Lala Hardayal: जीनियस लाला हरदयाल थे स्वतंत्रता के दीवानों की प्रेरणा, हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की नींव
अत्यंत प्रतिभाशाली लाला हरदयाल देश की आजादी को लेकर शुरुआत से ही गंभीर थे। ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई के दौरान सन 1907 में उन्होंने ‘इंडियन सोशलिस्ट’ मैगजीन में लिखे एक लेख में अंग्रेजी सरकार पर सवाल उठाये थे।

Lala Hardayal: लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्टूबर 1884 को दिल्ली में हुआ था। उनका पूरा नाम लाला हरदयाल सिंह माथुर था। उनके पिता, गौरीदयाल माथुर थे जोकि जिला अदालत में कार्यरत थे। लाला हरदयाल की शुरूआती पढ़ाई कैम्ब्रिज मिशन स्कूल में हुई और फिर उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से संस्कृत में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से संस्कृत में मास्टर डिग्री भी प्राप्त की। साल 1905 में संस्कृत में उच्च शिक्षा के लिए उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दो छात्रवृत्तियां भी मिली।
लेखनी पर फिदा हो गया था एग्जामिनर
लाला हरदयाल की बुद्धि विलक्षणता और उनकी योग्यता के सम्बन्ध में एक रोचक किस्सा है। दरअसल, एमए के इम्तिहान में उनका लेखन देखकर परीक्षक ने उनकी कॉपी पर नोट लिख दिया था कि "मैं स्वयं ऐसा उत्तम निबंध नहीं लिख सकता, उसे मैं जांचू कैसे?" इस परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के कारण उन्हें सरकारी छात्रवृति मिली, जिसकी सहायता से वह विलायत गए।
'मैं भारत से केवल पढ़ने के लिये आया था, डिग्री लेने नहीं'
नारायण प्रसाद अरोड़ा अपनी किताब 'लाला हरदयाल के स्वाधीन विचार' में एक अन्य किस्से का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में लाला हरदयाल तीन वर्ष तक डट कर पढ़ते रहे। उन्होंने ब्रिटिश-विधान पर लगभग 200 ग्रंथ पढ़े थे। जब वह वहां विश्वविद्यालय में काफी अध्ययन कर चुके थे, तब उन्होंने सरकारी छात्रवृत्ति स्वयं ही छोड़ दी थी और परीक्षा देने से इसलिए इंकार कर दिया कि उन्हें कोई डिग्री नहीं चाहिये। उनके कॉलेज के प्रिन्सिपल ने उनसे कहा कि मिस्टर दयाल, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया से तुम्हारा झगड़ा है, तो तुम उनकी छात्रवृत्ति मत लो। मैं एक छात्रवृत्ति अपने पास से तुम्हें दूंगा। अगर तुम हमारे कालेज से परीक्षा दोगे।
परन्तु हरदयाल ने उनकी बात स्वीकार नहीं की और कहा कि मुझे जो पढ़ना था वह मैं पढ़ चुका हूं। मैं भारत से केवल पढ़ने के लिये आया था, डिग्री लेने नहीं। भारत में पढ़ने के ऐसे साधन नहीं थे अतः मुझे आना पड़ा। मैं इम्तिहान के लिये क्षमा चाहता हूं।
हरदयाल सचमुच डिग्रियों से चिढ़ते थे। जब कोई उनके नाम के साथ एमए लिख देता था तब वह उसको लिख भेजते थे कि "भाई मैंने एक बार पाप किया है, अब आप हमेशा मुझे गाली क्यों लिखते हैं?" दरअसल, वो डिग्री को एक गाली समझते थे।
कई जगह छपे लाला हरदयाल के लेख
सन 1908 में उनके लेख पंजाब के उर्दू समाचार पत्रों में प्रायः निकलते थे। उनमें से अधिकतर पंजाब के प्रसिद्ध शायर और क्रान्तिकारी लाला लालचन्द फलक ने अपनी 'वन्देमातरम् बुक एजेन्सी' से छापे थे। उनके कुछ उर्दू के लेख कानपुर के "कृष्ण" में छपे थे। अंग्रेजी में उनके लेख रामानन्द चटर्जी के मासिक पत्र 'मार्डन रिव्यू' में अधिकतर प्रकाशित होते थे। लाला हरदयाल के कुछ लेख 'वैदिक मैगजीन' और लाला लाजपत राय के पीपल (People) नामक साप्ताहिक पत्र में छपते थे।
अंग्रेजों की शिक्षा नीति पर उठाए सवाल
लाला हरदयाल ने हिन्दुस्तान में राष्ट्रीय शिक्षा पर अनेक लेख लिखे थे। ये लेख एजुकेशन नाम से एक पुस्तक में छपे। 'अमृत में विष' के नाम से इसका हिन्दी अनुवाद भी हुआ। जब ये लेख सबसे पहले लाहौर के 'पंजाबी' नामक अंग्रेजी के पत्र में प्रकाशित हुए, तो देश में एक तहलका सा मच गया। इन लेखों में अंग्रेजों द्वारा प्रचारित शिक्षा प्रणाली की धज्जियां उखाड़ कर अंग्रेजी राज्य की पोल खोली गई थी।
इससे पहले कि ब्रिटिश सरकार हरदयाल के विरुद्ध कार्यवाही करती, लाला लाजपतराय ने हरदयाल को विदेश भेज दिया। तब से तीस वर्ष तक लाला हरदयाल स्वदेश नहीं लौट पाए और निर्वासित होकर ही जीवन जिया। विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों को भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की प्रेरणा देने में लाला हरदयाल सबसे आगे रहते थे।
उनकी बौद्धिक प्रतिभा और कुशल लेखन से हजारों देशभक्त प्रेरित हुए और स्वतंत्रता हेतु संघर्ष का आधार खड़ा हुआ। अमरीका में उन्होंने प्रवासी भारतीयों को साथ लेकर गदर पार्टी का गठन भी किया था। अमेरिका से निकलने वाले 'गदर और तलवार' नामक पत्रों के वे सूत्रधार भी बने। ब्रिटिश सरकार के दवाब में जब अमरीकी प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास किया तो वे जर्मनी चले गए।
मानव सेवा को सदैव तत्पर
नारायण प्रसाद अरोड़ा ने लिखा कि लाला हरदयाल को केवल देशभक्त समझना भूल होगी। वह तो मानव-समाज के भक्त थे। संसार के पीड़ितों के परम मित्र थे और उन्हें मानव की भलाई का ध्यान रहता था। एक दिन कहने लगे कि भाई, अगर हिन्दुस्तान में स्वराज्य होता तो मैं इंग्लैंड से भारत आने के बजाय रूस जाता और वहां के निवासियों की सेवा करता। वहां के लोग बड़े दुखी हैं। यह बात सन 1908 की थी। उनके जिस वाक्य ने मेरे जीवन का पथ-प्रदर्शन किया वह थे, 'I Love not life, I love not pleasures, I obey only my conscience'. सन 1935 की 4 मार्च को अमेरिका में भारत के सपूत लाला हरदयाल की मृत्यु अचानक हृदय की गति रुक जाने से हो गई। मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र 54 वर्ष थी।
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