Rishi Panchami: ऋषि पंचमी पर जानिए हमारे सप्त ऋषियों के बारे में
भारत में वैदिक संस्कृति का परचम पौराणिक काल से चला आ रहा है। यहां के ऋषि-मुनियों ने विश्व में अपनी विद्वत्ता को समय-समय पर न केवल साबित किया है बल्कि देश और समाज का मार्गदर्शन भी किया है। वेद और पुराणों में ऐसे अनेक उदाहरणों का उल्लेख है। इनमें प्रमुख रूप से सप्त ऋषियों के पूर्ण विधान से पूजन करने का अपना अलग विधान है।
पुराणों में उल्लेखित सप्त ऋषियों में से किसी ने सौ सूक्त की रचना की तो किसी ने नया स्वर्ग ही बना दिया। ऋषि पंचमी पर विशेषकर महिलाएं तर्पण कर इन्हीं ऋषियों को न केवल श्रद्धांजलि अर्पित करती है वरन जाने अनजाने में हुए पाप से मुक्ति की कामना भी करती हैं। आईए जानते हैं कौन थे ऐसे सप्त ऋषि, जिनकी पूजा कर महिलाएं खुद को पाप दोष से मुक्त करती हैं।

मत्स्य अवतार की कथा में है सप्तऋषियों का वर्णन
भगवान विष्णु के दस अवतार हैं। इनमें पहला अवतार था मत्स्य। जब विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया, उस समय धरती पर जल प्रलय आया था। मत्स्य अवतार के रूप में विष्णु ने राजा मनु और सप्तऋषियों को एक नाव में बैठाकर उनकी रक्षा की थी। इन सप्तऋषियों में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ शामिल हैं। इनके नामों के जप से जानी-अनजानी गलतियों का दोष दूर होता है। विष्णु पुराण के अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि- वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत। विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।। अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज हैं ।
ऋषि कश्यप- इनकी अदिति नाम की पत्नी से सभी देवता और दिति नाम की पत्नी से दैत्यों का जन्म हुआ था। कद्रु से नाग और विनता से गरुड़देव का जन्म हुआ था। इनकी अन्य पत्नियों से भी अलग-अलग जीवों की उत्पत्ति (जन्म) हुई थी।
ऋषि अत्रि - रामायण के मुताबिक श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनवास के समय अत्रि ऋषि के आ़़श्रम गए थे। अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूइया थीं। ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे।
ऋषि भारद्वाज - भारद्वाज ने आयुर्वेद ग्रंथ की रचना की थी। द्वापर युग में इनके पुत्र के रूप में द्रोणाचार्य का जन्म हुआ। वैदिक ऋषियों में भारद्वाज ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे। माना जाता है कि भारद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी। ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे।
ऋषि विश्वामित्र- ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। हार के बाद उन्होने घोर तपस्या की। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा सभी जानते है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। लेकिन स्वर्ग में उन्हें जगह नहीं मिली तो विश्वामित्र ने एक नए स्वर्ग की रचना कर डाली थी। माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज है, उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की।
ऋषि वशिष्ठ - रामायण के मुताबिक श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को प्रारंभिक शिक्षा वशिष्ठ मुनि ने ही दी थी। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।
ऋषि जमदग्नि - भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि के ही पुत्र थे। इनके आश्रम में इच्छित फलों को प्रदान करनी वाली गाय थी, जिसे कार्तवीर्य छीनकर अपने साथ ले गया था। परशुराम को जब इस बात का पता चला तो वह कार्तवीर्य को मारकर कामधेनु गाय वापिस आश्रम लेकर आए।
ऋषि गौतम - गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या थीं। इनके श्राप के कारण ही अहिल्या पत्थर बन गई थी। भगवान श्रीराम की कृपा से अहिल्या ने पुन: अपना रूप प्राप्त किया था। गौतम ऋषि अपने तपबल पर ब्रह्मगिरी के पर्वत पर मां गंगा को लेकर आए थे।
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