Karnataka CM: कर्नाटक में पांच बार लगा राष्ट्रपति शासन, सिर्फ दो मुख्यमंत्री ही पूरा कर सके अपना कार्यकाल
कर्नाटक राजनैतिक रूप से अस्थिर रहा है। साल 1973 में मैसूर राज्य का नाम कर्नाटक पड़ने के बाद से अब तक केवल दो कांग्रेसी मुख्यमंत्री देवराज उर्स और सिद्धारमैया ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है।

कर्नाटक के नये मुख्यमंत्री की घोषणा हो चुकी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है। जबकि कर्नाटक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा। पिछले पांच दिनों से कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच होड़ लगी हुई थी।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद के लिए ढ़ाई-ढ़ाई साल का फॉर्मूला तय किया है, जिसके तहत पहले ढ़ाई साल के लिए सिद्धारमैया और बाद में डी.के. शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। हालांकि, शिवकुमार अभी मुख्यमंत्री बनने के लिए काफी लॉबिंग भी कर रहे थे। लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया पर ही भरोसा जताया है।
गौरतलब है कि शिवकुमार मनी लॉन्ड्रिंग और आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच एजेंसियों के घेरे में हैं। यहां तक कि वह एक बार जेल की हवा भी खा चुके हैं। कांग्रेस को डर है कि डी.के. शिवकुमार अगर मुख्यमंत्री बनते हैं और जांच एजेंसियां उनको अपने शिकंजे में लेंगी, तो राज्य में अस्थिरता की संभावना बढ़ जाएगी। वैसे भी कर्नाटक के 50 सालों के इतिहास में सिर्फ दो मुख्यमंत्रियों ने अपने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया है।
कर्नाटक का राजनीतिक इतिहास
नवंबर 1956 में राज्य के रूप में पहली बार कर्नाटक का अस्तित्व आया। हालांकि, तब इसे मैसूर के नाम से पहचाना जाता था। साल 1973 में मैसूर का नाम बदलकर कर्नाटक किया गया। जिसका अर्थ 'काली मिट्टी की ऊंची भूमि' होता है। राज्य की विधानसभा में सीटों की बात करें, तो 1956 में विधानसभा सीटों की संख्या 208 थी, जिन्हें 1967 में बढ़ाकर 216 कर दिया गया। फिर 1978 में विधानसभा सीटों में वृद्धि की गयी और कुल संख्या 224 हो गयी। फिलहाल कर्नाटक में 31 जिले हैं।
सिर्फ दो मुख्यमंत्री ही पूरे कर पाए अपने कार्यकाल
साल 1972 से अबतक कर्नाटक में अलग-अलग दलों के कुल 17 मुख्यमंत्री बने हैं। इनमें से सिर्फ दो मुख्यमंत्रियों ने पांच वर्षों का अपना कार्यकाल पूरा किया है। जब मैसूर का नाम बदलकर कर्नाटक किया गया, तो उस समय राज्य के मुख्यमंत्री देवराज उर्स थे। वह (1972-1977) पांच वर्षों से भी ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद, सिद्धारमैया ही ऐसे मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने अपना कार्यकाल (2013-2018) पूरा किया। हालांकि, जनता पार्टी के रामकृष्ण हेगड़े भी लगातार पांच साल तक पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे, लेकिन दो चरणों में।
दरअसल, भारतीय जनता पार्टी सहित कई अन्य छोटी पार्टियों के समर्थन से रामकृष्ण हेगड़े 10 जनवरी 1983 को मुख्यमंत्री बने। फिर 1984 के लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी के खराब प्रदर्शन के चलते हेगड़े ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 1985 में हुए विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को अपने दम पर राज्य में बहुमत मिला और हेगड़े फिर से मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद, हेगड़े को फोन टैपिंग के आरोप में 10 अगस्त 1988 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके अतिरिक्त, भाजपा नेता बी.एस. येदियुरप्पा चार बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन एक बार भी वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
पांच सालों में तीन मुख्यमंत्री
साल 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। तब उसे कुल 104 सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। उस समय भाजपा के दिग्गज नेता बी.एस. येदियुरप्पा ने सरकार तो बना ली, लेकिन वह बहुमत जुटा पाने में विफल रहे और विधानसभा में विश्वास मत पर वोटिंग से पहले ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद, कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई और एच.डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने। 14 महीनों तक सरकार चलाने के बाद कुमारस्वामी की सरकार विधानसभा में विश्वास मत हासिल नहीं कर पाई और 23 जुलाई 2019 को उनकी सरकार गिर गयी। यह परिस्थिति इसलिए बनी, क्योंकि कुमारस्वामी सरकार को समर्थन देने वाले कई विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था।
इसके बाद खाली हुई 15 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। उनमें 12 सीटों पर भाजपा को जीत मिली और पार्टी को विधानसभा में बहुमत हासिल हो गया। एकबार फिर बी.एस. येदियुरप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। लेकिन दो वर्ष पूरा करने के बाद 26 जुलाई 2021 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और बसवराज बोम्मई मुख्यमंत्री बने।
पांच बार लग चुका है राष्ट्रपति शासन
कर्नाटक में साल 1973 से अबतक पांच बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। 31 दिसंबर 1977 को केंद्र में सत्तारूढ़ मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार ने कर्नाटक की देवराज उर्स की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया, जो 28 फरवरी 1978 तक चला।
इसके बाद 21 अप्रैल 1989 को केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कर्नाटक में सत्तारूढ़ जनता पार्टी की एस.आर. बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया, जो 30 नवंबर 1989 तक चला। फिर राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई। इस चुनावों में कांग्रेस पार्टी को जबरदस्त बहुमत मिला और वीरेंद्र पाटिल मुख्यमंत्री बने। मगर पार्टी में अंदरूनी कलह के चलते वीरेंद्र पाटिल को एक साल के भीतर ही 10 अक्टूबर 1990 को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया, जो 17 अक्टूबर 1990 तक चला।
साल 2006 में भाजपा-जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी और एच.डी. कुमारस्वामी राज्य के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार भी ज्यादा समय तक नहीं चल पाई और केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने 8 अक्टूबर 2007 को राष्ट्रपति शासन लगा दिया, जो 12 नवंबर 2007 तक चला। इसके बाद, भाजपा के बी.एस. येदियुरप्पा पहली बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने और उनकी सरकार भी विधानसभा में बहुमत प्राप्त नहीं कर पाई और सात दिनों के भीतर ही 19 नवंबर 2007 को येदियुरप्पा की सरकार गिर गई और राज्य में एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, जो 29 मई 2008 तक चला।
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