Jamsetji Tata: जमशेदजी ने 21,000 रूपये से शुरू की थी टाटा कंपनी, अब सालाना कमाई 10 लाख करोड़ रुपये
जमशेदजी टाटा ने 1870 के दशक में मध्य भारत में एक कपड़ा मिल से शुरुआत की थी। उन्होंने भारत में इस्पात और बिजली उद्योगों को प्रेरित किया।

Jamsetji Tata: जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा का जन्म 3 मार्च 1839 में दक्षिणी गुजरात के नवसारी में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता नुसीरवानजी और मां का नाम जीवनबाई टाटा था। अपने पूरे खानदान में खुद का व्यवसाय शुरू करने वाले जमशेदजी पहले व्यक्ति थे।
जमशेदजी टाटा जब 17 साल के थे तब उन्होंने मुंबई के एलफिंसटन कॉलेज में दाखिला ले लिया और दो साल बाद सन 1858 में स्नातक स्तर की डिग्री प्राप्त की। इनका विवाह हीराबाई दबू के साथ हुआ। भारतीय उद्योग जगत के भीष्म पितामह कहे जाने वाले जमशेदजी टाटा ने अपने जीवनकाल में भारत को नई पहचान देने को लेकर कई काम किए।
कैसे हुई व्यापार की शुरुआत
जमशेदजी टाटा ने सिर्फ 21,000 रुपये के निवेश से ट्रेडिंग कंपनी शुरू की थी। लेकिन जल्द ही जमशेदजी टाटा इंग्लैंड चले गए और वहां से कपड़े का व्यापार सीख कर वापस भारत आए। 1869 में ही जमशेदजी टाटा ने कपड़े के व्यापार में हाथ आजमाया। उन्होंने उस समय बंबई में एक दिवालिया हो चुकी तेल मिल को खरीदा और वहां अपना काम करना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने उसे बेच दिया। जमशेदजी टाटा ने 1873 में एक शिपिंग कंपनी भी शुरू की थी। जापान की एक कंपनी के साथ उन्होंने इसके लिए टाटा लाइन (Tata Line) नाम से शुरुआत की। पर ये कारोबार लंबे समय तक नहीं चल सका। टाटा की वेबसाइट के मुताबिक टाटा ग्रुप ने ही देश को पहली बड़ी स्टील कंपनी, पहला लग्जरी होटल, पहली देसी कंज्यूमर गुड्स कंपनी दी थी।
कपड़ा मिल से किया पहला निवेश
टाटा की आधिकारिक वेबसाइट tata.com के अनुसार टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा ने 1870 के दशक में मध्य भारत में एक कपड़ा मिल से शुरुआत की थी। उन्होंने भारत में इस्पात और बिजली उद्योगों को प्रेरित किया। तकनीकी शिक्षा की नींव रखी और देश को औद्योगिक राष्ट्रों की श्रेणी में छलांग लगाने में मदद की।
जमशेदजी एक अग्रणी उद्योगपति और दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिनके पास साहसिक उद्यमी और कौशल की भावना थी। उनमें राष्ट्रवाद का अटूट विश्वास था कि उनकी व्यावसायिक सफलता का फल उस देश को समृद्ध करेगा जिसकी वह गहराई से परवाह करते हैं। ये विशेषताएं, अपने आप में उन्हें एक असाधारण व्यक्ति के रूप में चिन्हित करने के लिए पर्याप्त हैं।
ऐसे आया इस्पात उद्योग बनाने का विचार
जमशेदजी के अंदर लोहे और इस्पात का विचार तब आया जब अपनी कपड़ा मिल के लिए नई मशीनरी की जांच हेतु वे मैनचेस्टर की यात्रा पर थे। 1880 के दशक की शुरुआत में उन्होंने एक स्टील प्लांट बनाने को लेकर सबकुछ दांव पर लगा दिया था। यह एक बहुत बड़ा कार्य था। क्योंकि जिस औद्योगिक क्रांति ने ब्रिटेन और अन्य देशों को बदल दिया था, उसने कुल मिलाकर भारत को दरकिनार कर दिया था। जमशेदजी ने पाया कि हर दूसरे मोड़ पर उनका रास्ता अवरुद्ध हो रहा है। इस्पात परियोजना में कष्टप्रद कदम एक आदमी को पराजित कर सकते थे, लेकिन जमशेदजी इस उद्यम को फलीभूत होते देखने के अपने दृढ़ संकल्प पर अडिग रहे। उस समय उन्हें ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के चीफ कमिश्नर सर फ्रेडरिक अपकोट जैसे लोगों के तिरस्कार का सामना भी करना पड़ा था।
स्वामी विवेकानंद ने की थी तारीफ
जमशेदजी ने जिन प्रयासों की योजना बनाई और उन्हें क्रियान्वित किया, वे बड़े विचार का एक हिस्सा थे। वह भविष्य के कितने महान व्यक्ति थे, इसका अंदाजा उनके विचारों से लगाया जा सकता है। जमशेदजी ने अपने लोगों को काम के कम घंटे, अच्छी तरह हवादार कार्यस्थल और भविष्य निधि और ग्रेच्युटी की पेशकश की थी। उन्होंने 1902 में दोराब टाटा को लिखे एक पत्र में स्टील प्लांट में कामगारों के लिए एक टाउनशिप बनाने को भी लिखा था।
भारतीय विज्ञान संस्थान की स्थापना के लिए जमशेदजी ने अपनी व्यक्तिगत पूंजी से 30 लाख रुपये देने का संकल्प लिया और उसका खाका तैयार किया। इसे वास्तविकता में बदलने के लिए वायसराय लॉर्ड कर्जन से लेकर स्वामी विवेकानंद तक सभी का समर्थन मांगा। स्वामी विवेकानंद ने जमशेदजी टाटा के समर्थन में 1899 में लिखा था, "मुझे नहीं पता कि कोई भी परियोजना एक बार में इतनी उपयुक्त और अपने लाभकारी प्रभावों में पहुंचती है। इसी तरह के समर्थन से लगभग 12 साल के बाद 1911 में बैंगलोर में शानदार भारतीय विज्ञान संस्थान शुरू हुआ।
ताज होटल बनाने का संकल्प
जमशेदजी टाटा ने ताज महल होटल की नींव इसलिए रखी थी क्योंकि एक बार उन्हें सबसे भव्य होटलों में प्रवेश से मना कर दिया गया था। यह ब्रिटिश राज के दौरान की बात है। उन्हें यह कहा गया था कि यहां केवल ब्रिटिश ही आ सकते हैं। बस इसके बाद ही उन्होंने लग्जरी होटल ताज महल की नींव रखी। 16 दिसंबर 1903 को यह होटल आम लोगों के लिए खोला गया था।
जब वह ताज होटल का निर्माण करवा रहे थे तो उनकी बहन ने उनसे पूछा था कि, "क्या तुम सच में भतरखाना (खाना घर या होटल) बनवाने जा रहे हो?" ताज उससे कुछ अधिक ही निकला। 1903 में इसके पूरा होने तक इसकी लागत 4.21 करोड़ रुपये हो चुकी थी। लक्ज़री से भरपूर यह बंबई में बिजली का उपयोग करने वाली पहली इमारत थी और देश का पहला होटल था जिसमें अमेरिकी पंखे, जर्मन लिफ्ट, तुर्की स्नानघर, अंग्रेजी बटलर थे। 1904 में जर्मनी में उनकी मृत्यु तक उनका दिमाग लगातार नए ज्ञान की तलाश में था। जमशेदजी टाटा ने जो संपत्ति बनाई उसका अधिकांश इस्तेमाल उन्होंने भारत को समृद्ध बनाने के लिए किया।
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