Mayawati: क्या मायावती कर पाएंगी जोरदार वापसी?
Mayawati: 2024 के लोकसभा चुनावों में बसपा अकेले लड़ रही है। बीएसपी सुप्रीमो मायावती के इस फैसले को उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का एक महत्वाकांक्षी प्रयोग माना जा रहा है। दलित वोट बैंक पर मायावती के प्रभाव का परीक्षण एक आत्मघाती रणनीतिक कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।
पार्टी की चुनावी चुनौतियाँ और लगातार वोट प्रतिशत में गिरावट के बावजूद बीएसपी का एकला चलो का नारा क्या परिणाम देगा, इसका कुछ भी अंदाजा लगाना संभव नहीं है। बढ़ती राजनीतिक जटिलताओं और गैर-जाटव दलितों के भाजपा के प्रति बढ़ते झुकाव से मायावती कैसे निपटेंगी यह वही बता सकती हैं।

क्या बीएसपी का बचेगा किला
इस बार मायावती या तो बसपा के प्रभाव को फिर से जीवंत कर सकती हैं या फिर सार्वजनिक मंच से गायब हो सकती हैं। यह मूल बहुजन वोट बैंक को बनाए रखने की उनकी क्षमता पर निर्भर करता है। राजनीतिक पंडित यह मान रहे हैं कि बसपा के लगातार पतन के बावजूद मायावती अब भी एक सशक्त राजनीतिक नेता है।
2019 के आम चुनाव में बीएसपी का वोट शेयर यूपी में 19.3 प्रतिशत था। पार्टी ने 2019 में यूपी में आधी से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालांकि बसपा धीरे-धीरे अपने मुख्य वोट आधार और अपनी चमक खो रही है, फिर भी पार्टी को कम नहीं आंका जा सकता। इस बार भी पार्टी को यूपी में 12 से 15 प्रतिशत वोट मिलने के आसार हैं।
जिस तरह से बीएसपी अपने कार्ड इस समय खेल रही है और जाति तथा धार्मिक संयोजन का उपयोग कर रही है, उससे यह आकलन लगाया जा रहा है कि पार्टी एनडीए और इंडिया दोनों गठबंधनों को नुकसान पहुंचा सकती है। सपा के साथ गठबंधन में बसपा ने पिछली बार 10 लोकसभा की सीटें जीती थीं।
पूरे देश में रहा है बसपा का प्रभाव
बसपा की मौजूदगी सिर्फ यूपी तक ही नहीं है, पार्टी राजस्थान, एमपी, बिहार और दिल्ली में भी विधानसभा सीटें जीतती रही है। पार्टी का गुजरात और महाराष्ट्र की कुछ सीटों पर भी प्रभाव रहा है। एमपी के मुरैना, सतना, रीवा आदि में बीएसपी का अच्छा खासा प्रभाव स्थापित हो गया था। इन सभी सीटों पर बीएसपी करीब एक लाख वोट हासिल कर रही थी। राजस्थान में कुछ सीटों पर बसपा लगातार चुनाव जीतती रही है। यूपी में मायावती ने इस बार चुनाव द्वि-ध्रुवीय नहीं बनने दिया है। कई सीटों पर बसपा तीसरे खिलाड़ी के रूप में खेल बदल सकती है। खतरा केवल इंडिया एलायंस को ही नहीं है।
अखिलेश का खेल तो नहीं बिगाड़ेगी मायावती
एनडीए 2019 की तुलना में 2024 में यूपी में ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है। सपा भी बहुत बुरी स्थिति में नहीं है, क्योंकि अखिलेश यादव अपने दम पर 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल कर नंबर 2 के स्थान को पक्का कर सकते हैं। यह सच है कि मायावती अब दलितों की निर्विवाद नेता नहीं रहीं। क्योंकि दलित अब किसी एक नेता के अधीन नहीं रहना चाहते। आज के दलित बेहतर जीवन और बेहतर शिक्षा की आकांक्षा रखते हैं।
मायावती पर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने अपने समुदाय के लिए कुछ खास नहीं किया है। बल्कि उनका शोषण ही किया है। वह 1995, 1997, फिर 2002 से 2003 और 2007 से 2012 तक मुख्यमंत्री रहीं, लेकिन यूपी के दलितों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। हाँ उन्हें भारत की पहली अनुसूचित जाति की महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव जरूर प्राप्त हुआ।
सोना और पत्थर से क्यों रहा प्यार
मायावती का राजनीतिक करियर भी विवादों से भरा रहा है। उनकी व्यक्तिगत संपत्ति को लेकर उनकी खूब आलोचना हुईं। वर्ष 2007-08 में, मायावती ने ₹26 करोड़ का आयकर चुका कर सबको चौका दिया। वह देश के शीर्ष 20 करदाताओं में से एक रहीं। उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। सीबीआई ने उनके खिलाफ आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति का मामला भी दर्ज किया था।
मुख्यमंत्री के रूप में मायावती पर पत्थर की मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण में अरबों रुपये खर्च करने का भी आरोप लगता है। लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर में उन्होंने कबीर, ज्योतिराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, बाबासाहेब अम्बेडकर और काशीराम के साथ खुद की मूर्तियाँ भी लगवाईं।
मायावती आज भी अपनी मजबूत और मुखर नेतृत्व शैली के लिए जानी जाती हैं। खुद एक दलित नेता होने के नाते मायावती को दलित समुदाय अपने सशक्तिकरण के प्रतीक के रूप में देखता है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को कानून व्यवस्था के नजरिए से काफी संतोषजनक मन जाता है।
मायावती ने अपने समय में विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और शैक्षिक पहल पर जोर दिया। मायावती अपने रणनीतिक गठबंधनों और राजनीतिक समीकरणों के पुनर्गठन के लिए जानी जाती हैं। बसपा ने अपने राजनीतिक प्रभाव को अधिकतम करने के लिए अक्सर समाज के अन्य वर्गों को साथ लिया है।
पुराने समीकरण और नया अंदाज
2024 के संसदीय चुनावों के लिए बसपा के टिकट वितरण में मायावती ने मुस्लिम उम्मीदवारों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही मायावती मुस्लिम दलित के वोट के जरिए आम चुनाव में खोई जमीन वापस पाने का फिर यही फार्मूला लगा रही हैं। उन्होंने ऊंची जातियों के भी उम्मीदवार अच्छी संख्या में उतारे हैं।
मायावती उच्च जाति-दलित-मुसलमानों के बीच गठबंधन बनाने के अपने आजमाए सोशल इंजीनियरिंग का ही उपयोग कर रही हैं। बीएसपी नेता यह प्रचार कर रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय को यह समझना चाहिए कि केवल बसपा ही लोकसभा या विधानसभा चुनाव में भाजपा के रथ को रोकने की स्थिति में है।












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