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Judicial Appointments: कैसे सुलझेगा जजों की नियुक्ति का विवाद

Judicial Appointments: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केंद्र सरकार को जजों की नियुक्ति में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। जस्टिस संजय किशन कौल एवं सुधांशु धूलिया की बेंच ने 26 सितंबर को केंद्र से नाराजगी जताते हुए कहा कि पिछले दस महीने से विभिन्न हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की सिफारिश पड़ी है, पर सरकार न जाने क्यों उस पर बैठी हुई है, इससे तो देश के बेहतरीन कानूनी दिमाग रखने वाले लोग निराश हो जाएंगे।

जस्टिस कौल ने कहा कि कई उज्जवल भविष्य वाले अधिवक्ता अपनी प्रैक्टिस छोड़कर ज्यूडिशयरी से जुड़ने को तैयार हुए हैं, लेकिन सरकार न जाने किस कारण से एक पोस्ट पर कई और नाम के विकल्प पर विचार करने में लगी है। उन्होंने कहा कि अच्छे कानूनी प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता अब वैसे ही ज्यूडिशयरी में आने से इंकार कर रहे हैं। देरी के कारण कुछ अधिवक्ताओं ने अपने नाम वापस भी ले लिए हैं। जस्टिस कौल ने एटर्नी जनरल आर वेंकटरमानी को दो हफ्ते में सरकार से पूछ कर जवाब देने के लिए कहा है। एडवोकेट एसोसिएशन बेंगलुरू ने इस संबंध में याचिका दायर की थी।

Judicial Appointments: How will the dispute over appointment of judges be resolved?

उल्लेखनीय है कि हाई कोर्ट कॉलेजियम ने नवंबर 2022 में ही हाई कोर्ट में नियुक्ति के लिए 70 लोगों के नाम केंद्र सरकार को भेजे थे, परंतु 10 माह के बाद भी इन नामों पर सहमति केंद्र सरकार की ओर से नहीं आई है। यानी देश के विभिन्न हाई कोर्ट में 70 जजों की जगह खाली है। प्रकिया के अनुसार हाई कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों पर अंतिम मुहर केंद्र सरकार लगाकर सुप्रीम कोर्ट को भेजती है और फिर सुप्रीम कोर्ट उन जजों की नियुक्ति करता है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इस मामले में चार या पांच महीने से ज्यादा नहीं लगना चाहिए। लेकिन 10 माह बाद भी सरकार ने अभी तक इस मामले में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को नहीं भेजी है।

दरअसल सरकार और कोर्ट कॉलेजियम के बीच अधिकारों को लेकर हमेशा से विवाद रहा है। आजादी के तुरंत बाद ही अधिकारों की यह लड़ाई शुरू हो गई थी। 2018 में कानून मंत्री रहे अरूण जेटली ने यह दावा किया था कि आजादी के बाद फेडरल कोर्ट (जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट नाम दिया गया था) के पहले चीफ जस्टिस एच जे कानिया और पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच भी अधिकारों के लेकर विवाद हुआ था। जस्टिस कानिया ने विभिन्न हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से की थी, लेकिन नेहरू को जस्टिस कानिया के चीफ जस्टिस होने पर ही एतराज था। बाद में इस मामले में सरदार पटेल ने हस्तक्षेप किया तब जाकर यह सुलझ सका।

एक नहीं कई मामले हैं, जहां कॉलेजियम की पंसद के बनाए गए जज पर भी सवाल उठता है। पिछले साल मद्रास हाईकोर्ट में एडिशनल जज के पद पर नियुक्त की गई लक्ष्मणा चंद्रा विक्टोरिया गौरी को लेकर भी विवाद हुआ। उनकी नियुक्ति के खिलाफ अपील दायर करने वाले अधिवक्ताओं का कहना था कि लक्ष्मणा गौरी हेट स्पीच की दोषी हैं और उन्हें बीजेपी की नजदीकी होने के कारण जज बनाया गया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को सुनने से इंकार कर दिया।

सरकार किसी की भी हो यह आरोप हमेशा लगता है कि केंद्र जजों की नियुक्ति में हस्तक्षेप चाहता है। इसे लेकर कई बार कॉलेजियम सिस्टम पर ही बहस हो चुकी है। खबर तो यहां तक आई थी कि पूर्व कानून मंत्री किरण रिजीजू ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा था कि जजों की नियुक्ति के लिए सर्च कम इवैल्यूएशन कमेटी में सरकार के प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाए। हालांकि इस खबर की कोई तस्दीक नहीं की गई, लेकिन इसको आधार बनाकर विभिन्न खेमों ने यह बहस छेड़ दी कि सरकार आखिर क्यों जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को अपने हिसाब से चलाना चाहती है।

इसके पहले 2015 में भी कॉलेजियम में केंद्र के प्रतिनिधि को शामिल किए जाने के प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट की कंस्टीटयूशनल बेंच ने खारिज कर दिया था। बाद मे किरन रिजीजू ने लोक सभा में यह बयान दिया था कि केंद्र बंद आंखों से सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नामों पर सहमति नहीं जता सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम ही सबसे उपयुक्त है और इसमें कोई खराबी नहीं है।

कुछ ही दिन पहले चीफ जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि कॉलेजियम की सिफारिश पर 72 घंटे के अंदर दो जजों की नियुक्ति यह बताती है कि कॉलेजियम पूरी तरह जाग्रत, सक्रिय और अपने लक्ष्यों के अनुसार काम कर रहा है। स्पष्ट है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच अधिकारों को लेकर कोई सीधा टकराव नहीं है, हां एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश का जब भी प्रयास होता है तो थोड़ी कसमसाहट जरूर होती है।

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