेहतर है, समाधान होने के अवसर के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी हो जाती है।
    • निजी जीवन में बेहद शांत रहने वाले लोग भीड़ में शामिल होकर हिंसक हो जाते हैं।

      खैर फिर उसमें क्या नेता और क्या कार्यकारी अध्यक्ष। इन सबके इतर हत्या का ऐलान करने वालों पर भी सख्त से सख्त कदम उठाने होंगे। ताकि सांप्रदायिकता जैसे अल्फाज को अस्तित्व से खत्म कर सामंजस्य के खुले आसमान में सभी गलबहियां करते हुए कह सकें कि ये है भारत और हमारा धर्म भी हमारा देश है क्योंकि हम सब एक हैं।

      वह भारत जिसमें समाज, सरकार को आगे आकर हिस्सेदारी दिखानी होगी। तब हम, आप और हम सभी इंसानियत को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। जरूरी है, पहल कीजिए। साथ ही भड़काने और उकसाने वालों की बातों से खुद को बचाते हुए, लोगों को समझाते हुए कानून का सहारा लीजिए ताकि फिर कभी मालदा सरीखे हिंसा न हो, पूर्णिया की तर्ज पर दहशत न पसरे।

      लेखक परिचय- हिमांशु तिवारी 'आत्मीय' आर्यावर्त न्यूज के यूपी हेड हैं।

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