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Bisleri: इटली से शुरू हुआ बिसलेरी का सफर, जानें कैसे बना भारत का लोकप्रिय ब्रांड

लोकप्रिय बोतलबंद पेयजल कंपनी बिसलेरी का 2022-23 में लगभग 2500 करोड़ रूपये का टर्नओवर रहा है। यही नहीं, बोलतबंद पेयजल के कुल व्यापार में लगभग 60 प्रतिशत बाजार पर भी बिसलेरी का कब्जा है।

story of bisleri journey from Italy know how it became a popular brand of India

Bisleri: बिसलेरी के बिकने के पीछे का कारण कंपनी का घाटा नहीं है क्योंकि यह कंपनी मुनाफे में है। दरअसल, कंपनी इसलिए बिक रही क्योंकि कंपनी की नयी मालकिन को इसमें अब कोई दिलचस्पी नहीं है। दरअसल, बिसलेरी के चेयरमैन रमेश चौहान की एकलौती बेटी जयंती चौहान कंपनी की वाइस चेयरपर्सन है। जयंती को अपने पिता के इस व्यवसाय में कोई रूचि नहीं है।

जयंती चौहान लंदन की एक फैशन डिजाइनर व फोटोग्राफर के साथ घुमक्कड व पशु प्रेमी भी है। इसके साथ-साथ वह डिजिटल मार्केटिंग, विज्ञापन एवं संचार विकास आदि क्षेत्रों में कार्यरत है। उनका कहना है कि वह व्यवसाय को विरासत में नहीं लेना चाहती।

उधर, रमेश चौहान का कहना है कि वे अब वृद्ध (82 वर्ष) हो गये है, जिस कारण कंपनी को आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं है। मालिक की बढ़ती उम्र और बेटी की रूचि न होने के कारण अब बिसलेरी बिकने के लिए तैयार है। मगर सुखद बात यह है कि रमेश चौहान अपनी इस कंपनी को किसी विदेशी कंपनी के हवाले नहीं करेंगे। वे केवल भारतीय को ही इसे सौपेगें। इसलिए इसे खरीदने के लिए कई भारतीय उद्योगपति इस दौड़ में शामिल हो गये हैं।

बिसलेरी की शुरुआत

बिसलेरी अपने शुरूआती दिनों में इटली का एक ब्रांड था। दरअसल, इसकी शुरुआत इटली के सिग्नोर फेलिस बिसलेरी ने अपने नाम से इटली के मिलान शहर में 20 नवंबर 1851 को की थी। फेलिस अविष्कारक व रसायन शास्त्री के साथ-साथ एक व्यापारी भी थे। उन्होंने बिसलेरी को शराब छुड़ाने वाले एक पेय (अल्कोहल रेमेडी) के रूप में शुरू किया था। जिसको एंजेलिका नामक झरने के पानी में कुनैन, कुछ जड़ी बूटियों तथा लौह लवण (आयरन साल्टस्) आदि मिलाकर बनाया जाता था।

बिसलेरी का अधिग्रहण

1921 में फेलिस की मृत्यु के बाद, उनके डॉक्टर सेसरी रॉसी ने बिसलेरी पर कब्जा कर लिया। जिसने 1965 में अपने वकील दोस्त खुशरू सुंतूक के साथ मिलकर मंबुई के ठाणे में बिसलेरी का पहला वाटर प्लांट स्थापित किया और एंटी-मलेरिया दवा बनाने लगे। क्योंकि उस समय मुंबई में पानी की गुणवत्ता बहुत खराब थी, जिससे बीमारियां बहुत होती थी। जिस कारण डॉ. रोसी ने बोतलबंद पानी के व्यापार में संभावनाएं देखी। धीरे-धीरे कुछ बड़े होटलों में बोतलबंद पानी की सप्लाई शुरू हुई। जिसको दो तरह की कांच की बोतलों (बुबली और स्टिल) में बेचा जाने लगा। जिसकी एक बोतल की कीमत उस समय एक रुपये थी।

पानी की गुणवत्ता खराब होने के कारण उसमें सोडियम और पोटेशियम जैसे मिनरल मिलाए जाने लगे। जिस कारण बिसलेरी कंपनी ने अपने आपको मिनरल वाटर और सोडा बेचने वाली कंपनी के रूप में प्रचारित किया। कुछ समय पश्चात ही बिसलेरी मिनरल वाटर व सोड़ा ने पांच सितारा होटलों और महंगे रेस्तरां में अपनी जगह भी बना ली। लेकिन आम जनता से दूरी बनी रही।

लंबे समय के अंतराल के बाद भी जब कंपनी आम जनता में जगह नहीं बना पाई तो कंपनी को बेचने का निर्णय हुआ। जिस पर पारले के संस्थापक जयंतीलाल चौहान परिवार ने 1969 में 4 लाख रूपये (उस समय 50,000 अमेरिकी डालर) में बिसलेरी को खरीद लिया। इस तरह बिसलेरी अब 'पारले बिसलेरी' बन गई। 1970 के दशक में जयंतीलाल चौहान ने अपने व्यापार को अपने बेटों में बांट दिया। बिसलेरी इंटरनेशनल (तब पार्ले एक्सपोर्टस) रमेश चौहान को मिली। इस प्रकार रमेश चौहान बिसलेरी के चैयरमेन बन गये।

बिसलेरी का विस्तार

भारतीय परंपरा में पानी पिलाना एक धर्मार्थ कार्य माना गया है और उसे बेचने का कोई प्रावधान ही नहीं था। आमतौर पर राहगीरों अथवा जरुरतमंदो को जल पिलाने की निशुल्क व्यवस्था होती थी। ऐसे में रमेश चौहान के लिए बिसलेरी का विस्तार करना काफी संघर्ष का कार्य था।

रमेश चौहान ने अपनी कंपनी को आम जनता तक ले जाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक विज्ञापन का हवाला देते हुए बताया कि दुनिया में 80 प्रतिशत बीमारी गंदा पानी पीने से होती है। इसलिए साफ पानी पीयो और स्वस्थ्य रहो। इस अभियान को लेकर कंपनी ने 1995 में आम लोगों तक पहुंचने के लिए 500 एमएल (आधा लीटर) की छोटी प्लास्टिक बोतल बाजार में उतारी, जिसकी कीमत 5 रुपये रखी गई।

आम जनता तक पहुंच बनाने के लिए पानी की बोतलों को हर उस जगह पहुंचाया गया, जहां आम लोग जाते रहते थे। जैसे - रेलवे स्टेशन, सड़क किनारे छोटी दुकान, बस स्टैंड आदि। उसके बाद बिसलेरी संपूर्ण भारत में छा गई और बोतलबंद पानी का एक पॉपुलर ब्रांड बन गई। शुरूआती दिनों में परिवहन (ट्रांसपोर्ट) में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, क्योंकि ट्रांसपोर्टर पानी को ट्रांसपोर्ट करने में आनाकानी कर रहे थे। क्योंकि यह वजन में भारी और मुनाफे में कम वाला प्रोडक्ट था। इसलिए चेयरमैन रमेश चौहान ने खुद ही ट्रांसपोर्ट चलाने का निर्णय लिया।

बिसलेरी को चुनौती

वर्ष 2000 में पेप्सी, कोका-कोला और नेस्ले आदि कंपनियों ने बिसलेरी के एकाधिकार बोतलबंद पानी के व्यापार को चुनौती दी। अन्य पेय ब्रांडों से मिल रही चुनौती के कारण बिसलेरी ने विभिन्न आकार के आकर्षक पैक बाजार में उतारे। 'प्योर एंड सेफ', 'प्ले सेफ', फन एलीमेंट' आदि प्रमोशन अभियान चलाये। जिससे बिसलेरी ब्रांड की पकड़ आमजन में पहले से और मजबूत हो गयी।

गौरतलब है कि पारले ग्रुप ने जब बिसलेरी का अधिग्रहण किया था, तो उस समय इसके देश भर में केवल 5 स्टोर थे। मगर रमेश चौहान के बिजनेस आइडिया और बाजार की समझ के चलते आज बिसलेरी भारत में 122 विनिर्माण केंद्र और 5000 ट्रकों के साथ-साथ 4500 से अधिक डिस्ट्रीबूटरों का एक बड़ा व्यावसायिक समूह है।

यह भी पढें: Bisleri for Sale: बिसलेरी के बनने और बिकने की कहानी

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