गुमनामी के अंधेरे में खो गया जवाहर लाल नेहरु का ससुराल
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। नेहरू-गांधी परिवार के इलाहाबाद स्थित आनंद भवन, 10 जनपथ, तथा 1 सफदरजंग वाले आशियानों के विपरीत इनका दिल्ली-6 वाला घर गुमनामी में ही रहा । कायदे से देखा जाए तो इसकी भी कम अहमियत नहीं है इस परिवार के लिए। पर अज्ञात कारणों के चलते इसे वो मान-सम्मान न मिल सका जिसका यह निश्चय़ ही हकदार था। अगर श्रीमती इंदिरा गांधी को छोड़ दिया जाए तो माना जा सकता है कि परिवार के अन्य सदस्यों का इसको लेकर रवैया बेरुखी भरा ही रहा।

इंदिरा जी तो इससे अपने को भावनात्मक स्तर पर जुड़ा हुआ महसूस करती थीं। जाहिर है कि दिल्ली-6 का यह घर उनकी मां कमला नेहरू का था। इधर ही उनकी मां पली-बढ़ीं और फिर पंडित नेहरू की बहू बनकर इलाहाबाद के भव्य-विशाल आनंद भवन में गईं। नेहरु जी तो इधर शायद ही शादी के बाद कभी आए हों।
इंदिरा जी के ननिहाल वालों ने अपने घर को 60 के दशक में बेच दिया। बस,तब ही से इसके बुरे दिन शुरू हो गए। फिर इसे देखने वाला कोई नहीं रहा। हां, इंदिरा जी चुनाव प्रचार के दौरान इस घर के पास आकर अवश्य ही ठहर जाती थीं। दिल्ली-6 में होने वाली चुनावी सभाओं में वे यह भी बताना नहीं भूलती थीं कि उनकी ननिहाल दिल्ली-6 की ही थी। वे साल 1980 में फिर से प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी मां के घर आईं थीं। उनके साथ उनके सचिव आर.के. धवन और दिल्ली के उस दौर के शिखर नेता हरिकिशन लाल भगत भी थे।
उनके अपने घर आने के खबर से वहां पर भारी भीड़ एकत्र हो गई थीं। करीब 30-40 मिनट वो अपनी मां के घर ठहरीं थीं। घर के एक-एक हिस्से को उन्होंने करीब से देखा। भगत जी ने एक बार इस लेखक को बताया था कि उन्होंने उनसे अपनी मां के घर जाने की इच्छा एक दिन अचानक से जाहिर की थी। वो उधर जाकर बहुत भावुक हो गईं। तब उनसे कई स्थानीय लोगों ने इसे स्मारक में तब्दील करने का आग्रह किया। उन्होंने कोई वादा तो नहीं किया था। बस, यही कहा था ‘ चलो देखेंगे,कुछ करते हैं।‘
जर्जर हो चुका है नेहरू का ससुराल
वक्त के थपेड़ों से दो-चार होते हुए अब गांधी-नेहरू परिवार का यह आशिय़ाना बुरी हालत में है। जर्जर हो चुका है। बंद पड़ा है। पर कभी यह गुलजार रहता था। इधर स्वाधीनता आंदोलन के दौर में स्वाधीनता सेनानियों की बैठकें निरंतर होती थीं। इधर ही बैंड-बाजा-बारात के साथ आकर नेहरू जी ने कमला नेहरू को अपनी जीवनसंगिनी के रूप में स्वीकार किया था। यह बात है 8 फरवरी 1916 की। कहा यह जाता है कि जब पंडित जी इंगलैंड में उच्च शिक्षा के लिए गए थे तब ही उनके पिता श्री मोतलीलाल नेहरू ने अपने पुत्र के लिए बहू का चयन कर लिया था।
कमला जी का परिवार दिल्ली के कश्मीरी पंडित बिरादरी में नामचीन था। काफी कुलीन माना जाता था। घर में कवि सम्मेलन और मुशायरे लगातार आयोजित होते थे। राजधानी में 19 वीं सदी के मध्य में कश्मीर से काफी तादाद में कश्मीरी पंडितों के परिवार आकर बस गए थे। तब उत्तर प्रदेश के दो शहरों क्रमश: इलाहाबाद और आगारा में भी बहुत से कश्मीरी पंडितों के परिवार आ गए थे। इनके कुल नाम हक्सर,कुंजरू,कौल,टिक्कू वगैरह थे। कमला जी का भी परिवार उसी दौर में इधर आकर बसा था। यहां पर आए तो इधर ही होकर बस गए। कश्मीरी जुबान तक कहीं पीछे छूट गई। उसकी जगह ले ली हिन्दी ने। कमला जी ने जामा मसिजद के करीब स्थित इंद्रप्रस्थ स्कूल से शिक्षा ग्रहण की थी।
और अगर बात वर्तमान की हो तो नेहरू जी का ससुराल और इंदिरा जी का ननिहाल का रास्ता बताने वाला भी अब बड़ी मुशिकल से मिलता है सीताराम बाजार में भी। इधर के लोग बीते सालों-दशकों से जद्दोदहद कर रहे हैं ताकि गांधी-नेहरू परिवार से जुड़े इस घर को स्मारक का दर्जा मिल जाए। इधर एक पुस्तकालय बन जाएं जहां पर आकर लोग पढ. सकें। पर बात नहीं बनीं।












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