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Dheenga Gavar: 500 सालों से महिला सशक्तिकरण का अनूठा संदेश देता है जोधपुर का धींगा गवर मेला

देश-विदेश में प्रसिद्ध है 500 वर्ष पश्चिमी राजस्थान का पुराना धींगा गवर मेला। विधवा महिलाएं भी करती हैं धींगा गवर का पूजन। रात 12 बजे से प्रातः 4 बजे तक चलती है महिलाओं की धींगा मस्ती।

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Dheenga Gavar: भारत में मेलों और त्यौहारों का विशेष महत्व रहा है। इन त्यौहारों ने भारतीय संस्कृति को जीवित रखने में बड़ा योगदान दिया है। इसी कड़ी में राजस्थान के जोधपुर शहर का धींगा गवर मेला है जोकि नारी स्वातन्त्र्य का प्रतीक है। राजस्थान के गणगौर के मेले के एक पखवाड़े बाद जोधपुर शहर के भीतरी इलाकों में धींगा गवर का महोत्सव होता है।

देश-विदेश में प्रसिद्ध है धींगा गवर मेला

राजस्थान का जोधपुर शहर अपनी मेहमाननवाजी और स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही यहां का प्रसिद्ध सांस्कृतिक धींगा गवर मेला देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन जोधपुर शहर में मनाया जाने वाला यह त्यौहार धींगा गवर या बेंतमार गणगौर के नाम से जाना जाता है।

यह त्यौहार महिला शक्ति एवं अनुशासन का प्रतीक है और यह त्यौहार सिर्फ स्त्रियों द्वारा ही मनाया जाता है। धींगा का अर्थ मस्ती है। यह त्यौहार रात भर चलता है। जिसमें महिलायें गवरजी की प्रतिमा की पूजा करती हैं और साथ में रात भर अलग-अलग वेषभूषा धारण कर मस्ती करती है।

विश्व का सबसे अनूठा पर्व धींगा गवर मेला जोधपुर की विरासत रहा है। जोधपुर में गणगौर 18 दिन तक उत्साह से मनाए जाने की परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि गवर बिठाने की परम्परा की शुरूआत जोधपुर के भीतरी इलाके हड्डियों के चौक से हुई। 1970 के दशक से पहले गवर माता को धींगा गवर के दिन बिठाने की परम्परा आज भी जारी है।

बताया जाता है कि 70 के दशक में एक चौक में खुदाई के दौरान गवर माता की प्रतिमा अवतरित हुई थी। इस दौरान मोहल्ले के युवाओं ने इस प्रतिमा को अपने घरों में बिठाने का सिलसिला शुरू किया। कुछ समय बाद धींगा गवर के दिन मोहल्ले में विवाद के चलते गवर का मेला नहीं करने का निर्णय लिया गया। जिस दिन यह निर्णय लिया गया, उसी दिन गवर खुद दरवाजे तोड़कर स्वयं प्रकट हो गई, तब गवर माता की शक्ति का अंदाजा हुआ। तब से शुरू हुआ गवर पूजन का सिलसिला आज भी जारी है।

विधवा महिलाएं भी करती हैं पूजन

त्यौहारों और मेलों ने जोधपुर के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन को एक नयी पहचान दी है। खासतौर से जोधपुर में दो चरणों में मनाये जाने वाले गवर पूजन से जुड़े अनूठे लोकपर्व धींगा गवर में। होली के एक पखवाड़े बाद चैत्र शुक्ला तृतीया को गणगौर का विसर्जन कर दिया जाता है, लेकिन सुनार, ब्राह्मण, महेश्वरी जाति की महिलायें चैत्र शुक्ला तीज से वैशाख कृष्ण पक्ष की तीज तक धींगा गवर का पूजन करती है। इस दौरान आयोजित मेले का खूबसूरत और मनोहरी नजारा होता है। परकोटे के माहौल में मधुर गीत-संगीत की झंकार, हर तरफ तीजणियों की कतार और हंसी-ठिठौली और चुहल के संग कुआरे युवकों पर बेंत की बौछार का नजारा अनूठा होता है। अलग-अलग स्वांग रची तीजणियां देर रात को जब गवर प्रतिमाओं के दर्शनार्थ हाथों में बेंत लिये निकलती हैं तो युवाओं का हुजुम बचने के लिये इधर-उधर दौड़ते भागते सुरक्षित ठोर ढूढ़ते नजर आते हैं।

धींगा गवर सती माता का ही रूप है। यह सप्तऋषि की पत्नी है और लोगों में अपने लोकप्रिय नाम धींगा गवर से प्रसिद्ध है। विभिन्न सामाजिक और मोहल्लों के महिला संगठन इस पर्व को मनाने में महीनों पहले सक्रिय हो जाते हैं। धींगा गवर का मेला रात में ही भरता है। इस रात परकोटे के भीतर गलियों, चौराहों पर महिलाओं का राज रहता है। महिलायें के हाथों में बेंत होती है, वे सामने आने वाले पुरुषों को बेंत मारकर अपने लिये रास्ता बनाती हैं। मान्यता है कि धींगा गवर ईसर जी के नाते आयी थी। धींगा गवर की पूजा विधवा एवं सुहागिनें दोनो ही करती हैं। कुंवारी लड़कियां इसे नहीं पूजती।

चैत्र शुक्ल बीज से पूजा आरम्भ की जाती है। दीवार पर धींगा गवर का चित्र बनाया जाता है। पास में गणेश का भी चित्र होता है। साथ में शिवजी, मूषक, चांद व सूर्य के चित्र भी बनाये जाते है। धींगा गवर को पूजने वाली महिलायें सोलह दिन तक अपने हाथ में सोलह गांठों का डोरा बांधती हैं। विभिन्न रंगों के प्रयोग से दीवार पर बनाई गई धींगा गंवर की कुंकुम, चावल, पुष्प आदि से पूजा की जाती है। धींगा गवर की पूजा दोपहर बाद की जाती है।

पूजा के दौरान महिलाओं द्वारा पारम्परिक सामूहिक गीत गाये जाते है। पूजन आदि से निवृति के बाद महिलाएँ घर जाने से पहले पानी के कुंडले बनाती है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तीज की रात धींगा गवर का 'रातीजोगा' और 'भोलावणी' होती है। जिस समय भोलावणी के लिये गवर को ले जाया जाता है, महिलायें अपने हाथ में बंधे डोरे गवर के बाँध देती हैं। इस अवसर पर चार बार आरती होती है। देर रात भोलावणी होती है। इस प्रकार धींगा गवर पर्व के मामले में जोधपुर की अलग ही पहचान है।

रात 12 से अलसुबह 4 बजे तक महिलाओं की धींगा मस्ती

पुराने शहर के भीतरी इलाकों में धींगा गवर का महोत्सव होता है। रात्रि के बारह बजे से सवेरे चार बजे तक संकडी गलियों को विवाह समारोह की तर्ज पर सजाया जाता है। निश्चित स्थानों पर केवल गौर की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती है। ईसर (ईश्वर या शिव) नहीं। सम्मोहक पोशाकों के अलावा शुद्ध सोने के आभूषणों से अंग प्रत्यंग को अलंकृत किया जाता है। शहर के सुनारों का मोहल्ला, चाचा की गली, कुमहारियो का कुआं, जालप, बनिया बाडा व ब्रह्मपुरी, डोडीदारो का मोहल्ला सहित अनेक स्थानों पर सजने वाली गवर को करीब 20 करोड़ रूपए के सोने के जेवरात और आभूषणों से सुशोभित किया जाता है।

रात्रि में महिलाएं नाचती गाती हुई अन्य स्थानों पर प्रतिष्टित धींगा गवर के दर्शनार्थ जाती हैं। कुछ औरते स्वांग भी धारण करती हैं। पुलिस इंस्टेक्टर, दूल्हा, राजा, कलेक्टर, भगवान, देवियां, कई तरह के वेश धारण करती महिलाएं हाथों में डण्डे धारण किये निकलती हैं। पुरुष मूक दर्शक से चबूतरियों पर बैठे रहते हैं। किसी भी पुरुष को महिलाएं डण्डा मार दे तो कोई आपत्ति नहीं है। ऐसा माना जाता है, अगर किसी अविवाहित पुरुष को बैंत (डण्डा) लग जाता है तो उसकी शादी जल्दी हो जाती है। गवर के पास मोई (भंग मिश्रित प्रसाद) होती हैं जिसे स्त्रियां ग्रहण करती हैं और भंग की तरंग में धींगा मस्ती करती रसिकता के गीत गाती हैं। उस रात स्त्रियाँ का साम्राज्य होता है।

इस भागमभाग के दौरान स्वांग रची तीजणियों के श्रंगार, वीर, वीभत्स, रौद्र, हास्य, करूणा, अद्भुत, शांत, वात्सल्य, और भक्ति के रंग देखने को मिलते है। धींगा गवर पूजनपूर्ण होने पर गवर विदाई को रात अनूठे अलग-अलग स्वांग रची तीजणियों का धींगाणा देखने के लिए पूरा शहर उमड़ता रहा है । फिर ब्रह्मवेला में धींगा गवर का जल में विसर्जन कर दिया जाता है। इस अनूठे मेले को देखने बाहरी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। महिला सशक्तिकरण से जुड़ा धींगा गवर का अनूठा पूजन केवल जोधपुर में किया जाता है।

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