Medical Education: आखिर क्यों इतनी महंगी है मेडिकल की पढ़ाई
Medical Education: 2024 की राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा "नीट" (एनईईटी) की तारीख जारी हो चुकी है। हर वर्ष की भांति इस बार भी लाखों छात्र छात्राएं मेडिकल कैरियर के सपने के साथ नीट के एक्जाम में बैठेंगे, पर अफसोस कि लाखों युवा मेडिकल की महंगी पढ़ाई के कारण मायूस भी होंगे।
क्योंकि सरकारी कॉलेजों में सीमित सीटों के लिए बहुत कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है और सभी के लिए लाखों खर्च कर निजी मेडिकल कालेज में पढ़ना संभव नहीं है।

मेडिकल की सीटें बढ़ी, पर अभी भी भारी कमी
भारत में इस समय एमबीबीएस के लिए लगभग 1 लाख से अधिक सीटें हैं। इसके अलावा बीडीएस के लिए 28,088, आयुष के लिए 52,720 सीटें, बीवीएससी और एएच पाठ्यक्रमों के लिए 525 सीटें हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या जहां 2010-11 में 335 थीं, वे बढ़कर 2022-23 में 612 हो गईं। इसी अवधि में एमबीबीएस सीटों की संख्या 40,775 से बढ़कर 92,127 हो गई है।
नीट परीक्षा के कुल 720 अंक हैं। जीवविज्ञान से 360 अंक, भौतिकी के लिए 180 अंक और रसायन विज्ञान के लिए 180 अंक हैं। 560 या उससे अधिक नंबर लाने वाले को ही अच्छे सरकारी मेडिकल कालेज में प्रवेश मिल पाता है, बाकी के लिए रह जाते हैं निजी मेडिकल कॉलेज, जो अब साढ़े चार साल की पढ़ाई के लिए एक करोड़ से अधिक का शुल्क लेते हैं। सीटों में कुल वृद्धि के बावजूद, क्वालीफाई करने वाले छात्रों के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद रहता है। अर्हता प्राप्त करने वालों में से लगभग 15 प्रतिशत ही फ्री सीट सुरक्षित कर पाते हैं।
प्रति लाख आबादी पर सबसे कम डॉक्टर भारत में
सेंटर फॉर सोशल एण्ड इकनॉमिक प्रोग्रेस (सीएसईपी) के अध्ययन के अनुसार हालांकि हाल के कुछ वर्षों में मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या में वृद्धि हुई है, फिर भी मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। यह भी सच्चाई है कि दुनिया में सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज भारत में ही हैं। लेकिन प्रति 100,000 जनसंख्या पर मेडिकल स्नातकों की संख्या 4.1 है, जो दुनिया में सबसे कम है। फिर सीट क्षमता का अधिकांश विस्तार केवल कुछ ही राज्यों में हुआ है। दक्षिण के राज्य इस मामले में बहुत आगे हैं।
क्यों महंगी है मेडिकल शिक्षा
भारत में मेडिकल कॉलेज स्थापित करना और उसे चलाना भारी खर्चीला काम है। मौजूदा छात्र प्रवेश मानदंडों के अनुसार मेडिकल कॉलेज को भौतिक बुनियादी ढांचे पर बहुत खर्च करना पड़ता है। फिर भारत में मेडिकल शिक्षा के लिए योग्य प्रोफेसरों और विशेषज्ञों की भी कमी है। यह भी मेडिकल कॉलेजें के लिए एक गंभीर समस्या है।
भारत में मेडिकल शिक्षा महंगी होने का सबसे बड़ा कारण मांग और आपूर्ति में भारी अंतर होना है। यह सामान्य सिद्धांत है कि जिस चीज की मांग बढ़ती है तो उसकी कीमत भी बढ़ जाती है। हमारे यहाँ निश्चित रूप से चिकित्सा शिक्षा की मांग अधिक है। 2023 की नीट परीक्षा में लगभग 20 लाख अभ्यर्थी बैठे थे, स्पष्ट है कि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए आवेदकों और स्वीकृत उम्मीदवारों का अनुपात 20:1 है। प्रतिस्पर्धा के इस स्तर के कारण ही निजी मेडिकल कॉलेज की फीस बढ़ती जा रही है।
मेडिकल कॉलेजों को प्रत्येक वर्ष एक सीमित संख्या में ही छात्रों को प्रवेश देने की अनुमति है, इसलिए सीटों की बोली लग जाती है। कॉलेज के स्थान और प्रतिष्ठा के आधार पर एमबीबीएस सीट की कीमत लगभग 80 लाख से 1.5 करोड़ रुपये है।
मेडिकल कॉलेज में दाखिल लेने वाले अधिकतर युवा डॉक्टर बनने से पहले कर्जदार बन जाते है, क्योंकि 80 प्रतिशत मेडिकल छात्र महंगी पढ़ाई के लिए बैंक से ऋण लेते हैं और फिर वर्षों तक उसे चुकाते रहते हैं। महंगी होने के बावजूद मेडिकल करियर के प्रति आकर्षण काफी अधिक है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अभी भी अन्य किसी पेशा या व्यवसाय की तुलना में डॉक्टर की कमाई बेहतर मानी जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञ अपने करियर में लाखों-करोड़ों कमाने की उम्मीद कर सकते हैं।
शिक्षा का व्यवसायीकरण भी जिम्मेदार
बुनियादी ढांचे की लागत के अलावा, मेडिकल कॉलेज और अनुसंधान सुविधा स्थापित करने में भी कुछ सौ करोड़ रुपये का खर्च आता है। शहर से दूर के कॉलेजों में वेतन का खर्च भी दो गुना हो जाता है। यह भी सच है कि शिक्षा आज एक व्यवसाय है। अधिकतर शिक्षण संस्थान या तो बड़े कॉरपोरेट्स द्वारा चलाए जा रहे हैं या फिर राजनीतिज्ञों द्वारा। वे भारी पूंजी लगाते हैं और बदले में निवेश पर हाई रिटर्न की उम्मीद करते हैं और इसे छात्रों से वसूल किया जाता है।
कुल मिलकर भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉस्ट, रेगुलेटरी सिस्टम और आकर्षक करियर के वादे जैसे कारक चिकित्सा शिक्षा को महंगा बनाते हैं। इन लागतों को कम करने के प्रयासों में सरकारी फंडिंग, अन्य वित्तीय सहायता कार्यक्रमों और चिकित्सा शिक्षा प्रणालियों में सुधारों की आवश्यकता है।












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