कम्युनिस्ट पार्टियां अपना अस्तित्व बचाने के लिए चुनाव में
Communist Partiyan: 18वीं लोक सभा के गठन के लिए हो रहे चुनाव में वामपंथी दलों का प्रदर्शन उनके भविष्य को निर्धारित करने वाला होगा।
भारतीय लोकशाही में वामपंथ का अस्तित्व खतरे में है और यह सत्ता की राजनीति में हाशिये पर पहुँच चुका है। अब केरल ही एक ऐसा राज्य बचा है जहां वामदलों की सरकार है।

बंगाल से वाम दलों का तंबू बहुत पहले उखड़ चुका है। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, मार्क्सिस्ट (सीपीएम) एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सकी। 2019 के आम चुनाव में सीपीएम केवल 3 लोक सभा सीटें और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) केवल 2 सीटें जीतने में कामयाब रहीं और ये दोनों प्रमुख वाम दल मिलकर केवल 5 सीट जीत पाए। इसलिए विपक्षी इंडिया गठबंधन में शामिल देश के छह राष्ट्रीय दलों में से एक सीपीएम के लिए इस बार का चुनाव बेहद अहम है।
वामपंथी विचारधारा के दिन लदे
वामपंथी विचारधारा कभी देश के नामी विश्वविद्यालयों से लेकर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं में बढ़ चढ़कर दिखती थी। बंगाल, केरल और त्रिपुरा में कई दशकों तक इनकी सरकार रही। केंद्र में संयुक्त मोर्चा और यूपीए1 में भी वामपंथ की भागीदारी रही। कई राज्यों में सत्तारूढ़ दल को वाम मोर्चा बाहर से समर्थन देता रहा है। लेकिन इस समय वामदल महत्वहीन हो चुके हैं। यद्यपि केरल में इनकी सरकार आज भी है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर उस सरकार को पिनराई विजयन की सरकार माना जाता है।
1964 में सीपीआई से अलग होकर ईएमएस नंबुदिरीपाद, ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत ने सीपीएम का गठन किया था। पूंजीवाद और समाजवाद से अलग साम्यवाद की विचारधारा मजदूरों, श्रमिकों, कर्मचारियों की आवाज बन रही थी। पार्टी पूंजीवाद की शोषण वाली सोच के खिलाफ क्रांति का उद्घोष करते हुए गैरबराबरी की व्यवस्था खत्म करने की बात करती थी।
पिटी हुई आर्थिक नीतियां
वामपंथी अभी भी पुरानी मानसिकता में जी रहे हैं। वे कंप्यूटर के उपयोग को बेरोजगारी का कारण बताते रहे हैं। समय बदल गया है, लेकिन कम्युनिस्टों की सोच नहीं बदली है, जिसके कारण पढ़े-लिखे लोग कम्युनिस्ट विचारधारा से अब जुड़ना पसंद नहीं करते। गरीबों और पिछड़ों के बीच भी इनका संपर्क कुछ मजदूरों, किसानों के संगठन तक सिमट गया है। अब त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में भी कम्युनिस्टों का कोई भविष्य नहीं है और केरल में भी कांग्रेस की कमजोरी दूर होने और भाजपा के स्थापित होने तक ही वामदल अपने को सुरक्षित मान सकते हैं।
मुख्यधारा से अलग हुए वामपंथी
1950 के दशक में वामपंथी ही कांग्रेस पार्टी के मुख्य विरोधी थे। वामपंथियों ने 1957 में केरल में अपनी पहली सरकार बनाई। तब से ही वह केरल में कांग्रेस के विरोधी मोर्चे के रूप में सरकार और विपक्ष में अदला-बदली करते रहते हैं। वाम मोर्चा ने 1967 में पश्चिम बंगाल में भी सरकार बना ली थी। तब वह सरकार ज्यादा नहीं चली थी। 1970 के दशक में आख़िरकार उन्होंने पश्चिम बंगाल में सीपीआई-एम की बहुमत वाली सरकार बनाई और लगातार 34 वर्षों तक शासन किया।
1991 में लागू आर्थिक उदारीकरण और सुधार की नीतियों का अंध विरोध वामपंथ को देश की मुख्यधारा की राजनीति से बाहर ले गया। वामपंथी दल आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ एकमात्र दल बन गये। जबकि अन्य दलों ने सार्वजनिक रूप से इसे अपना लिया। कांग्रेस के समर्थन से वामपंथियों को एक बार ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का मौका मिला था, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
बीजेपी के आगे हुए पस्त
वाम मोर्चे को 2004 के लोक सभा चुनाव में अच्छी सफलता मिली थी, तब उन्होंने लगभग 60 सीटें जीती थीं और 2004 में यूपीए सरकार बनवाने में उनकी बड़ी भूमिका थी। लेकिन जब से मोदी विकास और हिंदुत्व के दम पर पूर्ण बहुमत से सरकार में आए तब से वामपंथ के समाजवाद का सिद्धांत लगातार पिट रहा है। त्रिपुरा में 25 साल से टिकी वाम सरकार को बीजेपी ने उखाड़ फेंका। भाजपा के विकास एजेंडे और धुंआधार प्रचार के कारण त्रिपुरा का वाम किला ढह गया। अब वाम मोर्चा सिर्फ केरल में सत्ता में है।
वामपंथ की लोकप्रियता में गिरावट के दो प्रमुख कारण हैं। वामपंथी आज भी इस बारे में वैचारिक रूप से विभाजित नजर आते हैं कि पूंजीवाद को अपनाएं या नहीं। वामपंथी समाज में अमीर और गरीब दो ही जाति मानते हैं और जातिगत राजनीति को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हैं। इससे उत्तरी क्षेत्र में उनका लगभग सफाया हो गया है। जहां जातियों के आधार पर चुनाव होते हैं और उनके सहयोगी इसी को मुख्यधारा की राजनीति मानते हैं।
आर्थिक उदारवाद के इस युग में अब श्रमिक संगठनों के विरोध प्रदर्शन का भी दौर समाप्त हो गया है। जिसके बदौलत वामपंथियों ने 1950 से 70 के दशक तक अपना खूब विस्तार किया था। कांग्रेस के साथ वामपंथी भी लोकलुभावनवाद और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण में विश्वास करते हैं, इस कारण यह बीजेपी के निशाने पर होते हैं।
अब अस्तित्व बचाने की लड़ाई
2019 में अब तक की सबसे कम संख्या हासिल करने के बाद वामपंथी दल इस आम चुनाव में अस्तित्व बचाने की लड़ाई में फंसे हुए हैं। वाम मोर्चा, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के लिए खुद को बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। 2004 के बाद 20 सालों से गिरावट की यह प्रक्रिया लगातार चल रही है।
2009 में सीपीएम को सोलह सीटें मिलीं थीं, तो 2014 में 9 सीटें। 2019 के चुनाव में तो सीपीएम को पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में एक भी सीट नहीं मिली थी। पार्टी ने केरल में सिर्फ एक सीट और तमिलनाडु में दो सीटें जीती थी। पार्टी के लिए इस बार 2024 का चुनाव भी बेहद कठिन है। पश्चिम बंगाल में इस बार ममता बनर्जी ने समझौते में एक भी सीट देने से इंकार कर दिया, तो केरल में भी काँग्रेस से उसका विरोध है। हालांकि वाम दलों को कांग्रेस एवं अन्य दलों के साथ बने इंडिया गठबंधन से मिली कुछ सीटों पर जीत की उम्मीद बनी हुई है।












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