'अफजल' की खातिर ‘भारत’ की बर्बादी का समर्थन!

तुम कितने अफजल मारोगे, घर-घर से अफजल निकलेगा...वाह, कितनी शान की बात है न...वाकई। देखिए जरा इस बात को सुनकर कश्मीर के अलगाववादी, पाकिस्तान में मुशर्रफ समेत हाफिज सईद सरीखे आताताई तालियां ठोंक ठोंक कर हंसने में लगे हैं। क्या हुआ नहीं मानते आप...तो आप उदाहरण के तौर पर तख्तियों पर आतंकी इरादों के साथ लटके उन अक्षरों को ही देख लीजिए जो आईएसआईएस जैसे खूंख्वार संगठन के समर्थन में कश्मीर घाटी में जेएनयू का शुक्रिया अदा करते हुए हवा में उछाले गए। लेकिन अंधेरेबाजों ने मुद्दा ही पलट दिया। अफजल अभिव्यक्ति से जुड़ा, अभिव्यक्ति आजादी से और आजादी नारों से....जिसके बाद जेएनयू मु्द्दा बना और मुद्दे का बखूबी प्रयोग हुआ, जो कि आप जेएनयू के तौर पर देख भी रहे हैं।

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'अफजल' की खातिर ‘भारत’ की बर्बादी का समर्थन

'अफजल' की खातिर ‘भारत’ की बर्बादी का समर्थन

मुद्दों के बीच खो गया जेएनयू

अफजल को एक खेमे ने क्रांतिवीर बना दिया गया। और बनाने वालों की वकालत करने के लिए अंधेरेबाज उतर आए। सामंतवाद, पूंजीवाद, मनुवाद के रूप में पहले से तैयार विकल्प पर कैमरों ने अपने काम के इतर न्यायिक मुहर लगा दी कि भले ही अफजल का समर्थन कर रहे थे पर ये आरोपी नहीं हैं। क्योंकि इनके पक्ष के वकील हम हैं। मुद्दा पलटा। देश द्रोहियों को देश भक्त बताकर बचाने की कोशिश हुई तो एक और खेमा देश भक्ति के मार्ग पर लोटते हुए खुद को सबसे ऊंचे दर्जे वाला बताते हुए आगे आया। कथित तौर पर न्याय के लिबासवालों ने इंसानियत का लिबास खो दिया। बद्सलूकी की। लेकिन इस बीच खो गया वो मुद्दा जिससे जेएनयू जलना शुरू हुआ था।

खुद कबूला हमले की साजिश में शामिल होने की बात

जी हां अफजल गुरू। जिसने मीडिया को दिए अपने इंटरव्यू में ये बात स्वीकार भी की है कि वह लोकसभा में हुए हमलों की साजिशकर्ताओं में से एक था। तारीख 13 दिसंबर 2001....समय 11 बजकर करीबन 35 मिनट पर लोकसभा संसद भवन परिसर में हमला हो गया। आतंकियों ने जमकर गोलियां, हथगोले चलाए। उनका उद्देश्य एमपी की हत्या करना था। इस बात का खुलासा खुद अफजल गुरू ने किया था। उस वक्त जिन मोटी मोटी हैडिंग्स के सहारे मुद्दे को गर्माहट दी गई उनमें से ये भी एक थी कि देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़, संसद पर हुआ आतंकी हमला...।

दरअसल हम इन बातों को आपके सामने इसलिए रख रहे हैं क्योंकि अफजल का समर्थन करने वाले, आतंक की हिमायत करने वाले आज धर्म के चोंगे में लपेटकर खुद के साथ अत्याचार होता हुआ बता रहे हैं। कन्हैया कुमार जो कि अफजल के समर्थन में खड़े उमर खालिद का साथ देता रहा वो शांति की अपील कर रहा है। वहीं समाज का एक खेमा भी इनकी खातिर न्याय की गुहार लगा रहा है। अजीब है न। एक अफजल जो कि अब जिंदा भी नहीं है...वह महज अपने नाम भर से समाज को अलग अलग हिस्सों में बांट गया।

वहीं जब दूसरा हिस्सा मुखालिफत की खातिर सक्रिया हुआ तब तक मुद्दे को बद्सलूकी की खूंटी से टांग दिया गया। लेकिन लोग ये जानना चाहते हैं कि किसी आतंकी का समर्थन क्या देशभक्ति की श्रेणी में आता है। नहीं ये इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि तिरंगे को तानकर देशभक्ति सबूत के तौर पर बिलकुल भी नहीं पेश की जा सकती। जिस पर अंधेरेबाजों ने अपनी आवाजें बुलंद की है। टीआरपी का खेल रचा है। अगर ये समर्थन सही है तो जरा हाफिज सईद को हीरो बताने वालों, मुजाहिद्दीन को अपना करीबी मानने वालों, लश्कर को तैयार करने वालों को सुनकर अपनी स्थिति का अंदाजा लगाईये....

तो सुना आपने....अब तय कीजिए कि अफजल सरीखे लोगों के साथ खड़े होकर आप भारत को कहां ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। पूछिएगा जरा....ये सवाल खुद से भी और राष्ट्रवाद की लंबी चौड़ी परिभाषा बताने वालों से भी....साथ ही उनसे भी जो राष्ट्र भक्ति के लिए उदाहरणों पर सवालिया निशान लगाते हैं।

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